पुरुषों में भी चुपके से पैर पसारता है ब्रेस्ट कैंसर, छाती की सख्त गांठ को जिम या फैट समझकर न करें नजरअंदाज

आमतौर पर जब भी समाज में ब्रेस्ट कैंसर का जिक्र छिड़ता है, तो आम धारणा यही बनती है कि यह केवल महिलाओं से जुड़ी एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। गुलाबी रिबन और स्तन कैंसर जागरूकता अभियानों को देखकर अक्सर पुरुष यह मान बैठते हैं कि वे इस बीमारी के दायरे से पूरी तरह सुरक्षित हैं। लेकिन आधुनिक ऑन्कोलॉजी और मेडिकल साइंस की हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। शरीर की शारीरिक बनावट के अनुसार पुरुषों की छाती में भी अल्पविकसित ब्रेस्ट टिशू यानी स्तन ऊतक मौजूद होते हैं। यद्यपि पुरुषों में हार्मोनल बनावट के कारण ये ऊतक विकसित नहीं होते, लेकिन कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि का खतरा वहां भी हमेशा बना रहता है। वैश्विक आंकड़ों के साथ-साथ भारतीय अस्पतालों में भी कुल ब्रेस्ट कैंसर मामलों में लगभग एक प्रतिशत मरीज पुरुष पाए जाते हैं। भले ही संख्या के लिहाज से यह आंकड़ा कम प्रतीत हो, लेकिन पुरुषों के मामले में सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जागरूकता के भीषण अभाव और सामाजिक संकोच के चलते यह बीमारी तब सामने आती है जब वह दूसरे या तीसरे चरण में पहुंच चुकी होती है। छाती या सीने के आसपास किसी भी तरह के असामान्य उभार या बदलाव को केवल जिम का खिंचाव, साधारण चर्बी या मामूली फुंसी मान लेना जीवन के लिए घातक साबित हो सकता है।

पुरुषों में दिखने वाले वो शुरुआती लक्षण जिन्हें कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए

कैंसर विशेषज्ञों और ऑन्कोलॉजिस्ट्स का स्पष्ट कहना है कि पुरुषों में ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती लक्षण काफी हद तक महिलाओं जैसे ही होते हैं, बस जरूरत है अपने शरीर में होने वाले बदलावों को बारीकी से महसूस करने की। पुरुषों के मामले में सबसे आम और प्राथमिक चेतावनी संकेत होता है निप्पल के ठीक नीचे या उसके आसपास एक सख्त, बिना दर्द वाली गांठ का उभरना। महिलाओं की तुलना में पुरुषों की छाती में फैटी टिशू काफी कम होते हैं, इसलिए यह गांठ त्वचा के ठीक नीचे उंगलियों से छूने पर तुरंत महसूस की जा सकती है। इसके अलावा दूसरा बड़ा लक्षण है निप्पल की बनावट में अचानक बदलाव आना, जैसे निप्पल का अंदर की तरफ खिंच जाना या धंसना जिसे मेडिकल भाषा में इनवर्जन कहा जाता है। तीसरा लक्षण छाती की ऊपरी त्वचा पर दिखाई देता है, जहां की स्किन अचानक लाल पड़ने लगती है, उस पर संतरे के छिलके जैसी खुरदुरी बनावट या पपड़ीदार परत जमने लगती है। चौथा और बेहद गंभीर संकेत है निप्पल से किसी भी तरह का असामान्य रिसाव होना, खासकर अगर स्राव में खून या भूरा तरल दिखे तो इसे तुरंत इमरजेंसी मानकर जांच करानी चाहिए। पांचवां लक्षण है बगल यानी आर्मपिट के हिस्से में सूजन आना या वहां छोटी-छोटी गांठें महसूस होना, जो इस बात का संकेत देती हैं कि कैंसर की कोशिकाएं पास के लिम्फ नोड्स तक पहुंच चुकी हैं।

