जितिया व्रत में क्या है खरजितिया? ओठघन की रस्म और आंगन में पोखर बनाकर क्यों पूजे जाते हैं भगवान जीमूतवाहन

संतान की लंबी आयु, आरोग्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए माताओं द्वारा रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत भारतीय सनातन परंपरा के सबसे कठोर और नियमबद्ध व्रतों में गिना जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह पर्व मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल, बिहार, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्रों में अत्यंत श्रद्धा व उल्लास के साथ मनाया जाता है। लगभग 24 से 36 घंटे तक चलने वाला यह निर्जला उपवास केवल एक व्रत नहीं, बल्कि मातृत्व के अगाध त्याग, धैर्य और सांस्कृतिक परंपराओं का अनुपम संगम है। इस पावन पर्व से जुड़े कई ऐसे विशिष्ट और पारंपरिक शब्द हैं, जिनका अपना गहरा धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व है, जैसे ‘खरजितिया’, ‘ओठघन’ और आंगन में कच्चा पोखर बनाकर भगवान जीमूतवाहन की उपासना करना। आइए विस्तार से जानते हैं जितिया से जुड़ी इन सभी प्राचीन परंपराओं और उनके पीछे छिपे आध्यात्मिक रहस्यों को।

जितिया व्रत का अनुष्ठान तीन दिनों तक चलता है, जिसकी शुरुआत सप्तमी के दिन ‘नहाय-खाय’ से होती है, अष्टमी को मुख्य निर्जला व्रत रखा जाता है और नवमी की सुबह विधिवत पारण के साथ इसका समापन होता है।

क्या है खरजितिया और क्यों कहा जाता है इसे सबसे कठिन व्रत?

जितिया पर्व में अष्टमी तिथि के पूरे दिन और रात को बिना अन्न व जल ग्रहण किए जो कठोर निर्जला उपवास रखा जाता है, उसे ही लोकभाषा में ‘खरजितिया’ या ‘खरी जितिया’ कहा जाता है। ‘खर’ का शाब्दिक अर्थ होता है कठोर, खरा, विशुद्ध या अटल। इस दिन माताएं जल की एक बूंद भी गले से नीचे नहीं उतारती हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, खरजितिया के दिन माताएं अपनी संतान के जीवन पर आने वाले समस्त संकटों, अकाल मृत्यु के योग और असाध्य रोगों से रक्षा की प्रार्थना करती हैं। यह मान्यता है कि महाभारत काल में जब द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने पांडवों के वंश को समाप्त करने के लिए उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु (अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित) पर ब्रह्मास्त्र चला दिया था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने समस्त पुण्यों का फल देकर उस अजन्मे बालक को गर्भ के भीतर ही पुनर्जीवन प्रदान किया था। जिस दिन उस बालक को नया जीवन मिला, वह आश्विन कृष्ण अष्टमी का दिन था। इसी कारण संतान के रक्षण के लिए यह ‘खरी जितिया’ रखी जाती है।

‘ओठघन’ की रस्म: सूर्योदय से पहले सरगही जैसा भोजन

जितिया व्रत के मुख्य दिन यानी अष्टमी की भोर में, जब आकाश में तारे टिमटिमा रहे होते हैं और सूर्योदय नहीं हुआ होता, तब व्रती महिलाएं ‘ओठघन’ की रस्म निभाती हैं। इसे कई अंचलों में ‘सरगही’ या ‘दतुअन-ओठघन’ भी कहा जाता है।

ओठघन की परंपरा के तहत माताएं ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान-ध्यान करती हैं और अपने ओठों (होठों) पर अंतिम बार अन्न और जल का स्पर्श कराती हैं। इस समय विशेष रूप से मडुआ (रागी) की रोटी, तोरी या नेनुआ (तोरई) की सब्जी, नोनी का साग और मखाना-दही जैसी सुपाच्य और सात्विक चीजें खाई जाती हैं। ओठघन की रस्म पूरी होने के बाद, जैसे ही आकाश में पौ फटती है (लालिमा छाती है), व्रती महिलाएं कुल्ला करके मुंह साफ कर लेती हैं। इसके बाद से ही कठोर निर्जला व्रत का संकल्प शुरू हो जाता है। ऐसी लोक मान्यता है कि ओठघन के बाद यदि गलती से भी थूक निगल लिया जाए या पानी की बूंद मुंह में चली जाए, तो व्रत खंडित माना जाता है, इसलिए महिलाएं इसे बेहद सावधानी से करती हैं।

