‘रामायण’ में AI का असली सच: क्या कंप्यूटर ने बनाए किरदार? रिलीज से पहले डायरेक्टर नितेश तिवारी ने तोड़ी चुप्पी

भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी किसी महाकाव्य को बड़े पर्दे पर उतारने की बात होती है, तो दर्शकों की उम्मीदें सातवें आसमान पर पहुंच जाती हैं। इस समय पूरे देश और वैश्विक सिनेमा प्रेमियों की निगाहें निर्देशक नितेश तिवारी की महत्वाकांक्षी त्रि-आयामी फिल्म ‘रामायण’ पर टिकी हुई हैं। मुंबई से लेकर अयोध्या तक और उत्तर से लेकर दक्षिण भारत के हर कोने में दर्शक यह जानने को उत्सुक हैं कि भगवान राम की इस अमर गाथा को आधुनिक युग की तकनीक के साथ किस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। पिछले कुछ हफ्तों से सोशल मीडिया और डिजिटल फोरम पर यह चर्चा जोरों पर थी कि फिल्म में किरदारों के चेहरे, आवाज और यहां तक कि कई महत्वपूर्ण दृश्यों को पूरी तरह जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की मदद से गढ़ा जा रहा है। इस तरह की चर्चाओं ने दर्शकों के एक बड़े वर्ग में यह आशंका पैदा कर दी थी कि कहीं आधुनिक तकनीक के चक्कर में इस पावन गाथा की मानवीय भावनाएं और दिव्यता कमजोर न पड़ जाएं। अब आखिरकार निर्देशक नितेश तिवारी ने खुद सामने आकर इस पूरे विवाद और दर्शकों के मन में उठ रहे तमाम सवालों पर अपनी चुप्पी तोड़ी है और फिल्म निर्माण से जुड़े तकनीकी सत्यों को पूरी स्पष्टता के साथ सामने रखा है।

‘रामायण’ में एआई का सच और नितेश तिवारी का स्पष्टीकरण

नितेश तिवारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि फिल्म ‘रामायण’ में किसी भी जीवित कलाकार के अभिनय, वास्तविक भाव-भंगिमाओं या आत्मा की जगह एआई ने नहीं ली है। उनका कहना है कि आज के दौर में जब एआई तकनीक तेजी से विकसित हो रही है, तब सिनेमा उद्योग में इसके प्रयोग को लेकर कई तरह की भ्रांतियां फैलना स्वाभाविक है। नितेश ने साफ किया कि ‘रामायण’ कोई पूरी तरह कंप्यूटर जनरेटेड एनीमेशन फिल्म नहीं है, बल्कि यह एक भव्य लाइव-एक्शन सिनेमाई अनुभव है, जिसमें हर एक कलाकार ने हाड़-मांस के साथ सेट पर अपना पसीना बहाया है। रणबीर कपूर भगवान राम के रूप में, साई पल्लवी माता सीता के रूप में और यश रावण के किरदार में पूरी तरह वास्तविक अभिनय करते नजर आएंगे। तकनीक का काम केवल उनकी इस यात्रा को भव्यता और विश्वसनीयता प्रदान करना है, न कि अभिनेताओं के प्राकृतिक अभिनय को मिटाकर किसी डिजिटल चेहरे को थोपना। निर्देशक ने बताया कि इस फिल्म की आत्मा हमारी प्राचीन संस्कृति और भावनाओं में बसी है, जिसे कोई भी एल्गोरिदम या कंप्यूटर कोड अपने दम पर पैदा नहीं कर सकता।

