
देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर मचे भारी सियासी हंगामे, विपक्षी दलों के विरोध प्रदर्शनों और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची कानूनी बहसों के बीच भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने अपनी आंतरिक कार्यशैली और नियमों में ऐतिहासिक बदलाव किए हैं। पिछले कुछ हफ्तों के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्तों की अगुवाई में आयोग के भीतर मंथन का ऐसा दौर चला जिसने दशकों पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था को बदलकर रख दिया है। बंद कमरों में बिना किसी औपचारिक रिकॉर्ड के होने वाले नीतिगत फैसलों से लेकर आम नागरिकों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने से मुक्ति दिलाने तक, आयोग ने लगभग 8 बड़े और कड़े फैसले लिए हैं।
इन नीतिगत सुधारों का मकसद न केवल आयोग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाना है, बल्कि आम मतदाताओं और राजनीतिक दलों के बीच चुनाव प्रक्रिया को लेकर उपजे अविश्वास को दूर करना भी है। 23 सितंबर के बाद से सिलसिलेवार तरीके से लागू किए गए इन नए नियमों ने यह साफ कर दिया है कि आयोग अपनी व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और डिजिटल बनाने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है।
बंद कमरों में फैसले लेने का पुराना ढर्रा खत्म, अब हर बैठक का बनेगा लिखित ‘मिनट्स’
चुनाव आयोग के इतिहास में सबसे बड़ा प्रशासनिक सुधार बैठकों की प्रक्रिया को लेकर किया गया है। अब तक आयोग की आंतरिक बैठकों में फैसले तो होते थे, लेकिन उनकी लिखित कार्यवाही या मिनट्स सार्वजनिक या औपचारिक रूप से दर्ज करने की कोई अनिवार्य बाध्यता नहीं थी। 26 सितंबर को हुई ‘फुल कमीशन’ की अहम बैठक के बाद नियमों को पूरी तरह बदल दिया गया है। अब आयोग की किसी भी बैठक से पहले बाकायदा एक विस्तृत एजेंडा तैयार कर सभी आयुक्तों और संबंधित अधिकारियों को पहले से भेजा जाएगा।
इसके अलावा बैठक समाप्त होने के बाद उस चर्चा के आधिकारिक ‘मिनट्स’ यानी बैठक की लिखित डिटेल जारी की जाएगी। आयोग ने यह भी अनिवार्य कर दिया है कि सूचना प्रौद्योगिकी (IT) से जुड़ा कोई भी नया प्रोजेक्ट या डिजिटल बदलाव तभी लागू होगा जब उस पर पहले वरिष्ठ अधिकारियों की समिति (COO) में चर्चा होगी और फिर पूरे आयोग की औपचारिक मंजूरी ली जाएगी। अधिकारियों की विदेश यात्राओं के लिए आयोग की पूर्व अनुमति अनिवार्य कर दी गई है और सभी अधिकारियों की वार्षिक परफॉर्मेंस रिपोर्ट (APAR) हर साल 31 दिसंबर तक पूरी करने का सख्त आदेश जारी किया गया है।
फॉर्म 6 से हटाई गई 2002 की पुरानी शर्त, नए वोटरों को मिली बड़ी राहत
जुलाई महीने में नए वोटरों के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले ऑनलाइन फॉर्म 6 में एक अतिरिक्त कॉलम जोड़ दिया गया था, जिस पर भारी विवाद खड़ा हो गया था। इस कॉलम के जरिए पहली बार वोटर बनने वाले युवाओं से यह घोषणा मांगी जा रही थी कि क्या उनका या उनके किसी परिजन का नाम 2002 से 2005 के दौरान हुए पिछले एसआईआर की मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं।
