
नई दिल्ली: देश में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव प्रणाली के खिलाफ मुखर रहे छात्र संगठन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने बड़ा और कड़ा दावा किया है। एक साक्षात्कार के दौरान पूर्व जज ने कहा कि राजधानी दिल्ली में प्रशासन के दबाव और कानूनी शिकंजे के बाद सीजेपी नेताओं द्वारा ‘शांति मुचलका’ (Peace Bond) भरा जाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि यह संगठन अब पूरी तरह खत्म हो चुका है और इस आंदोलन की रीढ़ की हड्डी टूट गई है।
जस्टिस काटजू ने दुनिया भर के ऐतिहासिक आंदोलनों का हवाला देते हुए कहा कि जो नेतृत्व दमन के पहले ही दौर में कानूनी समझौतों और मुचलकों के आगे घुटने टेक दे, वह कभी भी किसी बड़े बदलाव या व्यवस्था परिवर्तन की अगुवाई नहीं कर सकता।
‘बॉन्ड भरते ही खत्म हो जाती है आंदोलन की वैधता’: जस्टिस काटजू
सीजेपी के संस्थापकों और संयोजकों—अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका—के संदर्भ में टिप्पणी करते हुए जस्टिस काटजू ने कहा कि जब किसी आंदोलन के अगुआ ही समझौते की राह चुन लेते हैं, तो उनके पीछे चलने वाले आम कार्यकर्ताओं और युवाओं का मनोबल पूरी तरह बिखर जाता है।
पूर्व न्यायाधीश ने अपने सख्त अंदाज में कहा:
“सीजेपी अब पूरी तरह खत्म हो चुकी है। इसकी रीढ़ की हड्डी टूट चुकी है। जब आपके नेता पुलिस और प्रशासन के सामने जाकर पीस बॉन्ड भर देते हैं और शांति बनाए रखने की अंडरटेकिंग दे आते हैं, तो इसका सीधा मतलब होता है कि आपने अपनी हार स्वीकार कर ली है। इतिहास गवाह है कि जब कोई आंदोलनकारी माफी मांगता है या बॉन्ड भरता है, तो उसका नैतिक प्रभाव शून्य हो जाता है। जो जेल जाने, लाठियां खाने और मुकदमे झेलने का साहस नहीं जुटा सकते, वे क्रांति नहीं कर सकते।”
वीर सावरकर का उदाहरण देकर साधा निशाना
जस्टिस काटजू ने अपने तर्कों को पुख्ता करने के लिए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का उदाहरण दिया।
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उन्होंने कहा कि जब विनायक दामोदर सावरकर ने ब्रिटिश हुकूमत को दया याचिकाएं भेजी थीं, उसके बाद उनका क्रांतिकारी प्रभाव समाप्त हो गया था।
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काटजू ने कहा, “इतिहास में जब-जब किसी नेता ने सत्ता के सामने झुककर लिखित आश्वासन या माफीनामे दिए हैं, उसका जनआंदोलन वहीं दफन हो गया है। सीजेपी के साथ भी ठीक यही हुआ है। कुछ दिन सोशल मीडिया पर ट्रेंड चला लेने से और यूट्यूब पर वीडियो बना लेने से कोई आंदोलन नहीं टिकता; उसके लिए जमीन पर कुर्बानियां देनी पड़ती हैं।”
‘विदेशी फंडिंग के आरोपों ने भी छीनी विश्वसनीयता’
पूर्व न्यायाधीश ने इस बात का भी उल्लेख किया कि हाल के दिनों में सीजेपी नेताओं पर लगे गंभीर वित्तीय आरोपों ने जनता के बीच उनकी छवि को खासा नुकसान पहुंचाया है।
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केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह और भाजपा नेताओं द्वारा अभिजीत दीपके और आशुतोष रांका को अमेरिका व पाकिस्तान से फंडिंग मिलने के दावों का जिक्र करते हुए काटजू ने कहा कि जब किसी संगठन के आर्थिक स्रोतों पर संदेह के बादल घिर जाते हैं, तो आम जनता उससे दूरी बना लेती है।
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उन्होंने कहा कि व्यवस्था पर उंगली उठाने वालों को पहले अपनी शुचिता और पारदर्शी आचरण को सार्वजनिक करना चाहिए।
सीजेपी खेमे की चुप्पी और असंतोष
जस्टिस काटजू की इस तीखी टिप्पणी के बाद राजनीतिक और एक्टिविस्ट हलकों में बहस छिड़ गई है। हालांकि सीजेपी से जुड़े प्रमुख सदस्यों का तर्क रहा है कि प्रशासन ने दुर्भावनापूर्ण तरीके से धारा 107/116 जैसी कानूनी धाराओं का दुरुपयोग कर उन्हें फंसाने की कोशिश की थी और विधिक प्रक्रियाओं का पालन करना किसी भी रूप में आंदोलन से पीछे हटना नहीं है।
बावजूद इसके, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जंतर-मंतर पर हुए हालिया घटनाक्रमों, पुलिसिया कार्रवाई, बॉन्ड भरने की बाध्यता और अब पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज की इस दो-टूक टिप्पणी ने सीजेपी के देशव्यापी विस्तार और उसके नैरेटिव पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
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