
ओटीटी प्लेटफॉर्म अमेजन प्राइम वीडियो पर ग्रामीण परिवेश, हल्की-फुल्की कॉमेडी और व्यंग्य से सजी लोकप्रिय वेब सीरीज ‘दुपहिया’ अपने नए सीजन के साथ धमाकेदार अंदाज में लौट चुकी है। पिछले सीजन में बिहार के ‘क्राइम-फ्री’ घोषित धड़कपुर गांव में एक लाल रंग की बहुचर्चित बाइक की चोरी ने पूरे गांव की नाक में दम कर दिया था। अब ‘दुपहिया सीजन 2’ में गांव की राजनीति, पारिवारिक उलझनें और आधुनिक समस्याएं मिलकर ऐसा हास्य का तड़का लगा रही हैं कि दर्शक हंसते-हंसते लोटपोट हो रहे हैं। इस बार कहानी किसी बाइक के इर्द-गिर्द नहीं, बल्कि गांव में मोबाइल टावर लगाने के विवाद और सरकारी नौकरी के ‘पेपर लीक’ कांड के ताने-बाने पर बुनी गई है। सोनम नायर के निर्देशन में बनी यह 8 कड़ियों की सीरीज एक बार फिर छोटे शहर की मिट्टी की खुशबू और यथार्थवादी व्यंग्य को जीवंत करती नजर आ रही है।
धड़कपुर में मोबाइल टावर का बवाल: स्वास्थ्य की चिंता बनाम बनवारी झा की मजबूरी
सीजन 2 की शुरुआत धड़कपुर गांव में लगने वाले 5G मोबाइल टावर के भारी विरोध से होती है। गांव के लोगों के बीच यह डर फैल जाता है कि मोबाइल टावर से निकलने वाले रेडिएशन से स्वास्थ्य संबंधी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं, इसलिए पूरा गांव एकजुट होकर इसके खिलाफ खड़ा हो जाता है। वहीं दूसरी ओर, मुख्य किरदार बनवारी झा आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं और उन्हें पैसों की सख्त दरकार है। टावर के बदले मिलने वाले भारी किराए के लालच में वे अपनी ही जमीन पर टावर लगवाने की जिद पर अड़ जाते हैं। बनवारी झा गांववालों और प्रधान पुष्पलता यादव को धोखे में रखकर चुपके से कागजात पर दस्तखत भी करवा लेते हैं। इसके बाद गांव में पंचायती दांव-पेंच, गुटबाजी और बनवारी के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का ऐसा सिलसिला शुरू होता है जो दर्शकों को लगातार गुदगुदाता है।
रोशनी का संघर्ष: दूल्हे को दी गई चुनौती और एसएससी पेपर लीक का फेर
सीरीज का दूसरा सबसे बड़ा और प्रासंगिक ट्रैक बनवारी झा की बेटी रोशनी से जुड़ा हुआ है। पिछले सीजन में शादी टूटने के दौरान रोशनी ने अपने दूल्हे को यह चुनौती दी थी कि वह खुद सरकारी परीक्षा पास करके शहर जाएगी और अपनी पहचान बनाएगी। रोशनी पूरे समर्पण के साथ एसएससी (SSC) परीक्षा की तैयारी में जुटती है, लेकिन उसकी किस्मत उसे एक खतरनाक मोड़ पर ले आती है। देश में युवाओं को झकझोर देने वाले ‘पेपर लीक’ के रैकेट में रोशनी अनजाने में फंस जाती है। देश के एक अत्यंत गंभीर और संवेदनशील मुद्दे को मेकर्स ने जिस सहजता, व्यंग्य और हास्य के साथ स्क्रीन पर उतारा है, वह बेहद काबिले-तारीफ है। एक तरफ अपने पिता की बदनामी और दूसरी तरफ अपने भविष्य का सपना—रोशनी की यह कशमकश कहानी को रफ्तार देती है।
बाप-बेटे के रिश्ते का दर्द: ‘लौंडा नाच’ और भूगोल झा का आत्मसम्मान
‘दुपहिया सीजन 2’ केवल सतही कॉमेडी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसमें रिश्तों की जटिलताओं को भी गहराई से छुआ गया है। बनवारी झा और उनके बेटे भूगोल झा के बीच की खटास कहानी का सबसे भावुक पहलू है। भूगोल लोककला यानी ‘लौंडा नाच’ में सक्रिय है, जो बिहार और पूर्वी यूपी की पारंपरिक कला का हिस्सा है। लेकिन समाज की संकीर्ण सोच के दबाव में बनवारी अपने बेटे के इस काम को हेय दृष्टि से देखते हैं और चाहते हैं कि वह इसे फौरन छोड़ दे। पिता का रूखा व्यवहार और बेटे की अपनी कला के प्रति निष्ठा दोनों के बीच गहरी खाई पैदा कर देती है। यह भावनात्मक ट्रैक कॉमेडी के बीच दर्शकों की आंखें नम करने का काम करता है।
निर्देशन और कलाकारों का शानदार अभिनय
अविनाश द्विवेदी और चिराग गर्ग द्वारा लिखी गई इस सीरीज की सबसे बड़ी ताकत इसके चुटीले संवाद और ठेठ देहाती लहजा है। गजराज राव और अन्य कलाकारों ने अपने किरदारों को इतनी स्वाभाविकता से निभाया है कि दर्शक खुद को धड़कपुर की गलियों में मौजूद महसूस करते हैं। चाहे वह प्रधान का किरदार हो, बनवारी का चालाक अंदाज या फिर अमावस और भूगोल की नोकझोंक—हर कलाकार ने अपनी अदाकारी से कहानी में जान फूंक दी है। बैकग्राउंड स्कोर और सिनेमैटोग्राफी गांव के माहौल को बहुत प्रामाणिक रूप में पेश करती है।
बिंज-वॉच के लिए क्यों परफेक्ट है ‘दुपहिया 2’?
अगर आप वीकेंड पर किसी भारी-भरकम सस्पेंस या खून-खराबे वाली क्राइम थ्रिलर से हटकर एक साफ-सुथरा, दिल को छू लेने वाला और सामाजिक संदेश देने वाला मनोरंजक शो देखना चाहते हैं, तो ‘दुपहिया 2’ एक बेहतरीन विकल्प है। 8 एपिसोड्स में बंटी यह सीरीज अपनी तेज रफ्तार और बेहतरीन ह्यूमर की बदौलत कहीं भी बोर नहीं होने देती। पंचायत और गुल्लक जैसी सादगी भरी वेब सीरीज पसंद करने वाले दर्शकों के लिए यह शो एक ट्रीट की तरह है।
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