रसोई पर अल नीनो का दोहरा वार: आलू-टमाटर से लेकर कॉफी और मांस तक हुआ महंगा, जानिए क्यों बिगड़ रहा थाली का बजट

जलवायु चक्र में होने वाले अप्रत्याशित बदलावों और प्रशांत महासागर के तापमान में वृद्धि से उपजे ‘अल नीनो’ (El Niño) का सीधा असर अब आम आदमी की रसोई और मासिक बजट पर साफ दिखने लगा है। बेमौसम बारिश, भीषण हीटवेव और सूखे के मिले-जुले असर ने कृषि चक्र को बुरी तरह प्रभावित किया है। नतीजतन, खेत से लेकर मंडी तक सप्लाई चेन बाधित हो गई है और आलू, प्याज व टमाटर जैसी बुनियादी सब्जियों से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रेड होने वाली कॉफी, कोको और पोल्ट्री व मांस उत्पादों की कीमतें नई ऊंचाई पर पहुंच गई हैं। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ‘एग्रीफ्लेशन’ (कृषि आधारित महंगाई) का यह दौर आने वाले महीनों में घरेलू बजट को और अधिक कस सकता है।

सब्जियों की तिकड़ी बेकाबू: आलू, प्याज और टमाटर के बढ़े दाम

भारतीय थाली का मुख्य आधार मानी जाने वाली सब्जियों की कीमतों में तेज उछाल देखा जा रहा है:

  • टमाटर और मौसमी मार: प्रमुख उत्पादक राज्यों जैसे कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में अत्यधिक गर्मी और अनियमित बारिश के चलते टमाटर की फसल पर कीटों और बीमारियों का हमला बढ़ा है। मंडियों में आवक कम होने से खुदरा बाजार में टमाटर के दाम अचानक चढ़ गए हैं।

  • आलू और कोल्ड स्टोरेज का गणित: पिछले सीजन में कम पैदावार और तापमान बढ़ने से आलू के कंदों के आकार पर असर पड़ा। वर्तमान में कोल्ड स्टोरेज से निकलने वाले आलू की मांग अधिक और आपूर्ति सीमित होने से थोक भाव में 20 से 30 फीसदी तक की तेजी आई है।

  • प्याज की सप्लाई पर दबाव: खरीफ और लेट-खरीफ प्याज की रोपाई में मौसम की अनिश्चितता के कारण देरी हुई, जिससे नए माल की आवक पिछड़ गई है और कीमतों में दबाव बना हुआ है।

अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कॉफी और चॉकलेट के दाम रिकॉर्ड ऊंचाई पर

अल नीनो का प्रभाव केवल स्थानीय मंडियों तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक कमोडिटी बाजार भी इसकी चपेट में हैं:

  • वियतनाम और ब्राजील में सूखा: दुनिया के सबसे बड़े रोबस्टा कॉफी उत्पादक वियतनाम और अरेबिका उत्पादक ब्राजील में लंबे सूखे के कारण कॉफी बीन्स के उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्ची कॉफी की कीमतें दशक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं, जिसका असर सीधे कैफे और पैकेज्ड कॉफी के खुदरा पैकेट्स पर पड़ रहा है।

  • कोको और चीनी का संकट: पश्चिमी अफ्रीका में मौसम की मार से कोको की फसल प्रभावित हुई है, जिससे चॉकलेट उद्योग में इनपुट कॉस्ट बढ़ गई है। वहीं, गन्ने की कम पैदावार के चलते चीनी की उपलब्धता पर भी सख्त निगरानी रखी जा रही है।

पोल्ट्री और मांस उत्पादों पर भी असर: चारा हुआ महंगा

मांसाहारी और डेयरी उत्पादों की कीमतों में तेजी का मुख्य कारण पशु आहार (Animal Feed) का महंगा होना है:

  • मक्का और सोयाबीन की कीमतें: पोल्ट्री और डेयरी सेक्टर में चारे के रूप में मक्का और सोयामील का व्यापक उपयोग होता है। अल नीनो के कारण कम बारिश से इन फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ, जिससे चारे की इनपुट लागत बढ़ गई।

  • अंडे और चिकन के दाम: चारे की ऊंची लागत और गर्मियों में पोल्ट्री फार्म्स में बढ़ती मॉर्टेलिटी (मुर्गियों के नुकसान) के कारण पोल्ट्री फार्मर्स ने कीमतें बढ़ाई हैं। यही वजह है कि खुदरा बाजारों में ब्रॉयलर चिकन, अंडे और मटन की कीमतों में 10 से 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

क्या कहता है मौसम और बाजार का पूर्वानुमान?

विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक मानसून के बाद की नई फसलें पूरी तरह मंडियों में नहीं आ जातीं, तब तक खाद्य पदार्थों की कीमतों में बहुत बड़ी नरमी की उम्मीद कम है।

केंद्र और राज्य सरकारें स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक लिमिट, बफर स्टॉक रिलीज और आयात शुल्क में राहत जैसे कदम उठा रही हैं। हालांकि, वैश्विक स्तर पर मौसम का मिजाज स्थिर होने में लगने वाला समय ही यह तय करेगा कि थाली का बजट कब तक सामान्य स्थिति में लौटेगा।

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