नवरात्रि की महानवमी पर ऐसे करें मां सिद्धिदात्री की पूजा, अणिमा-महिमा समेत मिलेंगी सभी सिद्धियां; नोट कर लें शुभ मुहूर्त, भोग, मंत्र और आरती

शारदीय नवरात्रि का पावन उत्सव अपने अंतिम और सबसे फलदायी पड़ाव पर पहुंच चुका है। नौ दिनों तक चलने वाली शक्ति साधना का नौवां दिन यानी महानवमी मां दुर्गा के नौवें अलौकिक स्वरूप ‘मां सिद्धिदात्री’ को पूरी तरह समर्पित होता है। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, जैसा कि इनके नाम से ही स्पष्ट है—’सिद्धि’ यानी संपूर्ण आध्यात्मिक व भौतिक शक्तियां और ‘दात्री’ यानी उन्हें प्रदान करने वाली देवी। मार्कंडेय पुराण और देवी भागवत के अनुसार, ब्रह्मांड की सभी आठ प्रमुख सिद्धियां—अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व और वशित्व केवल मां सिद्धिदात्री की अनुकंपा से ही प्राप्त होती हैं। ऐसा माना जाता है कि स्वयं देवाधिदेव महादेव ने भी इन्हीं शक्ति स्वरूपा की कठोर तपस्या करके सभी सिद्धियों को अर्जित किया था, जिसके फलस्वरूप भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ और वे पूरे संसार में ‘अर्द्धनारीश्वर’ के पावन नाम से पूजे गए। महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूरे विधि-विधान से पूजा करने से भक्त के जीवन से अज्ञान, भय, दरिद्रता और संकट हमेशा के लिए मिट जाते हैं और उसे अटूट यश, बल, ज्ञान व परम शांति की प्राप्ति होती है।

महानवमी पूजन और कन्या पूजन के सबसे सटीक शुभ मुहूर्त

नवरात्रि के नौवें दिन व्रत का पारण, हवन और कन्या पूजन (कंजक) करने का विशेष शास्त्रीय विधान है, जिसके लिए शुभ मुहूर्त का चयन बेहद आवश्यक माना जाता है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, नवमी तिथि का आरंभ 19 अक्टूबर 2026 को सुबह 10:51 बजे हो रहा है, जो अगले दिन 20 अक्टूबर 2026 को दोपहर 12:50 बजे तक मान्य रहेगी।

19 अक्टूबर 2026 को मां सिद्धिदात्री की विधिवत पूजा और हवन के लिए सबसे श्रेष्ठ अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11:43 बजे से दोपहर 12:29 बजे तक रहेगा। इसके अतिरिक्त जो साधक शाम के समय मां की आराधना और संध्या आरती करना चाहते हैं, उनके लिए गोधूलि मुहूर्त शाम 05:49 बजे से शाम 06:14 बजे तक अत्यंत मंगलकारी रहेगा। वहीं, जो श्रद्धालु नवमी का पारण और कंजक पूजन 20 अक्टूबर को सूर्योदय व्यापिनी तिथि में करेंगे, उनके लिए ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04:33 बजे से 05:21 बजे तक, अमृत काल सुबह 06:34 बजे से 08:20 बजे तक और लाभ चौघड़िया मुहूर्त सुबह 10:55 बजे से दोपहर 12:23 बजे तक उपलब्ध रहेगा।

मां सिद्धिदात्री की संपूर्ण चरणबद्ध पूजा विधि और कन्या पूजन का नियम

महानवमी के पावन अवसर पर प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होना चाहिए और स्वच्छ व सात्विक वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा घर या ईशान कोण में स्थापित पूजा वेदी को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें और एक साफ लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर मां सिद्धिदात्री की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। सबसे पहले गणेश जी का स्मरण करें और इसके बाद हाथ में अक्षत, पुष्प और जल लेकर मां के नौवें स्वरूप का ध्यान करते हुए व्रत व पूजन का संकल्प लें।

