
पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के भू-राजनीतिक फलक पर एक बार फिर बारूद की गंध फैलने लगी है और इस बार निशाना सीधे दुनिया की ऊर्जा जीवनरेखा यानी सऊदी अरब का तेल तंत्र बना है। यमन में सक्रिय ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के रणनीतिक ठिकानों पर किए जा रहे ताबड़तोड़ मिसाइल और ड्रोन हमलों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में खलबली मचा दी है। राजधानी रियाद स्थित किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से लेकर धाहरान में दिग्गज तेल कंपनी सऊदी अरामको के मुख्यालय तक को निशाना बनाए जाने की घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि यह लड़ाई केवल क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पूरे सैन्य घटनाक्रम पर बेहद आक्रामक प्रतिक्रिया देते हुए सीधे तौर पर ईरान को जिम्मेदार ठहराया है। ट्रंप का साफ आरोप है कि हूती विद्रोही स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर रहे, बल्कि वे तेहरान के इशारे पर अमेरिकी मिडटर्म चुनावों से ऐन पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आग लगाने का सुनियोजित खेल खेल रहे हैं।
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव और कच्चे तेल की राजनीति: ट्रंप ने क्यों उठाया 3 नवंबर का मुद्दा
अमेरिकी राजनीति और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के बीच हमेशा से एक सीधा संबंध रहा है और जब मामला तेल की कीमतों और महंगाई का हो, तो व्हाइट हाउस की संवेदनशीलता चरम पर पहुंच जाती है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर हूती हमलों को लेकर खुला गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि हूती विद्रोही बेहद बुरा बर्ताव कर रहे हैं और उन्हें यह गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए कि अमेरिका हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा। ट्रंप ने लिखा कि किसी को उन विद्रोहियों को समझाना चाहिए कि वे राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, वे पहले ही भारी अंतर से ऐतिहासिक जीत दर्ज कर चुके हैं, लेकिन 3 नवंबर के मिडटर्म चुनावों के बाद भी वे यहीं रहने वाले हैं। ट्रंप ने खुली चेतावनी देते हुए कहा कि सऊदी अरब पर हुए इन हमलों को वे कभी नहीं भूलेंगे और चुनाव संपन्न होते ही इसका पूरा हिसाब चुकता किया जाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका में यदि पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ते हैं तो इसका सीधा असर मतदाता के मूड पर पड़ता है और ईरान इसी कमजोर नब्ज पर वार कर वॉशिंगटन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की जुगत में है।
रियाद एयरपोर्ट से लेकर अरामको के ठिकानों तक हूती मिसाइलों का खौफनाक निशाना
सऊदी अरब की जमीन पर हाल के दिनों में हुए हमलों ने सुरक्षा एजेंसियों की पेशानी पर बल ला दिए हैं। हूती विद्रोहियों ने राजधानी रियाद स्थित किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को निशाना बनाकर लगातार दो दिन क्रूज मिसाइलें और विस्फोटक ड्रोन दागे। हालांकि सऊदी एयर डिफेंस सिस्टम ने समय रहते मिसाइलों को आसमान में ही नष्ट कर दिया, लेकिन मिसाइलों के गिरते मलबे से रिहायशी इलाकों में नुकसान पहुंचा और चार लोग घायल हो गए। इस गंभीर सुरक्षा खतरे को देखते हुए हवाई अड्डे को अस्थाई रूप से बंद करना पड़ा और दर्जनों अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को रद्द या डायवर्ट किया गया। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह रही कि पूर्वी प्रांत के धाहरान में सऊदी अरामको की प्रशासनिक इमारत पर हमले के बाद आग लग गई। हूती प्रवक्ता याह्या सारी ने खुलेआम धमकी दी है कि अगर यमन में सऊदी गठबंधन के हमले नहीं रुके, तो अरामको की तेल रिफाइनरियों और प्रोसेसिंग प्लांट्स पर और भी भीषण हमले किए जाएंगे। इस धमकी के बाद तेल कंपनियों के कर्मचारियों को संवेदनशील संयंत्रों से दूर रहने के निर्देश दिए गए हैं।
लाल सागर, बाब अल-मंडेब और होर्मुज: वैश्विक सप्लाई चेन पर गहराता अभूतपूर्व संकट
