
सनातन पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत कल्याणकारी और मोक्षदायिनी माना गया है। इस पावन तिथि को पूरे देश में विभिन्न नामों से जाना जाता है। उत्तर भारत और विशेष रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात व ब्रज क्षेत्र में इसे ‘डोल ग्यारस’ और ‘जलझूलनी एकादशी’ के नाम से हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, जबकि शास्त्रों में इसे ‘परिवर्तिनी एकादशी’ और ‘पद्मा एकादशी’ कहा गया है। यह एकादशी अपने आप में अत्यंत दुर्लभ और फलदायी मानी गई है, क्योंकि इसी एक दिन जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु और उनके पूर्ण अवतार भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की एक साथ विशेष आराधना की जाती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भी भक्त इस दिन सच्चे मन से उपवास रखकर पूजन और दान-पुण्य करता है, उसे वाजपेय यज्ञ के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है और जीवन के जाने-अनजाने किए गए सभी पापों का नाश हो जाता है।
परिवर्तिनी एकादशी पर किसकी करें पूजा: भगवान विष्णु के वामन अवतार और लड्डू गोपाल की आराधना
परिवर्तिनी एकादशी और डोल ग्यारस के दिन मुख्य रूप से दो दिव्य स्वरूपों की पूजा का विधान है:
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भगवान विष्णु का वामन स्वरूप: चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में विश्राम करते हैं। मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन ही श्रीहरि शयन के दौरान करवट बदलते हैं। इसी कारण इसे ‘परिवर्तिनी एकादशी’ कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के पांचवें अवतार ‘वामन देव’ की पूजा की जाती है, जिन्होंने राजा बलि का अहंकार चूर कर तीनों लोकों को अपने तीन डग में नाप लिया था।
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भगवान श्रीकृष्ण (लड्डू गोपाल जी): डोल ग्यारस के दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की विशेष शोभायात्रा और जलविहार का विधान है। इस दिन घरों और मंदिरों में भगवान को सुंदर पालकी या हिंडोले (डोल) में बैठाकर भव्य जलयात्रा निकाली जाती है और उन्हें पवित्र नदी या सरोवर में स्नान (जलझूलनी) कराया जाता है।
कब से शुरू होगी एकादशी तिथि और क्या रहेगा पूजन का शुभ मुहूर्त
पंचांग की सटीक गणना के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ और समापन समय इस प्रकार रहता है:
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एकादशी तिथि का प्रारंभ: भाद्रपद शुक्ल एकादशी तिथि प्रात:काल से ही प्रभावी हो जाती है।
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उदया तिथि का महत्व: सनातन धर्म में सूर्योदय व्यापिनी उदया तिथि को ही व्रत और पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसलिए साधक उदया तिथि के अनुसार ही दिनभर निर्जला या फलाहार व्रत का संकल्प लेते हैं।
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ब्रह्म मुहूर्त: प्रात:काल 04:35 बजे से 05:22 बजे तक (आत्मचिंतन, स्नान और ध्यान के लिए सर्वोत्तम)
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अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:48 बजे से दोपहर 12:37 बजे तक (दिन का सबसे कल्याणकारी और विजय मुहूर्त)
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अमृत काल / विजय मुहूर्त: दोपहर 02:15 बजे से दोपहर 03:05 बजे तक (दान और धार्मिक संकल्प हेतु उत्तम)
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गोधूलि वेला: शाम 06:18 बजे से शाम 06:42 बजे तक (संध्या कालीन आरती और दीपदान का समय)
शास्त्रों के अनुसार राहुकाल के दौरान कोई भी मांगलिक अनुष्ठान या मुख्य संकल्प नहीं लेना चाहिए। दोपहर के समय पड़ने वाले डेढ़ घंटे के राहुकाल का त्याग कर ही पूजन संपन्न करना शास्त्रसम्मत है।
भगवान श्रीकृष्ण से क्या है डोल ग्यारस का अटूट पौराणिक संबंध
डोल ग्यारस का संबंध द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव और उनकी बाल लीलाओं से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तो उसके 18वें दिन यानी भाद्रपद शुक्ल एकादशी को माता यशोदा ने उनका जलवा पूजन (कुआं पूजन / सूरज पूजन) किया था।
सनातन परंपरा में संतान जन्म के बाद प्रसूता माता की शुद्धि और नवजात शिशु के प्रथम सार्वजनिक दर्शन के लिए ‘जलवा पूजन’ का संस्कार किया जाता है। इसी दिन माता यशोदा भगवान कान्हा को पहली बार घर से बाहर लेकर आईं और उन्हें नए वस्त्र पहनाकर, सुंदर सजे हुए डोले (पालकी) में बैठाकर पूरे गोकुल में भ्रमण कराया गया था। गोकुलवासियों ने इस अवसर पर आनंदोत्सव मनाया था और बालकृष्ण को सरोवर ले जाकर उनका चरणामृत लिया था। तभी से इस तिथि को ‘डोल ग्यारस’ और ‘जलझूलनी एकादशी’ के नाम से मनाया जाता है, जहां भक्त अपने प्रिय लड्डू गोपाल को पालकी में झुलाते हैं।
परिवर्तिनी एकादशी की प्रामाणिक पूजा विधि और जलझूलनी उत्सव के नियम
एकादशी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की साफ-सफाई करें और पवित्र नदी के जल अथवा गंगाजल मिले जल से स्नान करें। इसके बाद स्वच्छ पीले वस्त्र धारण कर सूर्यदेव को अर्घ्य दें और एकादशी व्रत का संकल्प लें।
घर के मंदिर में एक लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान विष्णु, वामन देव और बालकृष्ण लड्डू गोपाल की प्रतिमा स्थापित करें। पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) से भगवान का अभिषेक करें। तत्पश्चात उन्हें पीले चंदन, अक्षत, पीले पुष्प, मौसमी फल और तुलसी दल अर्पित करें। ध्यान रखें कि भगवान विष्णु और कान्हा जी के भोग में तुलसी पत्र का होना अनिवार्य है, अन्यथा भोग स्वीकार नहीं होता।
शाम के समय भगवान को सुंदर पालकी या छोटे हिंडोले में विराजित कर आरती उतारें और मोहल्ले या मंदिर परिसर में ‘डोल’ निकालकर भजन-कीर्तन करें। अंत में एकादशी व्रत की कथा सुनें और रात्रि जागरण कर श्रीहरि के द्वादश अक्षर मंत्र ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करें।
एकादशी व्रत पारण का समय और किन बातों का रखें विशेष ध्यान
एकादशी व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में विधिपूर्वक किया जाए।
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पारण का समय: द्वादशी तिथि के दिन सूर्योदय के तुरंत बाद पारण का श्रेष्ठ समय होता है। पारण हमेशा हरिवासर (द्वादशी की पहली चौथाई अवधि) बीतने के बाद ही करना चाहिए।
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पारण विधि: द्वादशी की सुबह स्नान-ध्यान के बाद ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न, वस्त्र और पीले फलों का दान दें। इसके बाद तुलसी पत्र, पंचामृत या सादा मीठा जल ग्रहण कर व्रत का पारण करें।
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सावधानी: एकादशी के दिन चावल, लहसुन, प्याज और तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग करना चाहिए। इस दिन क्रोध, असत्य भाषण और दूसरों की निंदा करने से बचें तथा पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।
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