
हिंदी सिनेमा के फलक पर लोक आस्था और क्षेत्रीय परंपराओं का विस्तार इन दिनों नए रूप में देखने को मिल रहा है। हाल ही में सिनेमाघरों में रिलीज हुई अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा और अभिनेत्री तमन्ना भाटिया अभिनीत बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘द वन’ (The Vvan) में आस्था के महापर्व ‘छठी मैया’ के उत्सव और पूजन को बड़े पर्दे पर भव्यता के साथ प्रदर्शित किया गया है। अमूमन बॉलीवुड फिल्मों में करवा चौथ, गणेशोत्सव, दुर्गा पूजा और होली-दिवाली जैसे पर्वों का बोलबाला रहा है, लेकिन मुख्यधारा की किसी बड़ी हिंदी फिल्म में छठ महापर्व के आध्यात्मिक दृश्य को इतनी प्रमुखता से दिखाए जाने ने दर्शकों और फिल्म विश्लेषकों का ध्यान खींचा है। इस पूरे घटनाक्रम और हिंदी सिनेमा में भोजपुरी संस्कृति के प्रति बढ़ते रुझान पर भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार अभिनेता और चर्चित पार्श्व गायक रितेश पांडे ने एक विशेष बातचीत के दौरान बेहद बेबाकी से अपनी राय साझा की है। रितेश पांडे ने साफ शब्दों में कहा कि यह बॉलीवुड का कोई सांस्कृतिक हृदय परिवर्तन या अचानक आया बदलाव नहीं है, बल्कि आज के दौर में यह सीधे तौर पर उनकी व्यावसायिक मजबूरी और समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है।
जरूरत सब कुछ करवाती है: हिंदी सिनेमा में भोजपुरी संस्कृति की बढ़ती मांग
रितेश पांडे ने साक्षात्कार के दौरान जब इस सवाल का सामना किया कि क्या बॉलीवुड वास्तव में उत्तर भारतीय लोक परंपराओं का सम्मान करने लगा है, तो उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि बाजार में ‘जरूरत सब कुछ करवाती है’। उन्होंने तर्क दिया कि आज के समय में हिंदी फिल्मों के निर्माताओं को यह अच्छी तरह समझ आ चुका है कि भोजपुरी संस्कृति, वहां के संगीत, ठेठ लोकगीतों और कलाकारों को शामिल करने से फिल्मों को जबरदस्त व्यूज मिलते हैं और सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या में भारी उछाल आता है। जब तक दर्शकों का यह विशाल वर्ग बॉक्स ऑफिस पर टिकट खरीद रहा है, तब तक बॉलीवुड के लिए इस क्षेत्र की अनदेखी करना नामुमकिन है। रितेश ने कहा कि यही वजह है कि मुंबई के बड़े फिल्म निर्माता अब पूर्वांचल और बिहार के कलाकारों, लोक गायकों और कहानियों को अपनी मुख्यधारा की पटकथाओं का अभिन्न हिस्सा बनाने के लिए उन्हें सीधे तौर पर आमंत्रित कर रहे हैं।
छठी मैया का बड़े पर्दे पर आना गौरव की बात, यह हमारे संस्कार हैं
हालांकि, व्यावसायिक पहलुओं पर खरी-खरी बात रखने के साथ ही रितेश पांडे ने इस बात पर अपार प्रसन्नता और संतुष्टि भी व्यक्त की कि पूर्वांचल और बिहार की आत्मा कहे जाने वाले छठ महापर्व को अब राष्ट्रीय स्तर पर सिनेमाघरों में सम्मान मिल रहा है। उन्होंने कहा कि वजह चाहे जो भी हो, लेकिन यह हमारी समूची भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री, हमारे समाज और हमारी माटी के लिए एक अत्यंत गौरवपूर्ण क्षण है। छठी मैया की महिमा, सूर्य उपासना की पवित्रता और इसके पीछे का कठिन त्याग जब बड़े पर्दे पर दिखाया जाता है, तो यह हमारी समृद्ध संस्कृति, मर्यादा और सनातन संस्कारों को पूरी दुनिया के सामने नई पहचान दिलाता है। रितेश के अनुसार, भोजपुरी लोक संगीत और मान्यताओं को जिस तरह से राष्ट्रीय सिनेमा में जगह मिल रही है, उससे आने वाली पीढ़ियों में अपनी जड़ों के प्रति गर्व का भाव और अधिक गहरा होगा।
सत्ता और संसद तक भोजपुरी दिग्गजों की गूंज, सम्मान का प्रतीक
बातचीत के दौरान भोजपुरी समाज और उसके प्रतिनिधियों की राष्ट्रीय पहचान पर चर्चा करते हुए रितेश पांडे ने राजनीति और नीति-निर्धारण में पूर्वांचल के बढ़ते कद का भी गर्व से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आज हमारे भोजपुरी समाज के लोग उस सर्वोच्च पंचायत में बैठे हैं जहां से यह पूरा देश संचालित होता है। उन्होंने बड़े भाइयों का जिक्र करते हुए कहा कि चाहे मनोज तिवारी हों, रवि किशन हों या फिर पूर्व सांसद दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’, इन सभी ने संसद के पटल पर भोजपुरी माटी की ताकत का अहसास कराया है। इसके अलावा बिहार विधानसभा में पप्पू सिंह जैसे जनप्रिय जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी यह दर्शाती है कि भोजपुरी समाज अब केवल एक दर्शक वर्ग नहीं रह गया है, बल्कि वह देश के नीतिगत फैसलों में भी बराबरी की भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि जब राजनीति से लेकर कला तक हर क्षेत्र में हमारे लोग निर्णायक पदों पर होंगे, तो स्वभाविक तौर पर मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री को भी इस प्रभाव को स्वीकार करना ही पड़ेगा।
‘द वन’ के बाद छठ पर्व पर और भी फिल्में कतार में
गौरतलब है कि दीपक कुमार मिश्रा और अरुणाभ कुमार द्वारा निर्देशित तथा बिहार के 400 साल पुराने ऐतिहासिक वन देवी मंदिर की लोककथा पर आधारित फिल्म ‘द वन’ बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों के बीच अपनी मजबूत पैठ बना रही है। इस फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा, तमन्ना भाटिया, सुनील ग्रोवर और श्वेता तिवारी जैसे मंझे हुए कलाकारों ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं। वहीं छठ पर्व को केंद्र में रखकर आगे आने वाली फिल्मों की श्रृंखला भी शुरू हो चुकी है। आगामी 27 नवंबर को आयुष्मान खुराना और शरवरी वाघ की फिल्म ‘यह प्रेम मोल लिया’ भी रिलीज की कतार में है, जिसमें उत्तर भारत की इस पावन सांस्कृतिक विरासत का रंग देखने को मिलेगा। रितेश पांडे के इस बयान ने मनोरंजन जगत में एक नई रचनात्मक बहस छेड़ दी है कि क्या लोक संस्कृति का यह विस्तार बॉलीवुड के आत्ममंथन का नतीजा है या फिर बॉक्स ऑफिस पर टिके रहने का सबसे कारगर व्यावसायिक नुस्खा।
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