
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और इसके आसपास के इलाकों में अपनी गाढ़ी कमाई से जमीन या मकान खरीदने वाले सैकड़ों लोगों के पैरों तले उस वक्त जमीन खिसक गई, जब प्रशासन ने एक बेहद कड़ा और अप्रत्याशित फैसला सुनाया। लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए), जिला प्रशासन और राजस्व विभाग की संयुक्त जांच के बाद शहर के कई प्रमुख और बाहरी इलाकों में अवैध रूप से बेची गई जमीनों की रजिस्ट्रियों को बड़े पैमाने पर निरस्त (कैंसिल) करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली और दिल दहला देने वाली बात यह है कि जिन लोगों ने लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करके इन जमीनों की रजिस्ट्री कराई थी, उन्हें प्रशासन की तरफ से एक भी रुपये का मुआवजा या वित्तीय राहत नहीं दी जाएगी। बिना लेआउट पास कराए, ग्राम समाज, तालाब, डूब क्षेत्र और सरकारी ग्रीन बेल्ट की जमीनों पर प्लॉटिंग करने वाले जालसाज प्रॉपर्टी डीलरों के चक्कर में फंसे आम मध्यमवर्गीय खरीदारों के लिए यह किसी दोहरे सदमे से कम नहीं है।
किन इलाकों में गिरी गाज और क्यों रद्द हो रही हैं सैकड़ों रजिस्ट्रियां?
लखनऊ के सुल्तानपुर रोड, किसान पथ, फैजाबाद रोड, मोहान रोड, कानपुर रोड, रायबरेली रोड और सीतापुर रोड से सटे ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों से प्रॉपर्टी डीलरों ने अवैध कॉलोनियों का जाल बिछा रखा था। राजस्व विभाग और एलडीए की विशेष जांच टीमों ने पाया कि सैकड़ों बीघा सरकारी जमीन, चकरोड, ऊसर, नाला और तालाब की सुरक्षित भूमि को कूट रचित दस्तावेजों के सहारे प्राइवेट लैंड घोषित कर दिया गया। इसके बाद छोटे-छोटे टुकड़ों में प्लॉट काटकर आम जनता को बेच दिया गया और सब-रजिस्ट्रार दफ्तरों से उनकी रजिस्ट्रियां भी करा दी गईं। अब शासन के कड़े निर्देश के बाद जब जमीनों के खसरा-खतौनी और मूल अभिलेखों की गहन पड़ताल हुई, तो यह बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया। नियमों के मुताबिक, सरकारी या प्रतिबंधित श्रेणी की जमीनों पर किसी भी प्रकार का निजी मालिकाना हक मान्य नहीं होता, इसलिए उप-निबंधक कार्यालयों में दर्ज इन सभी रजिस्ट्रियों को शून्य (शून्य और अमान्य) घोषित करने की कानूनी कार्रवाई शुरू हो चुकी है।
मुआवजा न मिलने की क्या है वजह, खरीदारों पर क्यों फूटा दोहरा संकट?
प्रशासन के इस सख्त रुख से सबसे बड़ा झटका आम खरीदारों को लगा है, जिन्होंने अपने जीवन भर की जमा-पूंजी इन प्लॉट्स में लगा दी थी। जिला प्रशासन ने साफ कर दिया है कि किसी भी अवैध कब्जे या अवैध रूप से खरीदी गई सरकारी जमीन पर कोई सरकारी मुआवजा नहीं दिया जाएगा। उत्तर प्रदेश रेरा (UP RERA) और विकास प्राधिकरण के नियमों के अनुसार, जब कोई जमीन मूल रूप से गैर-कानूनी या विकास प्राधिकरण से अनअप्रूव्ड (अवैध) होती है, तो उस पर किया गया कोई भी निर्माण अतिक्रमण माना जाता है। ऐसे में न केवल उन जमीनों पर बने मकानों और बाउंड्री वॉल को बुलडोजर चलाकर ध्वस्त किया जाएगा, बल्कि वहां रहने वालों को किसी भी पुनर्वास योजना का लाभ भी नहीं मिलेगा। कानूनन यह माना जा रहा है कि खरीदारों ने बिना वैधानिक पड़ताल और एलडीए से स्वीकृत लेआउट देखे निजी जोखिम पर जमीन खरीदी थी, इसलिए सरकार इसके नुकसान की भरपाई नहीं करेगी।