क्या छाती में दिखने वाली हर गांठ कैंसर ही होती है, जानिए इसका सच

छाती में किसी भी तरह की गांठ या सूजन महसूस होते ही तुरंत घबरा जाना या तनाव में आ जाना सही नहीं है, क्योंकि हर गांठ कैंसर नहीं होती। पुरुषों में कई बार सीने के टिशू बढ़ने की एक बेहद आम और सौम्य स्थिति देखी जाती है जिसे चिकित्सकीय भाषा में गाइनेकोमैस्टिया कहा जाता है। यह स्थिति शरीर में टेस्टोस्टेरोन और एस्ट्रोजन जैसे हार्मोनों के प्राकृतिक संतुलन में गड़बड़ी आने, लिवर की किसी पुरानी बीमारी, अत्यधिक मोटापे या कुछ विशेष तरह की दवाओं के लंबे इस्तेमाल की वजह से पैदा हो सकती है। गाइनेकोमैस्टिया में आमतौर पर गांठ दोनों तरफ या छूने पर थोड़ी मुलायम और दर्द भरी हो सकती है, जबकि कैंसर की गांठ अक्सर पत्थर जैसी सख्त, एक ही तरफ और शुरुआती दौर में पूरी तरह दर्दरहित होती है। हालांकि, समस्या यह है कि बाहर से केवल उंगलियों से दबाकर कोई भी व्यक्ति या मरीज खुद यह फैसला नहीं कर सकता कि गांठ साधारण हार्मोनल उभार है या जानलेवा ट्यूमर। इस महीन और जीवन रक्षक अंतर को केवल एक कुशल डॉक्टर ही क्लिनिकल जांच, मेमोग्राफी, अल्ट्रासाउंड या बायोप्सी के जरिए स्पष्ट कर सकता है। इसलिए यदि सीने पर कोई नया उभार लंबे समय से टिका हुआ है, तो घर पर तुक्के लगाने के बजाय अस्पताल जाकर जांच कराना ही समझदारी है।

शर्म, झिझक और अज्ञानता बन रही पुरुषों की जान की सबसे बड़ी दुश्मन

पुरुषों में ब्रेस्ट कैंसर के देर से पकड़े जाने का सबसे बड़ा कारण कोई मेडिकल जटिलता नहीं, बल्कि हमारा सामाजिक ढांचा और पुरुषों का संकोची स्वभाव है। समाज में बनी रूढ़िवादी धारणा के कारण अधिकांश पुरुषों को यह जानकारी ही नहीं होती कि उन्हें भी ब्रेस्ट कैंसर हो सकता है। जब किसी पुरुष को अपने सीने पर कोई गांठ महसूस होती है, तो पहली प्रतिक्रिया इसे किसी चोट का निशान या जिम में भारी वजन उठाने से आई सूजन मानकर नजरअंदाज करने की होती है। कई पुरुष केवल इस झिझक या हीनभावना के शिकार हो जाते हैं कि “मैं मर्द होकर ब्रेस्ट की समस्या के लिए डॉक्टर को कैसे दिखाऊं?” यह झूठी शर्म और हिचकिचाहट उन्हें महीनों तक अपनी परेशानी छुपाने पर मजबूर कर देती है। कई लोग यह सोचकर वक्त काटते रहते हैं कि दर्द तो हो ही नहीं रहा, तो यह गांठ अपने आप गल जाएगी। विशेषज्ञों के अनुसार कैंसर के मामले में दर्दरहित होना ही सबसे बड़ा छलावा होता है। जब तक उस गांठ में दर्द शुरू होता है या त्वचा फटती है, तब तक कैंसर छाती की मांसपेशियों से निकलकर फेफड़ों, हड्डियों या लिवर तक अपनी जड़ें फैला चुका होता है। यही मनोवैज्ञानिक झिझक पुरुषों के लिए सबसे बड़ा जानलेवा रोड़ा बन जाती है।

समय पर सही पहचान ही है सुरक्षित भविष्य की गारंटी, जानिए इलाज के विकल्प

कैंसर के खिलाफ जंग में समय ही सबसे ताकतवर हथियार होता है। अगर पुरुष अपनी झिझक तोड़कर शुरुआती स्टेज पर ही डॉक्टर की चौखट तक पहुंच जाते हैं, तो यह बीमारी पूरी तरह साध्य और नियंत्रित की जा सकती है। पुरुषों में पाए जाने वाले अधिकांश ब्रेस्ट कैंसर हार्मोन रिसेप्टर-पॉजिटिव श्रेणी के होते हैं, जिसका अर्थ यह है कि कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि हार्मोनों पर निर्भर करती है। ऐसे मामलों में सर्जरी के जरिए प्रभावित ऊतक को हटाने के अलावा आधुनिक हार्मोन थेरेपी के जरिए ट्यूमर को दोबारा पनपने से बहुत प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है। इसके अलावा कैंसर के चरण और आनुवंशिक स्थिति के आधार पर रेडिएशन थेरेपी, कीमोथेरेपी और टार्गेटेड दवाओं का उपयोग किया जाता है। यदि आपके परिवार में पहले किसी महिला या पुरुष को ब्रेस्ट या ओवेरियन कैंसर का इतिहास रहा हो, या आपके शरीर में BRCA1 या BRCA2 जैसे जीन में बदलाव हो, तो सतर्कता दोगुनी होनी चाहिए। 60 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों, लिवर की बीमारी से ग्रस्त मरीजों और भारी वजन वाले पुरुषों को अपने शरीर के प्रति अतिरिक्त रूप से सचेत रहना चाहिए। छाती में कोई भी अस्वाभाविक बदलाव दिखे तो बिना एक भी पल गंवाए जनरल सर्जन या मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट से परामर्श लें, क्योंकि एक साधारण सी जांच आपकी जिंदगी बचा सकती है।

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