विपक्ष और नागरिक संगठनों का आरोप था कि यह शर्त नए और प्रवासी वोटरों के लिए अनावश्यक अड़चन पैदा कर रही है। इस पर संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को स्पष्ट किया कि मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के तहत निर्धारित मानक फॉर्म ही सामान्य दिनों में लागू रहेगा। जिन राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां फॉर्म 6 से इस अतिरिक्त शर्त को हमेशा के लिए हटा दिया गया है, जिससे पहली बार वोट बनवाने वाले युवाओं को भारी राहत मिली है।
फर्जी नाम कटवाने के ‘बल्क खेल’ पर ब्रेक, फॉर्म-7 की लिमिट तय
वोटर लिस्ट से किसी का नाम कटवाने के लिए फॉर्म-7 का इस्तेमाल किया जाता है। हाल के दिनों में कई राज्यों से यह गंभीर शिकायतें मिल रही थीं कि राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित होकर असामाजिक तत्व एक साथ हजारों लोगों के नाम कटवाने के लिए ‘बल्क अर्जियां’ (थोक में आवेदन) लगा रहे हैं। आयोग ने इस पर कड़ा संज्ञान लेते हुए 9 अक्टूबर को एक ऐतिहासिक आदेश जारी किया।
नए नियमों के अनुसार, सामान्य दिनों में मतदाता सूची के निरंतर अपडेशन के दौरान कोई भी एक व्यक्ति हर महीने अधिकतम 5 फॉर्म-7 ही दाखिल कर सकेगा। इसके साथ ही चुनावी रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (EROs) को सख्त हिदायत दी गई है कि वे नाम कटवाने की अर्जी लगाने वाले शिकायतकर्ता को व्यक्तिगत रूप से बुलाकर उसका बयान दर्ज करें। सबसे अहम बात यह तय की गई है कि जिस व्यक्ति का नाम हटाने की मांग की जा रही है, उसका पक्ष सुने बिना किसी भी वोटर का नाम सूची से नहीं काटा जा सकता।
नोटिस पाने वालों को दफ्तरों के चक्कर काटने से मिली आजादी
विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान लाखों मतदाताओं को उनके पुराने डेटा से मिलान न होने (अनमैप्ड) या तार्किक विसंगतियों के चलते नोटिस थमाए गए थे। इससे लोगों में डर और असमंजस का माहौल बन गया था और अधिकारियों के दफ्तरों में लंबी कतारें लगने लगी थीं। आयोग ने इस समस्या का मानवीय और व्यावहारिक समाधान निकालते हुए निर्देश दिया कि अब नोटिस पाने वाले किसी भी नागरिक को चुनाव अधिकारी के दफ्तर में हाजिरी लगाने की जरूरत नहीं होगी।
अब बूथ लेवल अधिकारी (BLO) खुद ऐसे मतदाताओं के घर जाएंगे, जरूरी पहचान पत्र और दस्तावेज एकत्र करेंगे और उन्हें सीधे चुनाव आयोग के मुख्य पोर्टल ‘ECINet’ पर अपलोड करेंगे। दफ्तर में बुलाकर सुनवाई केवल अपवाद की स्थिति में ही होगी, और वह भी पहली प्राथमिकता के तौर पर ऑनलाइन माध्यम से की जाएगी। यदि आवश्यक हुआ, तो मतदाता की जगह उसके परिवार का कोई भी वयस्क सदस्य आधिकारिक रूप से अधिकृत होकर सुनवाई में शामिल हो सकेगा। साथ ही रैन बसेरों में रहने वाले बेघर और दिहाड़ी मजदूरों के लिए विशेष हेल्प डेस्क लगाने के निर्देश दिए गए हैं।
राजनीतिक दलों को मिलेगी ‘रीडेबल पीडीएफ’ और छूटे वोटरों के लिए विशेष ड्राइव
विपक्षी राजनीतिक दल लंबे समय से यह मांग कर रहे थे कि चुनाव आयोग द्वारा दी जाने वाली मतदाता सूची स्कैन की गई तस्वीरों (इमेज पीडीएफ) के रूप में होती है, जिसमें सर्च करना या गड़बड़ियों की पहचान करना नामुमकिन होता है। आयोग ने इस मांग को स्वीकार करते हुए फैसला लिया है कि अब मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को बिना फोटो वाली ‘रीडेबल पीडीएफ’ दी जाएगी। टेक्स्ट-सर्च वाली इस डिजिटल लिस्ट से राजनीतिक पार्टियां आसानी से डेटा का विश्लेषण, डुप्लीकेसी की जांच और विसंगतियों की पड़ताल कर सकेंगी।
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