बृजभूषण शरण सिंह को दिल्ली की अदालत का अल्टीमेटम; महिला पहलवानों की अपील पर गरमाया मामला

भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह की मुश्किलें एक बार फिर कानूनी चौखट पर बढ़ती नजर आ रही हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की प्रतिष्ठित राउज एवेन्यू सेशंस कोर्ट ने महिला पहलवानों के कथित यौन उत्पीड़न मामले में बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। अदालत ने बृजभूषण शरण सिंह और सह-आरोपी विनोद तोमर को नोटिस का औपचारिक जवाब दाखिल करने के लिए ‘अंतिम और आखिरी मौका’ (Last and Final Opportunity) दिया है। अदालत ने स्पष्ट और कड़े शब्दों में चेतावनी दी है कि इसके बाद प्रतिवादी पक्ष को जवाब देने के लिए किसी भी सूरत में अतिरिक्त समय नहीं दिया जाएगा।

अदालत के इस कड़े रुख के बाद देश भर में बहुचर्चित रहे इस हाई-प्रोफाइल मामले में एक बार फिर कानूनी हलचल तेज हो गई है। दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर और उसके बाद ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए बरी करने के आदेश को चुनौती देते हुए पीड़ित महिला पहलवानों ने सेशंस कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। पहलवानों का तर्क है कि निचली अदालत का फैसला रिकॉर्ड पर मौजूद गवाहों, बयानों और तकनीकी साक्ष्यों के सही मूल्यांकन पर आधारित नहीं था। बुधवार को जब यह मामला दोबारा सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हुआ, तो जवाब दाखिल न होने पर सेशंस जज ने तल्ख टिप्पणी करते हुए मामले की अगली तारीख तय कर दी और समयसीमा का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया।

‘इसके बाद अतिरिक्त समय नहीं मिलेगा’: कोर्ट रूम में क्या हुआ?

बुधवार को विशेष अदालत में जब महिला पहलवानों की अपील पर कार्यवाही शुरू हुई, तो अदालत के संज्ञान में यह बात आई कि 28 सितंबर को जारी किए गए नोटिस के बावजूद बृजभूषण शरण सिंह और कुश्ती महासंघ के पूर्व सहायक सचिव विनोद तोमर की ओर से अब तक लिखित जवाब दाखिल नहीं किया गया है। सुनवाई के दौरान बृजभूषण शरण सिंह के अधिवक्ता ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (ऑनलाइन माध्यम) के जरिए पेश होकर अदालत से कुछ और मोहलत की गुहार लगाई। बचाव पक्ष की तरफ से दलील दी गई कि अपील से जुड़े सभी कानूनी बिंदुओं और दस्तावेजों का अध्ययन करने के लिए उन्हें कम से कम एक सप्ताह का समय और चाहिए।

इस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए स्पष्ट किया कि मामले को इस तरह बेवजह लंबा नहीं खींचा जा सकता। कोर्ट ने बचाव पक्ष के अनुरोध को सीमित रूप से स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि वे सात दिनों के भीतर अपना औपचारिक जवाब अदालत के रिकॉर्ड पर पेश करें। अदालत ने कड़े लहजे में कहा, “हम आपको जवाब दाखिल करने का आखिरी मौका दे रहे हैं, इसके बाद कोई और अवसर नहीं दिया जाएगा।” अदालत ने इसके साथ ही मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 20 नवंबर के लिए मुकर्रर कर दी। अदालत ने यह भी पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि जब इस अपील पर दोनों पक्षों की मुख्य कानूनी दलीलें शुरू होंगी, तो पूरी न्यायिक कार्यवाही ‘इन-कैमरा’ यानी बंद कमरे में संचालित की जाएगी ताकि किसी भी पक्ष की निजता प्रभावित न हो।

निचली अदालत के बरी करने के फैसले को पहलवानों ने क्यों दी चुनौती?

इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ 3 अगस्त को एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (ACJM) कोर्ट द्वारा सुनाए गए फैसले में निहित है। मजिस्ट्रेट अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल), धारा 354A (यौन उत्पीड़न) और धारा 506 भाग-1 (आपराधिक धमकी) के तहत दर्ज मामले में बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को बरी कर दिया था। निचली अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी की थी कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों को ‘उचित संदेह से परे’ (Beyond Reasonable Doubt) साबित करने में विफल रहा है।

मजिस्ट्रेट कोर्ट के इसी बरी करने के फैसले के खिलाफ देश की शीर्ष महिला पहलवानों ने सेशंस कोर्ट में अपील दाखिल की। पहलवानों ने अपनी अपील में दलील दी है कि निचली अदालत का फैसला कानून के स्थापित सिद्धांतों और बाध्यकारी न्यायिक नजीरों की घोर अनदेखी करता है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि फैसले में रिकॉर्ड पर मौजूद प्रत्यक्षदर्शी गवाहों, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और शिकायतकर्ताओं के बयानों का निष्पक्ष आकलन करने के बजाय ‘चुनिंदा और पक्षपाती विश्लेषण’ किया गया। पहलवानों का कहना है कि यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता के सुसंगत बयानों का जो वैधानिक महत्व होता है, उसे नजरअंदाज कर निचली अदालत ने केवल अनुमानों और अटकलों के आधार पर आरोपियों को राहत दे दी, जो न्याय के प्राकृतिक सिद्धांतों के खिलाफ है।

जंतर-मंतर के ऐतिहासिक धरने से लेकर 1500 पन्नों की चार्जशीट तक का सफर

यह मामला देश के सबसे बड़े खेल और राजनीतिक विवादों में से एक रहा है। देश का नाम अंतरराष्ट्रीय पटल पर रोशन करने वाले ओलंपिक और राष्ट्रमंडल पदक विजेता पहलवानों ने साल 2023 की शुरुआत में दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर महीनों तक धरना-प्रदर्शन किया था। पहलवानों ने तत्कालीन डब्ल्यूएफआई चीफ पर महिला एथलीटों के साथ विदेशों और घरेलू दौरों के दौरान पद के दुरुपयोग और यौन शोषण के बेहद संगीन आरोप लगाए थे। सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद दिल्ली के कनॉट प्लेस थाने में बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई थीं, जिनमें से एक मामला नाबालिग पहलवान की शिकायत पर पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत भी था, हालांकि बाद में उसमें पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी थी।

कनॉट प्लेस पुलिस ने महीनों की विस्तृत जांच, दर्जनों गवाहों के बयानों और तकनीकी विश्लेषण के बाद 15 जून 2023 को अदालत में करीब 1500 पन्नों की विस्तृत चार्जशीट दाखिल की थी। चार्जशीट में बृजभूषण शरण सिंह पर विभिन्न धाराओं में आरोप तय करने की संस्तुति की गई थी। इसके बाद अदालत ने लंबी बहस के बाद आरोप तय किए थे और गवाहियों का सिलसिला चला। ट्रायल कोर्ट द्वारा उन्हें बरी किए जाने के बाद जहां बृजभूषण खेमे ने इसे सत्य की विजय बताया था, वहीं पहलवानों ने न्याय की लड़ाई को ऊपरी अदालतों में जारी रखने का संकल्प लिया था।

दिल्ली पुलिस का रुख और आगामी 20 नवंबर की सुनवाई का महत्व

इस पूरे मामले में दिल्ली पुलिस की भूमिका पर भी अदालत ने पिछले दिनों सवाल उठाए थे। सेशंस कोर्ट ने पिछली तारीखों पर सरकारी वकील से सीधे तौर पर पूछा था कि क्या दिल्ली पुलिस भी राज्य की तरफ से ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले के खिलाफ अपील दायर करने की योजना बना रही है। उस दौरान सरकारी वकील ने अदालत को अवगत कराया था कि कानूनी विभाग और पुलिस मुख्यालय के स्तर पर फैसले की समीक्षा की जा रही है और अपील दाखिल करने को लेकर अभी अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।

अब 20 नवंबर को होने वाली सुनवाई इस मामले में बेहद निर्णायक साबित होने जा रही है। यदि बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर की कानूनी टीम सात दिनों की इस अंतिम मोहलत के भीतर अपना औपचारिक जवाब दाखिल कर देती है, तो सेशंस कोर्ट दोनों पक्षों की अपीलीय दलीलों पर सीधी बहस शुरू करेगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सेशंस कोर्ट के पास अपील के आधार पर पूरे रिकॉर्ड की पुनर्समीक्षा करने, निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखने या फिर मामले को दोबारा विचार के लिए भेजने का व्यापक क्षेत्राधिकार होता है। कोर्ट के कड़े तेवर ने साफ कर दिया है कि देश की निगाहों में चढ़े इस संवेदनशील मुकदमे में अब किसी भी पक्ष को प्रक्रिया में अनावश्यक देरी करने की इजाजत नहीं मिलेगी।

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