नवंबर में तुलसी विवाह कब है? जानें 20 या 21 नवंबर की सही तारीख, गोधूलि वेला का सबसे शुभ मुहूर्त

नई दिल्ली: सनातन हिंदू परंपरा में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी और द्वादशी तिथि का आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत पावन और कल्याणकारी महत्व माना गया है। भगवान श्रीहरि विष्णु के चार महीने के योग निद्रा (चातुर्मास) से जागने के तुरंत बाद देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह का उत्सव पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। तुलसी विवाह के दिन माता तुलसी (वृंदा) का पाणिग्रहण संस्कार भगवान विष्णु के विग्रह स्वरूप शालिग्राम जी के साथ वैदिक रीति-रिवाजों और मांगलिक गीतों के बीच पूरे विधि-विधान से संपन्न कराया जाता है। तुलसी विवाह के साथ ही हिंदू धर्म में पिछले चार महीनों से बंद पड़े सभी मांगलिक व शुभ कार्य—जैसे विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, जनेऊ और नए प्रतिष्ठानों का शुभारंभ—विधिवत रूप से फिर से शुरू हो जाते हैं। इस वर्ष नवंबर के महीने में तुलसी विवाह की सही तारीख को लेकर कई लोगों के मन में संशय है कि विवाह 20 नवंबर को एकादशी के दिन मनाया जाए या 21 नवंबर को द्वादशी तिथि पर। आइए जानते हैं पंचांग के अनुसार तुलसी विवाह की सटीक तारीख, गोधूलि वेला का शुभ मुहूर्त, घर पर पूजा करने की बेहद आसान विधि और इसका आध्यात्मिक महत्व।

तुलसी विवाह 2026: 20 या 21 नवंबर? जानिए पंचांग के अनुसार सही तारीख और तिथि

वैदिक पंचांग की गणनाओं के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी का व्रत शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 को रखा जाएगा। वहीं तुलसी विवाह का मुख्य पर्व पारंपरिक रूप से कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार, द्वादशी तिथि का प्रारंभ शनिवार, 21 नवंबर 2026 को प्रातः 06:31 बजे से हो रहा है, जो अगले दिन रविवार, 22 नवंबर 2026 को तड़के 04:56 बजे तक रहेगा। सनातन धर्म में उदयातिथि और प्रदोष काल के आधार पर पर्व मनाने का नियम है, इसलिए गृहस्थ जीवन जीने वाले अधिकांश श्रद्धालु और मंदिर शनिवार, 21 नवंबर 2026 को ही तुलसी विवाह का मुख्य उत्सव आयोजित करेंगे। हालांकि, कुछ परंपराओं और वैष्णव संप्रदायों में एकादशी की संध्या यानी 20 नवंबर की शाम से ही तुलसी विवाह के अनुष्ठानों की शुरुआत कर दी जाती है और द्वादशी के दिन इसका पूर्ण समापन किया जाता है।

तुलसी विवाह के लिए गोधूलि और प्रदोष काल का सबसे शुभ मुहूर्त

हिंदू विवाह संस्कारों की तरह ही तुलसी विवाह का अनुष्ठान भी संध्या के समय यानी गोधूलि बेला और प्रदोष काल में करना शास्त्रों में सर्वोत्तम माना गया है। शनिवार, 21 नवंबर 2026 को विवाह संपन्न कराने के लिए निम्नलिखित शुभ मुहूर्त उपलब्ध रहेंगे:

  • प्रदोष काल व गोधूलि मुहूर्त: शाम 05:25 बजे से शाम 07:05 बजे तक। यह समय शालिग्राम जी की बारात निकालने, तुलसी जी को मंडप में सजाने और वरमाला पहनाने के लिए सबसे फलदायी रहेगा।

  • अमृत चौघड़िया मुहूर्त: शाम 05:25 बजे से शाम 07:02 बजे तक (संध्या पूजन व फेरों के लिए अत्यंत शुभ)।

