‘भारत में हो रहे आंदोलनों को अमेरिका कर रहा फंड?’ सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू का विस्फोटक दावा

देश में चल रहे विभिन्न विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों के बीच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने एक बेहद सनसनीखेज और विस्फोटक दावा कर दिया है। जस्टिस काटजू ने आशंका जताई है कि भारत में सड़कों पर उतर रहे कुछ आंदोलनों को संयुक्त राज्य अमेरिका (US) गुपचुप तरीके से वित्तीय मदद यानी फंडिंग मुहैया करा रहा हो सकता है। अपने बेबाक बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट्स के लिए हमेशा चर्चा में रहने वाले पूर्व जज के इस बयान ने देश के कानूनी, राजनीतिक और कूटनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।

जस्टिस काटजू ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर इस मुद्दे को उठाते हुए सीधे तौर पर भारत की वैश्विक भू-राजनीतिक स्थिति और अमेरिका की विदेश नीति की कार्यप्रणाली को इससे जोड़ा है। उनका कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब पश्चिमी ताकतें किसी स्वतंत्र देश की घरेलू व्यवस्था को अस्थिर करने के लिए आंतरिक असंतोष और आंदोलनों को हवा देती नजर आ रही हों।

रूस और चीन से भारत की नजदीकी बनी अमेरिका की नाराजगी की वजह?

अपने विस्तृत विश्लेषण में जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने आरोप लगाया कि भारत की मौजूदा स्वतंत्र विदेश नीति वॉशिंगटन के सत्ता प्रतिष्ठान को रास नहीं आ रही है। उन्होंने रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ब्रिक्स (BRICS) संगठन के जरिए ‘ग्लोबल साउथ’ की सशक्त आवाज बनकर उभर रहा है। इसके साथ ही पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बावजूद भारत ने रूस के साथ अपने रणनीतिक, रक्षा और ऊर्जा संबंधों को न केवल बनाए रखा, बल्कि उन्हें नई ऊंचाई दी है।

काटजू के अनुसार, चीन के साथ भी भारत सीमा विवादों के बीच कूटनीतिक संतुलन साधने और आर्थिक बातचीत को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि अमेरिका हमेशा से यह चाहता रहा है कि भारत पूरी तरह से पश्चिमी खेमे का पिछलग्गू बनकर रहे। जब भारत अपनी सामरिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) पर अडिग रहता है और अमेरिका के एजेंडे में पूरी तरह फिट नहीं बैठता, तो वॉशिंगटन परोक्ष रूप से दबाव बनाने के लिए देश के भीतर नागरिक आंदोलनों, मानवाधिकार के मुद्दों और विरोध प्रदर्शनों को टूल के तौर पर इस्तेमाल करने का प्रयास करता है।

हरीश साल्वे भी जता चुके हैं विदेशी फंडिंग और बाहरी दखल की आशंका

यह पहला मौका नहीं है जब देश के किसी शीर्ष कानूनी विशेषज्ञ ने भारतीय आंदोलनों के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ होने का संदेह जताया हो। इससे कुछ ही दिन पहले भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल और वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने भी सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया था कि देश में हाल ही में सिर उठाने वाले कुछ प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग काम कर रही है।

साल्वे ने दावा किया था कि विदेशों में बैठे कुछ यूट्यूबर्स, इन्फ्लुएंसर्स और संगठन देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने के लिए भारी मात्रा में संसाधन झोंक रहे हैं। उन्होंने साफ लफ्जों में कहा था कि ज़मीनी स्तर पर जनता का कोई स्वाभाविक जन-विद्रोह नहीं दिख रहा, बल्कि डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया के जरिए एक बनावटी माहौल खड़ा किया जा रहा है। अब पूर्व जज काटजू के इस बयान ने हरीश साल्वे की उसी थ्योरी को और मजबूती दे दी है।

अमेरिकी सांसदों की चिट्ठी और टाइमिंग पर उठते गंभीर सवाल

जस्टिस काटजू का यह विस्फोटक दावा उस वक्त सामने आया है जब हाल ही में अमेरिका के 6 सांसदों ने विदेश मंत्री मार्को रूबियो को पत्र लिखकर भारत के आंतरिक विरोध प्रदर्शनों पर कार्रवाई की मांग की थी। इस चिट्ठी में प्रमिला जयपाल और इल्हान उमर जैसे नेताओं के हस्ताक्षर थे, जिनका रुख अक्सर भारत विरोधी आख्यानों के प्रति झुका रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब विदेशी राजनेता भारत के घरेलू मामलों और चुनावी प्रक्रियाओं पर टिप्पणी करने लगते हैं, तो इस बात का अंदेशा गहरा हो जाता है कि इसके पीछे कोई अंतरराष्ट्रीय लॉबी सक्रिय है। काटजू ने इसी कड़ी को जोड़ते हुए कहा कि आंदोलनकारियों को मिलने वाला नैतिक और संभावित वित्तीय समर्थन सीधे तौर पर भारत की स्थिरता को प्रभावित करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

राय या हकीकत? आंदोलनकारी नेताओं ने दावों को नकारा

हालांकि, जस्टिस काटजू ने अपने दावे के समर्थन में कोई पुख्ता दस्तावेजी साक्ष्य या प्रत्यक्ष सबूत पेश नहीं किए हैं, जिसके चलते इसे उनकी व्यक्तिगत भू-राजनीतिक राय भी माना जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ, आंदोलनों से जुड़े नेताओं और आयोजकों ने विदेशी फंडिंग के इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है।

प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि जब भी युवा, बेरोजगार या आम जनता अपनी लोकतांत्रिक मांगों और अधिकारों को लेकर आवाज उठाती है, तो सत्ता पक्ष और उनके समर्थक अक्सर ‘विदेशी साजिश’ या ‘फंडिंग’ का ठप्पा लगाकर असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश करते हैं। उनका कहना है कि यदि वास्तव में किसी विदेशी शक्ति का पैसा भारत में आ रहा है, तो केंद्रीय गृह मंत्रालय और वित्तीय खुफिया एजेंसियों को इसकी तत्काल जांच कर तथ्य सामने रखने चाहिए। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की इस टिप्पणी ने देश की आंतरिक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बीच छिपे समीकरणों पर एक नई और तीखी बहस छेड़ दी है।

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