मां को पंचामृत व शुद्ध जल से प्रतीकात्मक स्नान कराएं, फिर चंदन, रोली, सिंदूर, कुमकुम और अक्षत अर्पित करें। मां सिद्धिदात्री को कमल का पुष्प, विशेष रूप से सफेद या नीला कमल अति प्रिय है; यदि कमल न मिले तो गुड़हल, चंपा, चमेली या अपराजिता के ताजे पुष्प मां के चरणों में अर्पित करें। इसके बाद धूप और गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। मां को नैवेद्य अर्पित करने के बाद नवार्ण मंत्र या बीज मंत्र का कम से कम 108 बार रुद्राक्ष या कमलगट्टे की माला से जाप करें। पूजन के समापन पर दुर्गा सप्तशती का पाठ और हवन अवश्य करें।

हवन के पश्चात नौ कन्याओं (जिनकी आयु 2 से 10 वर्ष के बीच हो) और एक छोटे बालक (जिन्हें बटुक भैरव का स्वरूप माना जाता है) को सादर आमंत्रित करें। आदरपूर्वक उनके चरण धोकर उन्हें स्वच्छ आसन पर बैठाएं, माथे पर कुमकुम और अक्षत का तिलक लगाएं, कलाई पर रक्षासूत्र बांधें और श्रद्धापूर्वक उन्हें हलवा, पूरी और चने का प्रसाद खिलाएं। भोजन के बाद कन्याओं को फल, चुनरी और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा देकर उनके चरण स्पर्श कर अखंड सौभाग्य व सुख-समृद्धि का आशीर्वाद लें।

मां सिद्धिदात्री का प्रिय भोग और नौवें दिन का भाग्यशाली रंग

देवी पुराण के अनुसार, महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री को सात्विक रूप से शुद्ध घी में तैयार किए गए सूजी या आटे का हलवा, फूली हुई पूड़ी और उबले व भुने हुए काले चने का महाभोग लगाना अनिवार्य माना गया है। इस त्रिवेणी भोग के बिना नवमी की पूजा अधूरी मानी जाती है। इसके साथ ही मां को नारियल की बलि यानी जटा वाला सूखा या पानीदार नारियल, खीर और मौसमी फल जैसे अनार या सेब अर्पित करने से साधक की हर मनोकामना शीघ्र पूरी होती है।

रंगों की बात करें तो नवरात्रि के नौवें दिन मोरपंखी हरा रंग (Peacock Green) या जामुनी/बैंगनी रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। मोरपंखी हरा रंग प्रकृति, समृद्धि, नई ऊर्जा और स्थिरता का प्रतीक है। जो भक्त इस रंग के कपड़े पहनकर मां की आराधना करते हैं, उनके मन में आध्यात्मिक एकाग्रता बढ़ती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

मां सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्ति के लिए शक्तिशाली सिद्ध मंत्र

मां के इस दिव्य स्वरूप की साधना करते समय मन को पूरी तरह शांत और एकाग्र रखें। अपनी सुविधा और समय के अनुसार नीचे दिए गए मंत्रों में से किसी एक का कम से कम 11, 21 या 108 बार श्रद्धापूर्वक जप करें:

  • प्रिय एवं सरल बीज मंत्र:

    ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥

  • प्रार्थना श्लोक:

    सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।

    सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

  • देवी ध्यान मंत्र:

    वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृतशेखराम्।

    कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धिदात्री यशस्विनीम्॥

श्रद्धा और भक्ति से करें मां सिद्धिदात्री की पावन आरती

पूजा, मंत्र जप और नैवेद्य समर्पण के बाद कपूर या पंचमुखी दीपक जलाकर खड़े होकर मधुर स्वर में मां की आरती उतारें:

जय सिद्धिदात्री माता, जय सिद्धिदात्री।

भक्तों के दुख हरने वाली, जग की सुखदात्री॥

कमल आसन पर विराजो, मुख पर तेज निराला।

तेरी कृपा से माता, जग में हो उजियाला॥

चार भुजाओं वाली माता, महिमा अपरंपारा।

तेरे चरणों में मैया, जीवन है हमारा॥

ज्ञान और सद्बुद्धि देना, रखना लाज हमारी।

सुख-समृद्धि से भर देना, मैया दुनिया सारी॥

जय सिद्धिदात्री माता, जय सिद्धिदात्री।

सब पर कृपा बरसाने वाली, जग की सुखदात्री॥

आरती के बाद दोनों हाथों से आरती की लौ का स्पर्श अपने मस्तक और नेत्रों से करें तथा हाथ जोड़कर जाने-अनजाने हुई त्रुटियों के लिए मां से क्षमा याचना करें। इसके बाद सभी उपस्थित परिजनों में सात्विक प्रसाद का वितरण करें।

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