रामलीला मैदान की महारैली राहुल गांधी के लिए ‘करो या मरो’ की जंग क्यों? अगर 1 नवंबर को नहीं जुटा पाए भीड़ तो हाथ से फिसल जाएगा ज्ञानेश कुमार का मुद्दा

देश की राजनीति में जब भी दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान पर कोई बड़ा जमावड़ा होता है, तो उसका असर सत्ता के गलियारों तक जरूर महसूस किया जाता है। 1 नवंबर को एक बार फिर यही मैदान भारतीय राजनीति के सबसे बड़े शक्ति प्रदर्शन का गवाह बनने जा रहा है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ एक विशाल महारैली का आयोजन कर रहा है। यह केवल एक सामान्य राजनीतिक प्रदर्शन नहीं है, बल्कि इसे राहुल गांधी के नेतृत्व और कांग्रेस संगठन के लिए ‘करो या मरो’ की लड़ाई माना जा रहा है। पिछले कई महीनों से कांग्रेस जिस आक्रामकता के साथ मतदाता सूची में हेरफेर (एसआईआर), वोट चोरी और संवैधानिक संस्थाओं के कथित दुरुपयोग को लेकर ज्ञानेश कुमार को सीधे निशाने पर ले रही है, उस पूरे विमर्श की सफलता या विफलता का दारोमदार इस एक रैली की भीड़ पर टिक गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि यदि रामलीला मैदान में अपेक्षित जनसैलाब नहीं उमड़ा, तो विपक्ष के हाथ से ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की निष्पक्षता का यह सबसे बड़ा सियासी हथियार हमेशा के लिए फिसल जाएगा।

10 लाख की भीड़ जुटाने का भारी भरकम लक्ष्य और संगठन का लिटमस टेस्ट

कांग्रेस आलाकमान ने 1 नवंबर की इस रैली को ऐतिहासिक बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। पार्टी की ओर से दावा किया जा रहा है कि देश भर से करीब 10 लाख लोगों को रामलीला मैदान में जुटाया जाएगा। कांग्रेस महासचिव (संगठन) के. सी. वेणुगोपाल खुद दिन-रात जमीनी तैयारियों की मॉनिटरिंग कर रहे हैं और 200 से अधिक पार्टी पदाधिकारियों को पर्यवेक्षक बनाकर मैदान में उतारा गया है। दिल्ली से सटे राज्यों—विशेषकर हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान—को भीड़ जुटाने के फिक्स कोटा आवंटित किए गए हैं। हरियाणा में सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा को अकेले एक लाख से अधिक कार्यकर्ताओं को राजधानी पहुंचाने का बड़ा जिम्मा सौंपा गया है। बीते एक दशक में पहली बार कांग्रेस सड़क पर इतना विशाल लामबंदी का प्रयास करती दिख रही है। यह रैली केवल चुनाव आयोग को घेरने का मंच नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे का असली लिटमस टेस्ट है। यदि पार्टी अपनी तय रणनीति के अनुसार कार्यकर्ताओं को दिल्ली की सड़कों पर उतारने में नाकाम रहती है, तो यह सीधे तौर पर पार्टी संगठन की सुस्ती और जमीन पर कार्यकर्ताओं की घटती दिलचस्पी को उजागर कर देगा।

अगर रैली फ्लॉप हुई तो हाथ से क्यों निकल जाएगा ज्ञानेश कुमार का मुद्दा?

राजनीति में किसी भी नैरेटिव को जिंदा रखने के लिए जनता का प्रत्यक्ष समर्थन सबसे जरूरी तत्व होता है। कांग्रेस ने पिछले कुछ समय से ईवीएम में तकनीकी गड़बड़ियों के पुराने राग से आगे बढ़कर सीधे चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर, एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया और मतदाताओं के नाम काटे जाने के मुद्दे को कानूनी और जन आंदोलनात्मक रूप दिया है। राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून को रद्द करने की मांग को केंद्रीय मुद्दा बना दिया है। यहां तक कि उन्होंने दिल्ली के व्यापारियों की चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए सार्वजनिक रूप से कहा कि अगर प्रधानमंत्री ‘आरोपी नंबर 4’ ज्ञानेश कुमार को पद से हटा दें, तो यह आंदोलन 30 सेकंड में समाप्त हो जाएगा। लेकिन इस आक्रामकता के साथ एक बहुत बड़ा जोखिम भी जुड़ा है। यदि 1 नवंबर को रामलीला मैदान खाली रह गया या भीड़ उम्मीद से काफी कम रही, तो सत्ताधारी भाजपा को यह कहने का खुला अवसर मिल जाएगा कि देश की जनता को कांग्रेस के इन आरोपों पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है। इससे पहले भी ईवीएम के मुद्दे पर कांग्रेस जनता को बड़े पैमाने पर अपने साथ जोड़ने में असफल रही थी। यदि चुनाव आयुक्त के खिलाफ सड़क पर उतरी यह जंग जनसमर्थन जुटाने में विफल रहती है, तो विपक्ष के पास संसद और अदालतों में इस मुद्दे पर दबाव बनाने का नैतिक आधार ही खत्म हो जाएगा।

