शारदीय नवरात्रि में अष्टमी और नवमी तिथि का फेर: क्या एक ही दिन होगा कन्या पूजन?

शारदीय नवरात्रि के पावन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग दिव्य स्वरूपों की आराधना के बाद भक्तों को सबसे अधिक प्रतीक्षा महाअष्टमी और महानवमी की होती है। ये दोनों तिथियां नवरात्रि व्रत का सबसे महत्वपूर्ण और फलदायी पड़ाव मानी जाती हैं। इन्हीं पावन तिथियों पर घरों और मंदिरों में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हवन-यज्ञ संपन्न कराए जाते हैं और नौ कन्याओं को साक्षात नवदुर्गा का स्वरूप मानकर उनका चरण वंदन, पूजन और भोजन कराकर व्रत का पारण किया जाता है। पंचांग में तिथियों के घटने-बढ़ने और सूर्योदय व्यापिनी गणना के चलते कई बार अष्टमी और नवमी के एक ही दिन पड़ने या कन्या पूजन को लेकर असमंजस की स्थिति बन जाती है। ऐसे में यह जानना अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि शास्त्रीय नियमों के अनुसार कन्या पूजन और हवन किस दिन और किस शुभ मुहूर्त में करना श्रेष्ठ फलदायी रहेगा।

वैदिक ज्योतिष और धर्मशास्त्रों के अनुसार नवरात्रि की प्रत्येक तिथि का निर्धारण सूर्योदय कालीन तिथि यानी उदयातिथि और संधि काल के आधार पर तय होता है। जब किसी एक तिथि का क्षय होता है या कोई तिथि दिन के मध्य में शुरू होकर अगली सुबह तक खिंचती है, तो उसी आधार पर अष्टमी और नवमी के पूजन की तिथियों का निर्धारण किया जाता है। महाअष्टमी मां महागौरी को समर्पित होती है, जबकि महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की विशेष अनुकंपा प्राप्त करने के लिए अनुष्ठान किए जाते हैं। दोनों तिथियों का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व अलग-अलग है, इसलिए शुभ मुहूर्त और शास्त्रीय मर्यादा का ध्यान रखना हर साधक के लिए अनिवार्य माना गया है।

क्या अष्टमी और नवमी का मान्य एक ही दिन रहेगा? धर्मसिंधु और पंचांग का नियम

हिंदू धर्मग्रंथों जैसे ‘धर्मसिंधु’ और ‘निर्णयसिंधु’ में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जब अष्टमी तिथि दोपहर के बाद समाप्त हो रही हो और नवमी तिथि का प्रवेश हो रहा हो, तो उस विशेष समय को ‘संधि काल’ कहा जाता है। संधि काल में मां चामुंडा की विशेष पूजा की जाती है, जिन्होंने चंड और मुंड नाम के राक्षसों का वध किया था। यदि अष्टमी तिथि सूर्योदय के समय मौजूद है, तो उदयातिथि के नियम के अनुसार पूरे दिन महाअष्टमी का व्रत और पूजन ही शास्त्रसम्मत माना जाता है।

यदि नवमी तिथि दोपहर के बाद लग रही हो और अगले दिन सूर्योदय के समय भी विद्यमान रहती है, तो दोनों पर्व अलग-अलग दिन मनाए जाते हैं। हालांकि, जो गृहस्थ साधक अपनी कुल परंपरा के अनुसार अष्टमी को कन्या पूजन करते हैं, वे अष्टमी के दिन ही कन्याओं को जिमाते हैं, जबकि नवमी को कुलदेवी का पूजन करने वाले परिवार नवमी तिथि के दिन ही कन्या भोज का आयोजन करते हैं। यदि पंचांग में किसी तिथि का क्षय हो रहा हो, तभी एक ही दिन अष्टमी और नवमी दोनों का पूजन संपन्न करने का विशेष विधान लागू होता है।

कन्या पूजन का शुभ मुहूर्त और सही शास्त्रीय विधि

कन्या पूजन को कुमारिका पूजन भी कहा जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार 2 वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक की नौ कन्याओं और साथ में एक बालक (बटुक भैरव) को आदरपूर्वक आमंत्रित किया जाना चाहिए। कन्या पूजन के लिए प्रात:काल का समय सबसे श्रेष्ठ और मंगलकारी माना गया है।

अष्टमी या नवमी के दिन सुबह स्नान-ध्यान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। सबसे पहले आमंत्रित कन्याओं के पैर स्वच्छ जल या दूध मिश्रित जल से धोएं और उन्हें साफ आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठाएं। इसके बाद उनके मस्तक पर कुमकुम, अक्षत और रोली का तिलक लगाएं और कलाई पर कलावा (मौली) बांधें। मां दुर्गा को भोग लगाए गए सात्विक हलवा, पूरी और काले चने का प्रसाद कन्याओं को श्रद्धापूर्वक परोसें। भोजन के उपरांत कन्याओं को फल, सामर्थ्यानुसार दक्षिणा और उपहार भेंट करें। अंत में सभी कन्याओं के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लें, क्योंकि उनके आशीर्वाद के बिना नवरात्रि के नौ दिनों की साधना अधूरी मानी जाती है।

नवरात्रि हवन का समय और आवश्यक नियम

नवरात्रि के अनुष्ठान की पूर्णता हवन के बिना संभव नहीं है। महानवमी के दिन या अष्टमी की रात को निशा काल में हवन करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। हवन के लिए प्रात: काल ब्रह्म मुहूर्त से लेकर अभिजीत मुहूर्त (दोपहर लगभग 11:45 बजे से 12:35 बजे के बीच) का समय सबसे फलदायी माना गया है।

हवन कुंड में आम की सूखी लकड़ियों, कपूर और उपलों की मदद से अग्नि प्रज्वलित की जाती है। हवन सामग्री में तिल, जौ, चावल, गाय का शुद्ध घी, गुगल, लोबान, बताशा, सूखा नारियल (गोला) और खीर मिलाकर आहुतियां दी जाती हैं। नवार्ण मंत्र “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” और दुर्गा सप्तशती के विभिन्न अध्यायों के मंत्रों के साथ 108 या कम से कम 21 आहुतियां समर्पित करनी चाहिए। हवन के अंत में पूर्णाहूति के समय सूखे नारियल में कलावा बांधकर, उसमें घी भरकर अग्नि देव को अर्पित किया जाता है, जिसके बाद आरती संपन्न होती है।

व्रत पारण का समय और किन बातों का रखें विशेष ध्यान

कन्या पूजन और हवन संपन्न होने के बाद ही नवरात्रि के नौ दिनों के उपवास का पारण किया जाता है। नवमी तिथि के समापन या दशमी तिथि के आरंभ में पारण करना सबसे उत्तम माना गया है। पारण के समय माता के भोग में चढ़ाए गए काले चने और हलवे का प्रसाद ग्रहण करके ही उपवास खोलना चाहिए।

पारण के दिन लहसुन, प्याज या तामसिक भोजन का प्रयोग घर में बिल्कुल न करें। यदि आपने घर में अखंड ज्योति जलाई है, तो उसे स्वयं शांत होने दें, जबरन बुझाने की भूल न करें। कलश पर रखे नारियल को प्रसाद के रूप में परिवार के सभी सदस्यों में बांटना चाहिए और बोए गए ज्वारे (जौ) को किसी पवित्र नदी, जलाशय या पीपल के पेड़ की जड़ में विसर्जित कर देना चाहिए। इस प्रकार शास्त्रीय विधि-विधान और शुद्ध मन से किया गया पूजन मां भगवती की असीम कृपा और घर में सुख-समृद्धि का संचार करता है।

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