  • लाभ चौघड़िया मुहूर्त: रात 08:40 बजे से रात 10:18 बजे तक (देर शाम विवाह संपन्न कराने वाले परिवारों के लिए उत्तम)। यदि आप 20 नवंबर यानी एकादशी की संध्या को तुलसी विवाह कर रहे हैं, तो शाम 05:27 बजे से शाम 07:04 बजे तक का प्रदोष काल पूजन के लिए सबसे उपयुक्त माना जाएगा।

घर पर तुलसी विवाह संपन्न कराने की बेहद सरल और प्रामाणिक विधि

तुलसी विवाह का आयोजन घर के आंगन, बालकनी या छत पर जहां तुलसी का पौधा स्थापित हो, वहां बड़े ही सहज तरीके से किया जा सकता है। पूजा शुरू करने से पहले तुलसी के गमले के चारों ओर गन्ने का एक सुंदर मंडप तैयार करें और उस पर लाल चुनरी या तोरण बांधें। गमले को गेरू और चूने से अच्छी तरह सजाएं और उसके पास रंगोली बनाएं। तुलसी के पौधे को एक सुहागन स्त्री की तरह लाल या पीली चुनरी ओढ़ाएं, मांग टीका, चूड़ियां, बिंदी और सिंदूर सहित सोलह श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। इसके बाद तुलसी के गमले के ठीक सामने या दाईं ओर एक साफ लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं और उस पर भगवान शालिग्राम जी की प्रतिमा अथवा शालिग्राम शिला को स्थापित करें। भगवान शालिग्राम को पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराएं, पीले वस्त्र पहनाएं, चंदन का तिलक लगाएं और पीले फूल व तुलसी दल की माला समर्पित करें। ध्यान रखें कि शालिग्राम जी को तुलसी दल अत्यंत प्रिय है, जबकि तुलसी माता की पूजा में स्वयं उन्हें तुलसी दल नहीं चढ़ाया जाता। इसके बाद भगवान शालिग्राम और माता तुलसी के बीच एक सफेद या पीला कपड़ा पर्दे (अंतरपट) की तरह लगाएं। मंगल गीतों और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्रोच्चार के बीच अंतरपट हटाएं और दोनों को एक-दूसरे की ओर से कलावा या मौली से जोड़कर गठबंधन करें। इसके उपरांत तुलसी जी के गमले और शालिग्राम जी की सात बार परिक्रमा (फेरे) कराएं। फेरे पूरे होने के बाद भगवान को सिंघाड़ा, बेर, शकरकंद, मूली, आंवला, खीर और मौसमी फलों का भोग लगाएं। अंत में कपूर और शुद्ध घी के दीपक से माता तुलसी और भगवान शालिग्राम की महाआरती करें और सभी परिजनों व पड़ोसियों में प्रसाद वितरित करें।

कन्यादान का महापुण्य और वैवाहिक बाधाओं से मुक्ति का अचूक उपाय

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिस प्रकार एक पिता अपनी पुत्री का विवाह करके कन्यादान का सर्वोच्च पुण्य अर्जित करता है, ठीक उसी प्रकार जो दंपत्ति या व्यक्ति श्रद्धापूर्वक माता तुलसी का शालिग्राम जी के साथ कन्यादान संपन्न कराता है, उसे करोड़ों कन्यादानों और अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। जिन परिवारों में कन्या नहीं होती, वे लोग अक्सर तुलसी विवाह में कन्यादान का संकल्प लेकर इस महापुण्य के भागीदार बनते हैं। इसके अलावा ज्योतिष शास्त्र में यह भी मान्यता है कि यदि किसी युवक या युवती के विवाह में लगातार अड़चनें आ रही हों, कुंडली में मांगलिक दोष या गुरु चांडाल दोष के कारण रिश्ते टूट रहे हों, तो उन्हें तुलसी विवाह के दिन स्वयं माता तुलसी को सुहाग की सामग्री और शालिग्राम जी को पीले वस्त्र अर्पित करने चाहिए। ऐसा करने से कुंडली के वैवाहिक दोष शांत होते हैं और मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति के मार्ग खुल जाते हैं। वहीं जिन विवाहित जोड़ों के वैवाहिक जीवन में तनाव, अनबन या क्लेश रहता है, वे यदि तुलसी विवाह के दिन एक साथ गठबंधन कर फेरे लें, तो उनके रिश्ते में प्रेम, मिठास और स्थिरता हमेशा बनी रहती है।

