नगर निगम में ‘गुंडा टैक्स’ और माफियागीरी पर गरजे सीएम योगी: अफसरों को दी अंतिम चेतावनी, बोले- ‘व्यक्ति विशेष’ के नाम पर वसूली बंद करो वरना नपेंगे जिम्मेदार

उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में उस समय हड़कंप मच गया जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में नगर निगम के कामकाज और वहां चल रहे अवैध सिंडिकेट को लेकर तीखे तेवर दिखाए। मुख्यमंत्री ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि नगर निगमों में किसी भी ‘व्यक्ति विशेष’ के नाम पर चलने वाली अवैध टैक्स वसूली और ठेकेदारी में माफियागीरी को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। शासन स्तर पर हुई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान सीएम योगी ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे सीधे तौर पर ऐक्शन लें, अन्यथा जवाबदेही तय करते हुए संबंधित अधिकारियों के अधिकार तक छीने जा सकते हैं।

समीक्षा बैठक में अचानक बदला माहौल, सीधे पूछे गए तीखे सवाल

शाम के वक्त आयोजित इस महत्वपूर्ण बैठक में यूं तो कई प्रशासनिक और विकास कार्यों के एजेंडे तय थे, लेकिन जैसे ही शहरी व्यवस्था और कानपुर नगर निगम की समीक्षा की बारी आई, मुख्यमंत्री ने प्रशासनिक अफसरों की बात को बीच में रोकते हुए सीधे मुख्य मुद्दे पर सवाल दाग दिया। मुख्यमंत्री ने सख्त लहजे में मंडलायुक्त और नगर विकास विभाग के शीर्ष अधिकारियों से पूछा कि नगर निगम परिसर और विकास परियोजनाओं में किसी खास व्यक्ति के नाम पर समानांतर टैक्स की व्यवस्था कैसे संचालित हो रही है? जबरन ठेकेदारी और उसमें माफिया संस्कृति को किसके संरक्षण में बढ़ावा मिल रहा है?

मुख्यमंत्री के इस आक्रामक तेवर को देखकर बैठक में मौजूद अधिकारियों में सन्नाटा पसर गया। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि जनता के टैक्स के पैसे और विकास कार्यों में कमीशनखोरी का खेल अब किसी भी सूरत में चलने नहीं दिया जाएगा।

ठेकेदारी सिंडिकेट और ‘घंटी’ वाली कमीशन वसूली का पूरा तंत्र

नगर निगम के भीतर चल रहे खेल की परतों की जब पड़ताल शुरू हुई, तो एक बेहद संगठित कॉकस का खुलासा हुआ। सूत्रों के अनुसार, विकास कार्यों—खासकर हॉट मिक्स प्लांट से बनने वाली सड़कों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में चुनिंदा ठेकेदारों का एक समूह सक्रिय था। यह सिंडिकेट आपस में ही यह तय करता था कि किस टेंडर में कौन भाग लेगा, किसकी बिड न्यूनतम रहेगी और किसे काम आवंटित किया जाएगा।

इस प्रक्रिया में जो ठेकेदार काम हासिल करता था, उससे एक निश्चित कमीशन या ‘निजी टैक्स’ वसूला जाता था, जिसे स्थानीय बोलचाल में ‘घंटी बजाना’ कहा जा रहा था। जब एक नए ठेकेदार ने नियमानुसार पंजीकरण कराने की कोशिश की और कॉकस ने बाधा डालते हुए अवैध रकम की मांग की, तो मामला सीधे शासन के संज्ञान में पहुंच गया। शासन तक पहुंची इस शिकायत ने वर्षों से चल रहे संगठित भ्रष्टाचार की नींव हिला दी।

15वें वित्त आयोग के 300 करोड़ रुपये के बजट में बंदरबांट की जांच

मुख्यमंत्री की कड़ी फटकार के बाद अब नगर निगम में 15वें वित्त आयोग से जुड़े वित्तीय लेन-देन की फाइलें तेजी से खंगाली जा रही हैं। इस वित्तीय वर्ष में लगभग 300 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ था, जिसमें सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के लिए करीब 199 करोड़ रुपये और वायु गुणवत्ता सुधार के लिए शेष धनराशि निर्धारित थी।

शुरुआती जांच में यह तथ्य सामने आ रहा है कि विकास परियोजनाओं के प्रस्ताव तैयार करने और उन्हें पास कराने में कुछ ‘खास’ पार्षदों और रसूखदारों के चहेतों को ही प्राथमिकता दी गई। लगभग 70 फीसदी से अधिक कार्य कुछ चुनिंदा वार्डों और प्रस्तावों तक ही सीमित रखे गए। इतना ही नहीं, जो फाइलें पहले 50 से 60 लाख रुपये की थीं, उन्हें संशोधित कर एक करोड़ रुपये से ऊपर तक पहुंचा दिया गया। अब उच्चस्तरीय समिति इन सभी फाइलों के ऑडिट और तकनीकी मूल्यांकन में जुट गई है।

बागी पार्षदों के ज्ञापन से खुला मोर्चा, लखनऊ तक पहुंची गूंज

इस पूरे मामले की चिंगारी काफी समय से सुलग रही थी। नगर निगम से जुड़े कई पार्षदों ने खुले तौर पर इस व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोला था। कुछ पार्षदों ने लिखित शिकायतें दर्ज कराई थीं और सोशल मीडिया के जरिए भी नगर निगम में रसूखदारों के रिश्तेदारों द्वारा की जा रही अवैध उगाही के आरोप लगाए थे।

पार्षदों का आरोप था कि यदि कोई ठेकेदार या प्रतिनिधि सिस्टम के अनुसार काम करना चाहे, तो उसकी फाइलें अटका दी जाती हैं और जब तक ‘अवैध टैक्स’ का भुगतान नहीं होता, काम शुरू नहीं करने दिया जाता। लंबे समय से अनसुनी की जा रही इन शिकायतों पर जब मुख्यमंत्री ने खुद संज्ञान लिया, तो पूरी प्रशासनिक मशीनरी हरकत में आ गई है।

अफसरों को दो टूक: दो दिन में दिखे परिणाम या कार्रवाई भुगतने को रहें तैयार

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जीरो टॉलरेंस नीति को दोहराते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में माफिया संस्कृति का खात्मा सरकार का प्राथमिक संकल्प है। चाहे वह सड़क पर सक्रिय संगठित अपराधी हों या सरकारी विभागों के भीतर बैठकर अवैध वसूली करने वाला सिंडिकेट, कानून सबके लिए समान है।

मंडलायुक्त और नगर आयुक्त को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि टेंडर आवंटन में पूरी पारदर्शिता बरती जाए, तीन स्तरीय चेक प्वाइंट बनाए जाएं और किसी भी बाहरी व्यक्ति या संगठन के दबाव को पूरी तरह खारिज किया जाए। मंडलायुक्त स्तर से यह संकेत दे दिए गए हैं कि अगले 48 घंटों के भीतर ठोस परिणाम सामने आएंगे और जरूरत पड़ने पर अनियमितताओं में लिप्त जिम्मेदार अधिकारियों व कर्मियों के अधिकार भी वापस लिए जा सकते हैं।

शहरी विकास और आम जनता के लिए इस ऐक्शन के मायने

नगर निकायों में पारदर्शिता का सीधा असर आम नागरिकों की बुनियादी सुविधाओं पर पड़ता है। जब टेंडरों में अवैध टैक्स और भारी कमीशनखोरी होती है, तो उसका सीधा असर सड़कों की गुणवत्ता, नाला सफाई, कूड़ा निस्तारण और स्ट्रीट लाइट जैसे नागरिक कार्यों पर पड़ता है।

मुख्यमंत्री के इस कड़े हस्तक्षेप से न केवल छोटे और ईमानदार ठेकेदारों को समान अवसर मिलेंगे, बल्कि विकास परियोजनाओं में लगने वाली सार्वजनिक धनराशि का सही उपयोग सुनिश्चित हो सकेगा। उत्तर प्रदेश शासन ने सभी नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों को भी स्पष्ट संदेश भेज दिया है कि स्थानीय स्तर पर किसी भी प्रकार की समानांतर वसूली पाए जाने पर सीधे आपराधिक धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कराई जाएगी।

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