
शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना का सबसे प्रमुख और पावन पड़ाव प्रतिपदा तिथि को घटस्थापना यानी कलश स्थापना करना होता है। हिंदू धर्मग्रंथों में कलश को साक्षात भगवान गणेश, त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और तैंतीस कोटि देवी-देवताओं का साक्षात स्वरूप माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, जब घर में एक बार कलश स्थापित कर दिया जाता है, तो उस पवित्र स्थान पर नौ दिनों के लिए मां आदिशक्ति और संपूर्ण देवलोक का आह्वान हो जाता है। ऐसी स्थिति में पूजा-अर्चना के दौरान शुद्धता, पवित्रता और दैनिक आचरण से जुड़े नियमों का पालन करना बेहद अनिवार्य हो जाता है। अक्सर भक्त उत्साह में कलश स्थापित तो कर लेते हैं, लेकिन उसके बाद जाने-अनजाने कुछ ऐसी गंभीर भूलें कर बैठते हैं जिससे व्रत और साधना का फल निष्फल हो सकता है। यदि आप भी घर में घटस्थापना कर रहे हैं, तो इन तीन प्रमुख गलतियों और पूजा के अनिवार्य नियमों को अच्छी तरह समझ लें।
1. पहली गलती: स्थापित कलश या अखंड ज्योति को हिलाना अथवा स्थान बदलना
घटस्थापना के बाद जो सबसे गंभीर गलती मानी जाती है, वह है स्थापित किए गए कलश या उसके ऊपर रखे नारियल और अक्षत के स्थान से छेड़छाड़ करना। शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है कि एक बार शुभ मुहूर्त में कलश जिस वेदी या पाटे पर स्थापित कर दिया जाए, उसे पूरे नौ दिनों तक विसर्जन से पहले हिलाया या खिसकाया नहीं जाना चाहिए। कई बार सफाई करने या पूजा सामग्री बदलने के फेर में लोग कलश को छूकर इधर-उधर कर देते हैं, जो वास्तु और शास्त्रीय दृष्टिकोण से भारी दोष माना जाता है। इसी प्रकार यदि आपने अखंड ज्योति प्रज्वलित की है, तो उसका स्थान भी नौ दिनों तक नहीं बदलना चाहिए और उसमें घी या तेल डालते समय अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए ताकि ज्योति कभी खंडित न हो।
2. दूसरी गलती: घर को पूरी तरह सूना या बंद छोड़कर बाहर चले जाना
नवरात्रि में कलश स्थापना करने का सीधा अर्थ है कि आपने मां भगवती को अपने घर में एक पूज्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है। जिस घर में घट स्थापित हो और देवी की चौकी सजी हो, उस घर को पूरे नौ दिनों तक कभी भी ताला लगाकर पूरी तरह खाली नहीं छोड़ना चाहिए। परिवार का कम से कम एक सदस्य हमेशा घर में उपस्थित होना चाहिए। मान्यता है कि जिस घर में देवी का वास हो और वहां का दरवाजा बंद या सूना हो जाए, वहां नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश हो सकता है और देवी अप्रसन्न हो जाती हैं। यदि किसी अनिवार्य काम से बाहर जाना भी पड़े, तो घर के पूजा स्थल पर निरंतर प्रकाश और सेवा की व्यवस्था सुनिश्चित होनी चाहिए।
3. तीसरी गलती: तामसिक भोजन, कटिंग-शेविंग और अशुद्ध आचरण
कलश स्थापना के बाद घर की पवित्रता एक मंदिर के समान हो जाती है। ऐसे समय में घर के भीतर प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा या बासी भोजन का प्रवेश पूरी तरह वर्जित माना गया है। इसके अलावा, जो साधक कलश स्थापना करते हैं या व्रत रखते हैं, उन्हें नौ दिनों तक बाल काटना, दाढ़ी बनाना (शेविंग), नाखून काटना और चमड़े की वस्तुओं (जैसे बेल्ट, जूते, पर्स) का पूजा स्थल पर इस्तेमाल करने से सख्त परहेज करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार इन दिनों में ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करना, क्रोध न करना, कटु वचन न बोलना और किसी भी जीव का अनादर न करना ही सच्ची शक्ति साधना है।
घटस्थापना के बाद पूजा के अनिवार्य नियम और विधि
घट स्थापना के बाद प्रतिदिन सुबह और शाम दोनों समय शुद्ध घी का दीपक जलाकर मां दुर्गा की आरती करना अनिवार्य होता है। कलश के पास बोए गए जौ (जवारे) पर प्रतिदिन तांबे के पात्र से थोड़ा-थोड़ा गंगाजल छिड़कना चाहिए ताकि वे हरे-भरे उग सकें, क्योंकि हरे जवारे घर में आने वाली सुख-समृद्धि का प्रतीक माने जाते हैं। मां को हमेशा ताजे लाल पुष्प, रोली, अक्षत, धूप और नैवेद्य अर्पित करें। इसके साथ ही दुर्गा सप्तशती का पाठ या ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ मंत्र की कम से कम एक माला का नियमित जाप करना अत्यंत मंगलकारी सिद्ध होता है।
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