‘INDIA’ ब्लॉक के भीतर राहुल गांधी की राजनीतिक धुरी और नेतृत्व पर दांव

इस महारैली का असर केवल कांग्रेस पार्टी तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ के आंतरिक समीकरण भी इससे सीधे प्रभावित होंगे। गठबंधन के कई क्षेत्रीय दल जैसे समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और डीएमके इस पूरे घटनाक्रम पर बारीक नजर बनाए हुए हैं। हालांकि रैली का आह्वान पूरे गठबंधन के नाम पर किया जा रहा है, लेकिन इसकी मुख्य आयोजक और रणनीतिकार खुद कांग्रेस है। यदि राहुल गांधी इस रैली के जरिए दिल्ली के केंद्र में एक विशाल हुजूम खड़ा करने में सफल होते हैं, तो गठबंधन के भीतर उनकी सर्वमान्य नेता की छवि और मजबूत होगी। इससे भविष्य के चुनावों में सीटों के बंटवारे और चुनावी रणनीतियों को तय करने में कांग्रेस को बढ़त मिलेगी। इसके विपरीत, यदि यह शक्ति प्रदर्शन कमजोर साबित हुआ, तो क्षेत्रीय क्षत्रप कांग्रेस की क्षमता पर सवाल उठाना शुरू कर देंगे और राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष की साझा ताकत बिखरने की कगार पर पहुंच सकती है।

आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों और देशव्यापी रैलियों का भविष्य

कांग्रेस ने 1 नवंबर के आयोजन को एक अंतिम गंतव्य के रूप में नहीं, बल्कि एक लंबे देशव्यापी आंदोलन के पहले चरण के तौर पर तैयार किया है। पार्टी की योजना है कि दिल्ली में शक्ति प्रदर्शन के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में चार और बड़ी महारैलियां की जाएंगी और नवंबर के अंत में विभिन्न राज्यों से ‘चलो दिल्ली’ मार्च निकाला जाएगा। इसके अलावा उत्तर प्रदेश सहित 2027 में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए यह रैली एक मजबूत जमीन तैयार कर सकती है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की शर्तों को तय करने और कार्यकर्ताओं में नया जोश भरने के लिए कांग्रेस को दिल्ली में अपनी ताकत दिखानी ही होगी। अगर दिल्ली का यह पहला शो ही कमजोर पड़ गया, तो आगे की चार रैलियों की हवा निकल जाएगी और कार्यकर्ताओं का मनोबल पूरी तरह टूट जाएगा।

1 नवंबर का दिन तय करेगा भारतीय राजनीति का अगला मोड़

दीवाली और त्योहारी सीजन के बीच आयोजित हो रही इस रैली को लेकर दिल्ली पुलिस की कड़ी शर्तें, व्यापारियों की आशंकाएं और सुरक्षा पाबंदियां पहले से ही एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। इन तमाम प्रशासनिक और व्यावहारिक अड़चनों के बीच 10 लाख तो दूर, यदि विपक्ष दो से तीन लाख लोगों को भी ऐतिहासिक रामलीला मैदान में जुटाने में सफल हो जाता है, तो इसे राहुल गांधी की एक बड़ी सियासी जीत माना जाएगा। यह इस बात का स्पष्ट संदेश होगा कि जनता निष्पक्ष चुनावों और संवैधानिक पारदर्शिता के सवाल पर विपक्ष के साथ खड़ी है। लेकिन अगर कुर्सियां खाली रह गईं, तो यह विफलता सिर्फ एक तारीख की विफलता नहीं होगी, बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ छिड़ी पूरी मुहिम पर हमेशा के लिए पूर्णविराम लगा देगी। अब पूरा देश यह देखने के लिए सांस थामे बैठा है कि 1 नवंबर को रामलीला मैदान से राहुल गांधी का राजनीतिक सितारा नई बुलंदी छूता है या फिर एक और बड़ा मुद्दा विपक्ष के हाथों से फिसल जाता है।

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