वीएफएक्स और एआई के बीच का बारीक अंतर समझना जरूरी

फिल्म निर्माण की तकनीकी बारीकियों पर बात करते हुए नितेश तिवारी ने विस्तार से समझाया कि आज का दर्शक अक्सर वीएफएक्स यानी विजुअल इफेक्ट्स और जेनरेटिव एआई के बीच भ्रमित हो जाता है। ‘रामायण’ में ऑस्कर विजेता कंपनी डीएनईजी (DNEG) और भारतीय निर्माता नमित मल्होत्रा के नेतृत्व में काम कर रही वैश्विक स्तर की वीएफएक्स टीम शामिल है। फिल्म में जिस तकनीक का उपयोग किया जा रहा है, वह मुख्य रूप से अत्याधुनिक विजुअल इफेक्ट्स, एडवांस्ड 3डी स्कैनिंग और डिजिटल बैकड्रॉप्स का एक समन्वित रूप है। एआई का इस्तेमाल केवल डेटा प्रोसेसिंग, जटिल विजुअल रेंडरिंग की गति को बढ़ाने और अत्यधिक जटिल पृष्ठभूमि को तराशने जैसे सहायक तकनीकी स्तरों पर किया गया है, ताकि प्रोडक्शन प्रक्रिया को गति दी जा सके। इसका तात्पर्य यह कतई नहीं है कि कहानी, संवाद या दृश्य संरचना को एआई ने तैयार किया है। तकनीकी टीमों ने हजारों कलाकारों की मेहनत से अयोध्या की भव्य वास्तुकला, दंडकारण्य के घने जंगल और लंका की स्वर्णिम संरचनाओं को कंप्यूटर जनरेटेड इमेजरी की मदद से वास्तविकता के सबसे करीब लाकर खड़ा किया है।

पात्रों की प्रामाणिकता और पौराणिक मर्यादा का पूरा सम्मान

भारतीय जनमानस के लिए रामायण केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की गहरी आस्था और जीवन दर्शन का अभिन्न अंग है। ऐसे में किसी भी प्रकार का कृत्रिम या भावहीन डिजिटल प्रयोग दर्शकों को आहत कर सकता था। इस संवेदनशीलता को स्वीकार करते हुए नितेश तिवारी ने दोहराया कि उन्होंने हर किरदार के चयन और प्रस्तुति में अत्यंत सतर्कता बरती है। कलाकारों के चेहरे के सूक्ष्म भाव, आंखों की नमी और संवाद अदायगी का एक-एक शब्द पूरी तरह मौलिक है। डी-एजिंग जैसी तकनीकों का सहारा यदि कहीं लिया भी गया है, तो वह केवल किरदारों के कालक्रम और उम्र के विभिन्न चरणों को सहज रूप से पर्दे पर उतारने के लिए एक परिष्कृत टूल के रूप में हुआ है, जैसा कि हॉलीवुड के शीर्ष सिनेमा में मार्वल या जेम्स कैमरून की फिल्मों में देखने को मिलता है। निर्देशक के अनुसार, जब दर्शक सिनेमाघरों में बैठेंगे, तो उन्हें पर्दे पर तकनीकी दिखावा नहीं, बल्कि उन किरदारों के त्याग, धर्म, प्रेम और संघर्ष की जीवंत अनुभूति होगी, जो सदियों से हमारे समाज की चेतना को दिशा देते आए हैं।

भारतीय सिनेमा के लिए एक नया तकनीकी और सांस्कृतिक मील का पत्थर

‘रामायण’ न केवल भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े बजट वाली फिल्मों में से एक है, बल्कि यह वैश्विक मंच पर भारतीय संस्कृति को तकनीकी शिखर के साथ प्रस्तुत करने का एक युगांतरकारी प्रयास भी है। मुंबई की फिल्म सिटी से लेकर अंतरराष्ट्रीय पोस्ट-प्रोडक्शन स्टूडियो तक हजारों विजुअल आर्टिस्ट दिन-रात एक करके इस महाकाव्य को आकार दे रहे हैं। नितेश तिवारी के इस आधिकारिक स्पष्टीकरण के बाद अब उन सभी अटकलों पर पूर्ण विराम लग गया है, जिनमें फिल्म को अत्यधिक रोबोटिक या डिजिटल प्रयोग बताया जा रहा था। यह साफ हो चुका है कि फिल्म में तकनीक कहानी की दासी है, उसकी स्वामी नहीं। दर्शक अब आश्वस्त हो सकते हैं कि वे बड़े पर्दे पर एक ऐसी कालजयी कृति का गवाह बनने जा रहे हैं, जहां भारतीय सांस्कृतिक जड़ों की गरिमा और विश्वस्तरीय तकनीकी शिल्प एक साथ मिलकर एक अविस्मरणीय सिनेमाई संसार का निर्माण करेंगे।

 

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