आंगन में पोखर बनाकर होती है जीमूतवाहन, चील और सियारिन की पूजा

जितिया पूजा का सबसे आकर्षक और अनोखा दृश्य दोपहर या प्रदोष काल (शाम) के समय घर के आंगन में देखने को मिलता है। इस दिन परिवार की महिलाएं आंगन की कच्ची जमीन पर मिट्टी और गोबर से लीपकर एक छोटा सा चौकोर तालाब या जलाशय (पोखर) बनाती हैं। यदि आंगन पक्का है, तो साफ मिट्टी लाकर सुंदर पोखर का स्वरूप तैयार किया जाता है।

इस पोखर के ठीक किनारे पाकड़ या वट (बरगद) की हरी डाल गाड़ दी जाती है। पोखर में स्वच्छ जल भरा जाता है और उसमें गंधर्व राजकुमार भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा या कुशा (पवित्र घास) से बनी मूर्ति स्थापित की जाती है। इसके साथ ही पोखर की मेड़ पर मिट्टी या गोबर से एक ‘चील’ (चील्हो) और एक ‘मादा सियार’ (सियारिन) की आकृतियां बनाई जाती हैं। इन आकृतियों के माथे पर सिंदूर का टीका लगाया जाता है और उन्हें खीरा, भीगा हुआ चना, महुआ, पपीता, सरसों का तेल और खली का नैवेद्य अर्पित किया जाता है।

जीमूतवाहन की कथा और चील-सियारिन की पौराणिक कहानी

आंगन में बैठकर सभी व्रती महिलाएं समूह में राजा जीमूतवाहन की त्यागपूर्ण कथा सुनती हैं। कथा के अनुसार, धर्मात्मा राजा जीमूतवाहन ने नाग जाति के एक इकलौते बालक ‘शंखचूड़’ की रक्षा के लिए गरुड़ देवता के सामने खुद को शिला पर रखकर अपने शरीर का बलिदान देना स्वीकार कर लिया था। राजा के इस परोपकार और त्याग से प्रसन्न होकर गरुड़ देव ने न केवल राजा को पुनः जीवनदान दिया, बल्कि सभी नागों को प्राणदान देते हुए वरदान दिया कि जो माता आश्विन अष्टमी को जीमूतवाहन की पूजा करेगी, उसकी संतान कभी असमय काल के गाल में नहीं समाएगी।

वहीं, चील और सियारिन की लोककथा संयम का संदेश देती है। कथा के अनुसार, एक बार एक चील और सियारिन ने एक साथ जितिया का उपवास रखा। चील ने भूख-प्यास सहकर पूरे नियम से निर्जला व्रत पूरा किया, जबकि सियारिन भूख बर्दाश्त न कर सकी और चुपके से श्मशान में जाकर मांस और हड्डियां चबा लीं। इसका परिणाम यह हुआ कि अगले जन्म में सियारिन के सभी बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे, जबकि नियम का पालन करने वाली चील की संतानें दीर्घायु और तेजस्वी बनीं। यही कारण है कि जितिया के दिन चील और सियारिन दोनों की स्मृति में पूजा की जाती है ताकि माताएं यह सीख सकें कि व्रत में तनिक सा भी लोभ संतान के लिए अनिष्टकारी हो सकता है।

पारण के साथ संपन्न होता है महापर्व

अष्टमी की रात भर जागकर भजन-कीर्तन करने के बाद नवमी तिथि को सूर्योदय के पश्चात व्रत का पारण किया जाता है। पारण के दिन सबसे पहले भगवान सूर्य और जीमूतवाहन को अर्घ्य दिया जाता है, पितरों और कुलदेवता को भोग लगाया जाता है। इसके बाद नोनी का साग, मडुआ की रोटी, कंदा (सूरन/जिमीकंद) की सब्जी और दही-चूड़ा खाकर माताएं अपना निर्जला उपवास तोड़ती हैं। पारण के बाद माताएं अपनी संतानों के माथे पर जितिया का धागा (लाल-पीला डोरा) बांधती हैं और उन्हें दीर्घायु व यशस्वी होने का आशीर्वाद देती हैं।

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