महज शक पर किसी को बांग्लादेश नहीं भेज सकते: कलकत्ता हाईकोर्ट ने लगाई शुभेंदु सरकार की डिपोर्टेशन नीति पर रोक

पश्चिम बंगाल में अवैध प्रवासियों और बंगाली भाषी नागरिकों की पहचान को लेकर चल रही सियासी और कानूनी रस्साकशी के बीच कलकत्ता हाईकोर्ट से राज्य प्रशासन को बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने खुली अदालत में सुनवाई के दौरान स्पष्ट कर दिया कि किसी भी व्यक्ति को केवल संदेह या पड़ोसियों के बयानों के आधार पर विदेशी अथवा बांग्लादेशी घुसपैठिया करार देकर देश से बाहर नहीं निकाला जा सकता। जस्टिस सौगत भट्टाचार्य की एकल पीठ ने राज्य सरकार और फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस (FRRO) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए डिपोर्टेशन के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि किसी भी व्यक्ति पर कार्रवाई करने से पहले उसे अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने का पूरा और निष्पक्ष मौका मिलना चाहिए।

दो महीने की गैरकानूनी हिरासत पर भड़के जज, सरकारी वकील से दागे तीखे सवाल

यह पूरा मामला तब अदालत के सामने आया जब एक व्यक्ति की पत्नी ने अपने पति की लंबी हिरासत और उन्हें बांग्लादेश डिपोर्ट किए जाने के आदेश को चुनौती देते हुए याचिका दायर की। याचिकाकर्ता के वकील रबीउल इस्लाम ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल को दो महीने से अधिक समय से डिटेंशन में रखा गया है। वकील के मुताबिक, यह पूरी कार्रवाई केवल कुछ पड़ोसियों द्वारा जताए गए शक और मौखिक दावों के आधार पर की गई, जबकि उनके पास भारत में रहने और नागरिकता से जुड़े वैध दस्तावेज मौजूद हैं। इस दलील को सुनने के बाद जस्टिस भट्टाचार्य ने राज्य सरकार के वकील को आड़े हाथों लिया और पूछा कि जब तक नागरिकता तय करने के लिए वैधानिक और योग्य प्रक्रिया पूरी नहीं की गई थी, तब तक एक व्यक्ति को दो महीने तक हिरासत में रखने का क्या औचित्य था? अदालत ने टिप्पणी की कि बिना तय कानूनी प्रक्रिया का पालन किए किसी भी व्यक्ति को स्वतंत्रता से वंचित नहीं रखा जा सकता।

1970 के दशक से आए लोगों का हवाला और ऐतिहासिक संदर्भ की जटिलता

सुनवाई के दौरान अदालत ने सीमा पार से होने वाले प्रवास के ऐतिहासिक संदर्भों की पेचीदगियों का भी जिक्र किया। जस्टिस भट्टाचार्य ने सवालिया लहजे में कहा कि 1970 के दशक से लेकर अब तक सीमा पार से कितने लोगों ने आवाजाही की है, क्या मौखिक दावों के आधार पर इन सभी की पहचान कर उन्हें वापस भेजना व्यावहारिक रूप से संभव है? कोर्ट ने जोर देकर कहा कि किसी भी व्यक्ति को सीमा पार भेजने का फैसला लेने से पहले अधिकारियों को संबंधित दस्तावेजों की गहनता और बारीकी से जांच करनी चाहिए। केवल स्थानीय स्तर पर उभरे पूर्वाग्रहों या पड़ोसियों की शिकायत को घुसपैठ का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। मामले की गंभीरता, संवैधानिक व्याख्या और नागरिकता के वृहद पहलुओं को देखते हुए जस्टिस भट्टाचार्य ने इस प्रकरण को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेज दिया है ताकि इसे उचित और विशेष खंडपीठ को सौंपा जा सके।

शुभेंदु सरकार की ‘थ्री-डी’ नीति और सीमावर्ती राजनीति का बढ़ता टकराव

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद से ही सीमा पार घुसपैठ को लेकर बेहद आक्रामक रुख अपनाया गया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार ने अवैध प्रवासियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने के लिए ‘डिटेन, डिलीट और डिपोर्ट’ (3D) की नीति की घोषणा की थी। इस नीति के तहत स्थानीय पुलिस और टास्क फोर्स को संदिग्ध व्यक्तियों को होल्डिंग सेंटर्स में रखने और सीमा सुरक्षा बल (BSF) की मदद से तत्काल सीमा पार भेजने के निर्देश दिए गए थे। हालांकि, नागरिक अधिकार संगठनों और विपक्षी दलों का आरोप रहा है कि इस नीति की आड़ में लंबे समय से रह रहे बंगाली भाषी मुस्लिम आबादी और प्रवासी मजदूरों को बिना न्यायिक समीक्षा के निशाना बनाया जा रहा है। राज्य सरकार की दलील है कि भारत-बांग्लादेश की 2,200 किलोमीटर से अधिक लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा की सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन बनाए रखने के लिए सख्त कदम आवश्यक हैं, लेकिन हाईकोर्ट के ताजा रुख ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासनिक सख्ती किसी भी सूरत में कानून के शासन और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं कर सकती।

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