भूमाफियाओं पर गैंगस्टर एक्ट और जालसाजों की संपत्ति कुर्क करने की तैयारी
इस पूरे प्रकरण में केवल रजिस्ट्रियां रद्द करने तक ही कार्रवाई सीमित नहीं रहेगी। उत्तर प्रदेश सरकार के सख्त ‘जीरो टॉलरेंस’ निर्देश के तहत उन सभी भूमाफियाओं, बिल्डरों और तथाकथित प्रॉपर्टी डीलरों की पहचान कर ली गई है जिन्होंने भोले-भाले लोगों को धोखे में रखकर यह जमीने बेचीं। पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टीमें इन कॉलोनाइजरों के खिलाफ धोखाधड़ी (धारा 420), कूट रचना और सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम के तहत मुकदमे दर्ज कर रही हैं। साथ ही, कई बड़े भूमाफियाओं के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई करते हुए उनकी निजी संपत्तियों को कुर्क करने की प्रक्रिया भी पाइपलाइन में है, ताकि उनसे रकम वसूल कर कानूनी प्रक्रिया के तहत निपटारा किया जा सके। हालांकि, कानूनी प्रक्रिया की लंबी अवधि को देखते हुए आम खरीदारों के हाथ तत्काल कोई राहत आती दिखाई नहीं दे रही है।
जमीन खरीदने से पहले इन जरूरी सावधानियों का रखें विशेष ध्यान
लखनऊ और उत्तर प्रदेश के किसी भी जिले में जमीन खरीदते समय आम नागरिकों को कुछ बेहद महत्वपूर्ण और कानूनी बिंदुओं की जांच अवश्य कर लेनी चाहिए, ताकि वे इस तरह की धोखाधड़ी से बच सकें। सबसे पहले संबंधित विकास प्राधिकरण (जैसे LDA) की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर यह सुनिश्चित करें कि जिस कॉलोनी में आप प्लॉट ले रहे हैं, उसका लेआउट अप्रूव्ड है या नहीं। दूसरा, जमीन का 12 साला (बारहसाला) रिकॉर्ड और तहसील से खतौनी निकालकर यह पुष्टि करें कि वह जमीन श्रेणी 5 या 6 (ग्राम समाज, बंजर, चकरोड, नवीन परती या तालाब) के अंतर्गत तो नहीं आती। तीसरा, केवल सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में बैनामा या रजिस्ट्री हो जाने का मतलब यह कतई नहीं होता कि जमीन कानूनी रूप से वैध है; रजिस्ट्री केवल लेन-देन का प्रमाण होती है, जमीन के टाइटल या मास्टर प्लान की वैधता का नहीं। जब तक दाखिल-खारिज (दाखिल खारिज) और एलडीए का एनओसी न हो, किसी भी निजी डीलर के बहकावे में आकर टोकन मनी या पूरा पैसा कतई न फंसाएं।
जनरेटिव एआई और डिजिटल सर्च में छाया लखनऊ लैंड रजिस्ट्री विवाद
आज के आधुनिक डिजिटल युग में जब गूगल एआई ओवरव्यूज, बिंग कोपायलट और तमाम सर्च इंजनों पर लोग रियल एस्टेट से जुड़े कानूनों और खबरों को तुरंत खंगालते हैं, लखनऊ में रजिस्ट्री कैंसिलेशन का मुद्दा इंटरनेट पर ट्रेंड कर रहा है। प्रभावित क्षेत्रों के लोग और संभावित खरीदार सर्च कर रहे हैं कि लखनऊ की कौन-कौन सी कॉलोनियां अवैध घोषित की गई हैं और अपनी रजिस्ट्री को सुरक्षित कैसे रखा जाए। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भू-अभिलेखों के डिजिटलाइजेशन और ड्रोन सर्वे के जरिए अवैध कब्जों की पहचान किए जाने से इस तरह के फर्जीवाड़े अब तेजी से पकड़ में आ रहे हैं। अगर आपने भी राजधानी के बाहरी इलाकों में हाल ही में कोई प्लॉट खरीदा है, तो तुरंत अपने संबंधित तहसील और एलडीए कार्यालय से अपने भूखंड के मूल दस्तावेजों की सत्यता की जांच करा लें।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया