
भारत में तंबाकू और धूम्रपान को लेकर सामने आए एक ताजा और विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन ने सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और नीति निर्धारकों की नींद उड़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में करीब 44.4 करोड़ ऐसे नागरिक हैं जो स्वयं कभी बीड़ी, सिगरेट या हुक्का नहीं पीते, लेकिन दूसरों के द्वारा छोड़े गए जहरीले धुएं की चपेट में आकर ‘पैसिव स्मोकिंग’ (Secondhand Smoke) का शिकार बन रहे हैं। यह आंकड़ा देश की कुल आबादी के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है और यह दर्शाता है कि धूम्रपान केवल पीने वाले के फेफड़ों को ही नहीं सड़ा रहा, बल्कि उसके आसपास मौजूद निर्दोष परिजनों, बच्चों और सहकर्मियों के जीवन को भी समय से पहले मौत के मुंह में धकेल रहा है। वैज्ञानिकों ने इसे ‘अदृश्य महामारी’ करार देते हुए चेतावनी दी है कि बिना सिगरेट छुए भी करोड़ों लोग उन सभी घातक बीमारियों के मुहाने पर खड़े हैं जो एक भारी चेन-स्मोकर को होती हैं।
चारदीवारी के भीतर सबसे ज्यादा जहर: घर और कार्यस्थल बने मुख्य केंद्र
अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि पैसिव स्मोकिंग का सबसे बड़ा दायरा सार्वजनिक स्थानों के बजाय बंद कमरों, घरों और कार्यस्थलों पर दर्ज किया गया है। भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में पुरुषों द्वारा घर के भीतर, खासकर बच्चों और गर्भवती महिलाओं की मौजूदगी में बीड़ी या सिगरेट पीने का चलन बेहद आम है। अध्ययन के मुताबिक, 44.4 करोड़ प्रभावित लोगों में से 70 फीसदी से अधिक लोग अपने ही घरों के भीतर इस धुएं को सांस के जरिए खींचने के लिए मजबूर हैं। इसके अलावा निजी दफ्तरों, छोटे कारखानों, ढाबों और अनौपचारिक कार्यस्थलों पर वेंटिलेशन की कमी के कारण गैर-धूम्रपान करने वाले कर्मचारी लगातार 8 से 10 घंटे जहरीली हवा में सांस लेते हैं। हवा में घुला यह सिडस्ट्रीम धुआं (Sidestream Smoke) सीधे जलती हुई बीड़ी-सिगरेट के सिरे से निकलता है, जिसमें मुख्य धुएं की तुलना में कई गुना अधिक सांद्रता वाले कार्सिनोजेनिक तत्व पाए जाते हैं।
महिलाओं और मासूम बच्चों पर सबसे गहरा आघात
इस रिपोर्ट का सबसे डरावना और चिंताजनक पहलू यह है कि पैसिव स्मोकिंग का सबसे बड़ा शिकार महिलाएं और नवजात बच्चे हो रहे हैं। अध्ययन के विश्लेषण से पता चलता है कि प्रभावित 44.4 करोड़ लोगों में महिलाओं और 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की संख्या आधी से अधिक है। गर्भवती महिलाओं के पैसिव स्मोकिंग के संपर्क में आने से भ्रूण के विकास में गंभीर रुकावटें आती हैं, जिसके चलते समय से पूर्व प्रसव (Premature Birth), कम वजन वाले बच्चे (Low Birth Weight) और जन्मजात शारीरिक विकृतियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। छोटे बच्चों में दूसरों के धुएं के कारण बचपन का अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, निमोनिया और कान में बार-बार होने वाले गंभीर संक्रमण की दर दोगुनी पाई गई है। कई मामलों में यह नवजात शिशुओं में ‘सडन इन्फेंट डेथ सिंड्रोम’ (SIDS) का भी मुख्य कारण बन रहा है।
दिल का दौरा, स्ट्रोक और फेफड़ों के कैंसर का बढ़ता खतरा
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, जब कोई व्यक्ति दूसरों के छोड़े गए धुएं में सांस लेता है, तो सिगरेट के धुएं में मौजूद 7,000 से अधिक जहरीले रसायन और कम से कम 70 ज्ञात कैंसरकारी तत्व (Carcinogens) रक्तप्रवाह में प्रवेश कर जाते हैं। निकोटीन, कार्बन मोनोऑक्साइड, फॉर्मलाडेहाइड और बेंजीन जैसे खतरनाक यौगिक रक्त धमनियों को सख्त और संकरा कर देते हैं, जिससे रक्त के थक्के (Blood Clots) बनने की आशंका बढ़ जाती है। यही कारण है कि गैर-धूम्रपान करने वाले जो लोग नियमित पैसिव स्मोकिंग के संपर्क में रहते हैं, उनमें कोरोनरी आर्टरी डिजीज (CAD), हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक का खतरा 25 से 30 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। इसके अलावा, ऐसे लोगों में कभी तंबाकू का सेवन न करने के बावजूद लंग कैंसर (फेफड़ों का कैंसर), गले का कैंसर और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) जैसी लाइलाज फेफड़ों की बीमारियां तेजी से विकसित हो रही हैं।
सख्त कानून के बावजूद जमीनी अनुपालन और जागरूकता का अभाव
भारत में सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (COTPA) के तहत सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पूरी तरह प्रतिबंधित है, लेकिन अध्ययन रेखांकित करता है कि निजी घरों, टैक्सियों, सोसायटियों और अनौपचारिक परिसरों में कानून का कोई सीधा नियंत्रण नहीं है। सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब तक समाज में यह जागरूकता नहीं फैलेगी कि घर के भीतर धूम्रपान करना अपने बच्चों को जहर देने के समान है, तब तक इस 44.4 करोड़ के आंकड़े को कम करना असंभव होगा। विशेषज्ञों ने सरकार से मांग की है कि सार्वजनिक धूम्रपान के नियमों को और सख्त किया जाए, जुर्माने की राशि बढ़ाई जाए और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से ‘धूम्रपान-मुक्त घर’ (Smoke-Free Homes) अभियान को मिशन मोड पर चलाया जाए। केवल सिगरेट की डिब्बी पर चेतावनी छापना काफी नहीं है, बल्कि पैसिव स्मोकिंग को एक गंभीर मानवाधिकार और स्वास्थ्य संकट के रूप में देखना होगा।
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