राधाष्टमी पर इस समय भूलकर भी न करें पूजा, वरना निष्फल हो जाएगी साधना; जानें राहुकाल और राधा रानी की पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त

सनातन परंपरा में किसी भी व्रत, अनुष्ठान या देवी-देवताओं के जन्मोत्सव का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब वह शास्त्रसम्मत नियमों और सटीक शुभ मुहूर्त के भीतर संपन्न किया जाए। भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि यानी राधा अष्टमी का महापर्व शनिवार, 19 सितंबर 2026 को देशभर में श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया जा रहा है। ब्रज की महारानी और भगवान श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति श्री राधा रानी का प्राकट्य दोपहर (मध्याह्न काल) में हुआ था, इसलिए उनकी मुख्य पूजा दोपहर में करने का शास्त्रीय विधान है।

हालांकि, इस पावन दिन पर पूजा-अर्चना करते समय पंचांग के अशुभ समय का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। शास्त्रों के अनुसार, अशुभ काल विशेषकर ‘राहुकाल’ के दौरान की गई पूजा, संकल्प या नए कार्यों का शुभारंभ निष्फल माना जाता है और उससे अपेक्षित आध्यात्मिक फल की प्राप्ति नहीं होती। आइए विस्तार से जानते हैं कि राधा अष्टमी पर किस समय पूजा करने से बचना चाहिए और श्रीजी की आराधना का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त कौन-सा है।

राधा अष्टमी पर इस समय भूलकर भी न करें पूजा

ज्योतिष और पंचांगीय गणना के अनुसार, शनिवार के दिन राहुकाल सुबह के दूसरे पहर में पड़ता है। शनिवार, 19 सितंबर 2026 को राहुकाल और अन्य अशुभ समय इस प्रकार रहेगा:

  • राहुकाल (अशुभ समय): सुबह 09:11 बजे से सुबह 10:43 बजे तक

  • यमगण्ड काल: दोपहर 01:46 बजे से दोपहर 03:17 बजे तक

  • गुलिक काल: सुबह 06:08 बजे से सुबह 07:40 बजे तक

शास्त्रों में राहुकाल को तामसिक और विघ्नकारी ऊर्जा का समय माना गया है। इसलिए सुबह 09:11 बजे से 10:43 बजे के बीच राधा रानी का पंचामृत अभिषेक, व्रत का मुख्य संकल्प, हवन या कोई नया मांगलिक अनुष्ठान शुरू करने से पूरी तरह बचें। यदि आप पूजा की तैयारी कर रहे हैं, तो सामग्री एकत्र करने का कार्य इस दौरान कर सकते हैं, लेकिन मुख्य विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा, श्रृंगार और भोग अर्पण राहुकाल समाप्त होने के बाद ही करें।

राधा रानी की पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त: 2 घंटे 27 मिनट की अवधि

राधा रानी का प्राकट्य मध्याह्न यानी दोपहर के समय माना गया है, इसलिए राहुकाल बीतने के ठीक बाद दोपहर का समय पूजा के लिए सर्वोत्तम है।

  • अष्टमी तिथि का समापन: 19 सितंबर 2026 को दोपहर 03:26 बजे तक

  • मध्याह्न पूजा का महामुहूर्त: सुबह 11:01 बजे से दोपहर 01:28 बजे तक

  • कुल पूजा अवधि: 2 घंटे 27 मिनट

  • अभिजीत मुहूर्त का दुर्लभ संयोग: दोपहर 11:49 बजे से 12:38 बजे तक (यह समय सभी दोषों को दूर करने वाला और अत्यंत फलदायी माना गया है)

  • अमृत चौघड़िया मुहूर्त: दोपहर 03:17 बजे से शाम 04:49 बजे तक

इस 2 घंटे 27 मिनट के मध्याह्न शुभ काल में पंचामृत से लाड़ली जी का अभिषेक करना, नए वस्त्र व आभूषण पहनाना, सुगंधित इत्र लगाना और प्रिय अरबी (घुइयां) व मालपुआ का भोग लगाना सर्वाधिक शुभ फलदायी माना गया है।

पूजा करते समय इन 3 शास्त्रीय नियमों का रखें ध्यान

  1. अकेली राधा रानी की पूजा न करें: शास्त्रों में निर्देश है कि राधा रानी की पूजा हमेशा भगवान श्रीकृष्ण के साथ युगल स्वरूप में करनी चाहिए। बिना कृष्ण के राधा और बिना राधा के कृष्ण की पूजा अधूरी मानी जाती है।

  2. तुलसी दल और अरबी का भोग: राधा रानी को माखन-मिश्री और अरबी की सात्विक सब्जी का भोग अत्यंत प्रिय है। उनके नैवेद्य में तुलसी का पत्ता अवश्य शामिल करें।

  3. दिशा का चयन: पूजा करते समय साधक का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। पश्चिम या दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पूजा करने से मन में एकाग्रता नहीं बनती।

शुभ मुहूर्त में ‘ॐ ह्रीं राधिकायै नमः’ अथवा ‘राधे-राधे’ महामंत्र का जप करते हुए आरती करने से जीवन के समस्त कष्टों का निवारण होता है और घर में सुख-समृद्धि का स्थायी वास होता है।

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