जालंधर, वृंदा और भगवान शालिग्राम की पावन पौराणिक कथा

तुलसी विवाह की परंपरा के पीछे पद्म पुराण और शिव पुराण में वर्णित एक अत्यंत रोचक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। प्राचीन काल में जालंधर नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली और पराक्रमी असुर हुआ, जिसकी पत्नी वृंदा परम पतिव्रता और भगवान नारायण की अनन्य भक्त थी। वृंदा के अटूट सतीत्व और पतिव्रता धर्म के प्रभाव के कारण त्रिलोकी का कोई भी देवता या अस्त्र-शस्त्र जालंधर का वध करने में सक्षम नहीं था। अपनी इस अमरता के अहंकार में जालंधर ने स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और हाहाकार मचा दिया। सभी देवताओं की रक्षा और सृष्टि के कल्याण के लिए भगवान विष्णु ने एक मायावी लीला रची और जालंधर का वेश धारण कर वृंदा के सतीत्व को भंग कर दिया। जैसे ही वृंदा का पतिव्रता धर्म खंडित हुआ, भगवान शिव ने रणभूमि में जालंधर का वध कर दिया। जब वृंदा को इस सत्य का पता चला कि उसके आराध्य श्रीहरि ने ही उसके साथ यह छल किया है, तो उसने क्रोध में आकर भगवान विष्णु को पाषाण (पत्थर) बन जाने का शाप दे दिया। भगवान विष्णु ने अपनी भक्त के शाप को सहर्ष स्वीकार किया और वे गंडकी नदी में मिलने वाले ‘शालिग्राम’ पत्थर के रूप में परिवर्तित हो गए। इसके बाद वृंदा ने आत्मदाह कर लिया। वृंदा की पवित्र भस्म से जो दिव्य पौधा उत्पन्न हुआ, उसे भगवान विष्णु ने ‘तुलसी’ नाम दिया और वरदान दिया कि बिना तुलसी दल के वे किसी भी युग में कोई भोग या पूजा स्वीकार नहीं करेंगे। भगवान विष्णु ने अपने वचन को निभाने के लिए कहा कि हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में वे शालिग्राम रूप में तुलसी से विवाह करेंगे, और जो भी भक्त इस विवाह को श्रद्धा से कराएगा, उसे वैकुंठ धाम की प्राप्ति होगी।

तुलसी विवाह के दिन इन 5 बातों का रखें विशेष ध्यान

तुलसी विवाह का पर्व मनाते समय कुछ आवश्यक धार्मिक और वास्तु नियमों का पालन करना अनिवार्य माना जाता है:

  • तुलसी के पत्ते न तोड़ें: एकादशी और द्वादशी दोनों ही तिथियों पर तुलसी के पत्ते तोड़ना सख्त वर्जित होता है। पूजा के लिए आवश्यक तुलसी पत्र एक दिन पूर्व ही तोड़कर रख लें।

  • तामसिक भोजन से पूरी दूरी: तुलसी विवाह के दिन घर में पूरी तरह सात्विक भोजन बनाएं। प्याज, लहसुन, मांसाहार और मदिरा का सेवन भूलकर भी न करें।

  • सुहाग सामग्री का वितरण: विवाह संपन्न होने के बाद तुलसी माता को अर्पित की गई चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर और साड़ी किसी सुहागन महिला या मंदिर के पुजारी की पत्नी को आदरपूर्वक भेंट करें।

  • दीपक प्रज्वलन: तुलसी विवाह की रात तुलसी के पौधे के पास अखंड घी का दीपक जलाएं और घर के मुख्य द्वार, पूजा घर और आंगन में दीये अवश्य रखें।

  • साफ-सफाई और पवित्रता: जिस स्थान पर तुलसी का गमला रखा हो, वहां जूते-चप्पल, कूड़ादान या झाड़ू बिल्कुल न रखें; पवित्र और सुगंधित वातावरण में ही विवाह का अनुष्ठान करें।

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