पाकिस्तान में 200 साल पुराने ऐतिहासिक ‘राम लीला मंदिर’ को गिराने की साजिश: कमर्शियल प्लाजा बनाने की कोशिश पर भड़का आक्रोश

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों पर सुनियोजित कब्जे और तोड़फोड़ का एक और बेहद गंभीर मामला सामने आया है। पश्चिमोत्तर प्रांत खैबर पख्तूनख्वा के ऐतिहासिक शहर डेरा इस्माइल खान के रहीम बाजार स्थित लगभग 200 साल पुराने प्रसिद्ध ‘राम लीला मंदिर’ को ध्वस्त कर वहां बहुमंजिला कमर्शियल प्लाजा बनाने की गुप्त साजिश रची गई थी। इस पवित्र और प्राचीन धार्मिक स्थल पर अचानक बुलडोजर और तोड़फोड़ की गतिविधियां शुरू होते ही स्थानीय हिंदू समुदाय, नागरिक समाज और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश फैल गया। कार्यकर्ताओं ने मौके पर पहुंचकर विध्वंस की इस अवैध कोशिश को शारीरिक रूप से रुकवा दिया। जनता के बढ़ते आक्रोश, सड़क पर उतरे प्रदर्शनकारियों और मामले के तूल पकड़ने के बाद हरकत में आए स्थानीय प्रशासन के सहायक आयुक्त (असिस्टेंट कमिश्नर) हामिद सिद्दीकी के नेतृत्व में पुलिस बल ने मंदिर परिसर को आधिकारिक तौर पर अपने कब्जे में लेकर मुख्य द्वारों पर ताला लगाकर पूरी तरह सील कर दिया है।

400 संरक्षित सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल है राम लीला मंदिर

रहीम बाजार का यह ऐतिहासिक राम लीला मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि डेरा इस्माइल खान की सदियों पुरानी मिली-जुली सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का अभिन्न अंग है। वक्ताओं और स्थानीय इतिहासविदों के अनुसार, पाकिस्तान के ‘इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड’ (ETPB) और पुरातत्व व संग्रहालय विभाग ने डेरा इस्माइल खान की लगभग 400 प्राचीन इमारतों को सांस्कृतिक विरासत संपत्तियों के रूप में आधिकारिक तौर पर सूचीबद्ध किया हुआ है, जिसमें यह राम लीला मंदिर भी प्रमुखता से शामिल है। कानूनन ऐसी संरक्षित संपत्तियों में किसी भी प्रकार का ढांचागत बदलाव, तोड़फोड़ या व्यावसायिक निर्माण करना पूरी तरह गैरकानूनी और दंडनीय अपराध है। इसके बावजूद भू-माफिया और स्थानीय भ्रष्ट अधिकारियों की सांठगांठ से इस ऐतिहासिक धरोहर को जमींदोज कर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में तब्दील करने का प्रयास किया जा रहा था, जिसने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों और उनकी ऐतिहासिक संपत्तियों की सुरक्षा पर फिर से बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

कथित 2.5 करोड़ रुपये की गुप्त डील और अधिकारियों की मिलीभगत पर उठे सवाल

इस विवाद के सामने आने के बाद स्थानीय नागरिक समाज संगठन के अध्यक्ष सोहेल अहमद आजमी के कार्यालय में हिंदू समुदाय के प्रमुख प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रबुद्ध नागरिकों की एक आपातकालीन संयुक्त बैठक आयोजित की गई। बैठक में पूर्व प्रांतीय विधानसभा सदस्य (MPA) और हिंदू नेता किशोर कुमार तथा सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद नौमान समेत कई गणमान्य लोग शामिल हुए। बैठक के दौरान यह चौंकाने वाला आरोप सामने आया कि बिल्डरों और भू-माफियाओं ने संबंधित नगरपालिका व ट्रस्ट के कुछ अधिकारियों के साथ मिलकर कथित तौर पर लगभग 2.5 करोड़ रुपये की संदेहास्पद डील के तहत मंदिर परिसर में अवैध निर्माण और तोड़फोड़ की अनाधिकृत मंजूरी हासिल कर ली थी। प्रतिभागियों ने सवाल उठाया कि जब किसी अधिकारी के पास संरक्षित विरासत संपत्ति के स्वरूप को बदलने का कानूनी अधिकार ही नहीं है, तो फिर मंदिर की जमीन पर कमर्शियल प्लाजा बनाने का परमिट कैसे जारी किया गया।

पाकिस्तान की नेशनल असेंबली तक मामला ले जाने की तैयारी, एकजुट हुआ समाज

नागरिक समाज और अल्पसंख्यक नेताओं ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि वे शहर की ऐतिहासिक धरोहर और हिंदू आस्था के केंद्र को किसी भी कीमत पर मिटने नहीं देंगे। व्यापारिक संगठनों, स्थानीय व्यापारी संघों, साहित्यकारों और विरासत संरक्षण समितियों ने घोषणा की है कि वे मंदिर को नुकसान पहुंचाने की किसी भी अगली कोशिश के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध आंदोलन शुरू करेंगे। हिंदू समुदाय के प्रतिनिधि किशोर कुमार ने ऐलान किया है कि वे इस पूरे मामले को सीधे पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के स्पीकर और संघीय सरकार के समक्ष उठाएंगे। उन्होंने मांग की है कि 2013 से 2026 के बीच अवैध रूप से बेची या कब्जाई गई सभी धार्मिक संपत्तियों की एक उच्चस्तरीय और निष्पक्ष न्यायिक जांच कराई जाए और मंदिर की जमीन बेचने की साजिश रचने वाले सभी भ्रष्ट अधिकारियों और भू-माफियाओं के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।

सील होने के बाद भी मंदिर के भविष्य को लेकर चिंता बरकरार

यद्यपि प्रशासन ने विरोध के दबाव में आकर फिलहाल मंदिर को सील कर किसी भी तरह के निर्माण और तोड़फोड़ पर तत्काल रोक लगा दी है, लेकिन स्थानीय निवासियों और विरासत प्रेमियों के मन में इमारत के भविष्य को लेकर गहरी चिंता अभी भी बनी हुई है। अतीत में भी पाकिस्तान के कई शहरों में ऐसे मामले देखे गए हैं जहां पहले सार्वजनिक आक्रोश को शांत करने के लिए इमारतों को सील किया गया, और बाद में प्रशासनिक अनदेखी का फायदा उठाकर रातों-रात प्राचीन मंदिरों और गुरुद्वारों को नेस्तनाबूद कर दिया गया। डेरा इस्माइल खान के नागरिकों का कहना है कि प्रशासन केवल सील लगाने की रस्म अदायगी तक सीमित न रहे, बल्कि राम लीला मंदिर के स्वामित्व की स्थिति को सार्वजनिक करे, अवैध परमिटों को तुरंत प्रभाव से रद्द करे और इस दो सदी पुरानी ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण व जीर्णोद्धार का काम सरकारी स्तर पर शुरू कराए।

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