हूती विद्रोहियों की यह आक्रामकता केवल सऊदी अरब की सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक लाल सागर और बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है। यह जलमार्ग स्वेज नहर के जरिए एशिया और यूरोप को जोड़ता है और दुनिया भर का एक बड़ा तेल टैंकर ट्रैफिक यहीं से होकर गुजरता है। इस इलाके में पहले से ही वाणिज्यिक जहाजों पर हमले होते रहे हैं, लेकिन अब सीधे सऊदी मुख्यभूमि पर हमलों के बाद मरीन इंश्योरेंस और शिपिंग कंपनियों के कान खड़े हो गए हैं। वहीं दूसरी तरफ, फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी तनाव बना हुआ है। हालांकि अमेरिका का दावा है कि उसकी और सहयोगी देशों की नौसेना होर्मुज स्ट्रेट पर कड़ा पहरा रखे हुए है और वहां से तेल का निर्यात जारी है, लेकिन किसी भी अप्रत्याशित सैन्य टकराव की स्थिति में पूरी दुनिया की तेल आपूर्ति ठप होने का गंभीर जोखिम पैदा हो गया है।
कच्चे तेल के दामों में भारी उछाल: ब्रेंट और डब्लूटीआई क्रूड के ग्राफ ने बढ़ाई चिंता
जैसे ही रियाद और अरामको पर हमलों की खबरें वैश्विक मीडिया में आईं, अंतरराष्ट्रीय जिंस बाजारों (कमोडिटी मार्केट्स) में कच्चे तेल की कीमतों में तत्काल उछाल दर्ज किया गया। ब्रेंट क्रूड वायदा बाजार में उछलकर 106 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी 94 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सऊदी अरब के बड़े तेल शोधक कारखानों को आंशिक नुकसान भी पहुंचता है, तो वैश्विक बाजार से प्रतिदिन लाखों बैरल तेल की आपूर्ति गायब हो सकती है। 2019 में जब अरामको के अबकैक और खुरैस संयंत्रों पर हमला हुआ था, तब दुनिया की पांच प्रतिशत तेल आपूर्ति रातों-रात ठप हो गई थी। तेल व्यापारी इस बात को लेकर बेहद आशंकित हैं कि अगर हूतियों ने रिफाइनरियों पर सीधे हमले दोहराए, तो तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को भी छू सकती हैं, जिससे भारत सहित दुनिया भर के आयात पर निर्भर देशों में महंगाई का नया चक्र शुरू हो जाएगा।
ईरान को ट्रंप की दो टूक: ‘असफल राष्ट्र’ करार देते हुए बड़े फैसले के दिए संकेत
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने बयान में केवल हूतियों को चेतावनी नहीं दी, बल्कि उनके मुख्य वित्तीय और सैन्य समर्थक ईरान पर भी शब्दों के तीखे तीर चलाए। ट्रंप ने ईरान को एक ‘विफल राष्ट्र’ करार देते हुए कहा कि उस देश के पास न तो सक्षम वायुसेना बची है और न ही मजबूत नौसेना, उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है और वहां मुद्रास्फीति 300 प्रतिशत के पार जा चुकी है। ट्रंप ने कहा कि उनके सैनिक अपने जवानों को वेतन तक नहीं दे पा रहे हैं और अपनी घरेलू विफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए वे किराए के हूती लड़ाकों का सहारा ले रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने साफ संकेत दिया कि वॉशिंगटन बहुत जल्द ईरान को लेकर एक बड़ा और कठोर नीतिगत फैसला लेने जा रहा है। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि 3 नवंबर के अमेरिकी मिडटर्म चुनाव खत्म होते ही ट्रंप प्रशासन ईरान पर नए प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ यमन में हूतियों के मिसाइल अड्डों पर बड़े पैमाने पर संयुक्त हवाई हमलों का आदेश दे सकता है।
तुर्किए और पाकिस्तान से रक्षा संधि: क्या एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की ओर बढ़ रहा है सऊदी अरब?
सऊदी अरब इस बार के हमलों को केवल रक्षात्मक तरीके से सहने के मूड में बिल्कुल नहीं दिख रहा है। सऊदी कैबिनेट ने आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट कर दिया है कि हूती उग्रवादियों को उनके अपराधों और बार-बार हवाई अड्डों को निशाना बनाने की भारी कीमत चुकानी होगी। इसी बीच, ट्रंप ने यह भी खुलासा किया कि वे संकट के समाधान और सऊदी अरब के हितों की रक्षा के लिए तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन से बातचीत कर सकते हैं। ट्रंप ने भरोसा जताया कि एर्दोगन उनके अनुरोध पर सऊदी के समर्थन में आगे आएंगे। उल्लेखनीय है कि तुर्किए और पाकिस्तान पहले ही सऊदी अरब के साथ ‘मक्का डिफेंस पैक्ट’ पर हस्ताक्षर कर चुके हैं, जो संकट के समय साझा रक्षा तंत्र का निर्माण करता है। यदि सऊदी अरब यमन में जमीन पर अपनी फौजी कार्रवाई को तेज करता है और अमेरिका तथा तुर्किए जैसे देश खुले तौर पर इसमें शामिल होते हैं, तो मिडिल ईस्ट एक बार फिर सीधे बहुपक्षीय युद्ध की भयानक आग में झुलस सकता है।
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