
केंद्र की सत्ता और भारतीय जनता पार्टी के गलियारों में इस समय सबसे बड़ा कौतूहल केंद्रीय मंत्रिपरिषद (Union Council of Ministers) के संभावित फेरबदल और विस्तार को लेकर है। पिछले पांच महीनों के सियासी घटनाक्रम पर नजर डालें तो एक के बाद एक 3 केंद्रीय मंत्रियों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। ताजा मामला केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण और संसदीय कार्य राज्य मंत्री डॉ. एल मुरुगन का है, जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 5 पन्नों का विस्तृत पत्र भेजकर मंत्रिपरिषद और राज्यसभा सदस्यता दोनों से मुक्त करने का अनुरोध किया है। इससे पहले जॉर्ज कुरियन और रवनीत सिंह बिट्टू भी मंत्री पद छोड़ चुके हैं। वहीं दूसरी तरफ, उच्च सदन (राज्यसभा) के हालिया चुनावों में मोदी सरकार के दो कद्दावर मंत्रियों—केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी और उपभोक्ता मामलों के राज्य मंत्री बीएल वर्मा—को पार्टी ने दोबारा राज्यसभा का उम्मीदवार नहीं बनाया। इन तमाम कड़ियों ने यह साफ संकेत दे दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सरकार और संगठन के बीच शक्ति संतुलन का नया खाका खींच रहे हैं।
एल मुरुगन का अचानक इस्तीफा: ‘संगठन पहले, 2029 और तमिलनाडु विधानसभा पर फोकस’
मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद रहे एल मुरुगन का कार्यकाल अप्रैल 2030 तक था, लेकिन उन्होंने बीच में ही अपनी सीट और मंत्री पद दोनों का त्याग कर सबको चौंका दिया है। प्रधानमंत्री को लिखे अपने भावुक पत्र में मुरुगन ने कहा कि मोदी सरकार में पिछले 5 वर्षों से काम करना उनके जीवन का सर्वोच्च सम्मान रहा है, लेकिन अब वे तमिलनाडु की गलियों, गांवों और चौपालों में जाकर पार्टी की जड़ें मजबूत करना चाहते हैं। मुरुगन पूर्व में तमिलनाडु भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और राज्य के दलित समाज (अरुंथथियार समुदाय) में उनकी गहरी पैठ मानी जाती है। तमिलनाडु की राजनीति में अभिनेता विजय की पार्टी ‘टीवीके’ (TVK) के आने और द्रमुक-अन्नाद्रमुक के बीच बनते-बिगड़ते समीकरणों को देखते हुए भाजपा हाईकमान मुरुगन को दक्षिण में एक बड़े संगठनात्मक चेहरे के रूप में स्थापित करना चाहता है। उनका इस्तीफा यह दर्शाता है कि भाजपा के लिए मंत्रालयों की कुर्सी से ज्यादा राज्यों में पार्टी की चुनावी जमीन तैयार करना प्राथमिकता बन चुका है।
जॉर्ज कुरियन और रवनीत बिट्टू से लेकर मुरुगन तक: क्यों खाली हुए ये तीन अहम पद?
मुरुगन से पहले केरल से आने वाले ईसाई चेहरे जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा हुआ था। वहीं पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू, जिन्हें लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद उच्च सदन भेजकर रेल राज्य मंत्री बनाया गया था, उन्होंने भी जुलाई में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इन तीनों नेताओं को दक्षिण और उत्तर के उन राज्यों से केंद्र में लाया गया था जहां भाजपा अपनी सियासी जमीन तलाश रही थी। अब इन तीनों के मंत्रिपरिषद से हटने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी ने इन राज्यों के लिए अपनी रणनीति बदली है? रणनीतिकारों का मानना है कि पंजाब, केरल और तमिलनाडु जैसे गैर-भाजपा शासित राज्यों में केवल मंत्रियों के दम पर पार्टी को खड़ा करना संभव नहीं था, इसलिए जमीनी स्तर पर बड़े नेताओं को पूर्णकालिक संगठनात्मक जिम्मेदारियां सौंपने का फैसला किया गया है।
हरदीप पुरी और बीएल वर्मा को राज्यसभा का टिकट क्यों नहीं?
मंत्रियों के इस्तीफे के अलावा जिस बात ने सबसे ज्यादा राजनीतिक सुर्खियां बटोरीं, वह है उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी और राज्य मंत्री बीएल वर्मा को दोबारा मौका न मिलना। हरदीप सिंह पुरी मोदी सरकार के सबसे अनुभवी और भरोसेमंद आर्थिक-रणनीतिक चेहरों में गिने जाते हैं, जिन्होंने वैश्विक प्रतिबंधों और तेल संकट के बीच भारतीय हितों की मजबूती से पैरवी की। वहीं बीएल वर्मा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोध (ओबीसी) समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। हालांकि तकनीकी रूप से दोनों नेता फिलहाल मंत्रिपरिषद में बने हुए हैं, लेकिन नियमानुसार संसद का सदस्य न रहने पर छह महीने से अधिक समय तक मंत्री नहीं रहा जा सकता। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि भाजपा इन दोनों नेताओं को या तो किसी अन्य राज्य से राज्यसभा के जरिए दोबारा उच्च सदन भेजेगी, या फिर आगामी कैबिनेट विस्तार में उनकी जगह नए चेहरों को जिम्मेदारी देकर उन्हें संगठन के बड़े मोर्चों पर तैनात किया जाएगा।
खाली कुर्सियों पर 5 नए चेहरों की एंट्री की तैयारी: कैबिनेट विस्तार का क्या है गणित?
लगातार हुए इस्तीफों और राज्यसभा समीकरणों के चलते मोदी कैबिनेट में कम से कम 5 महत्वपूर्ण रिक्तियां तैयार हो चुकी हैं। सूत्रों के अनुसार, दिवाली से पहले या संसद के शीतकालीन सत्र से ठीक पूर्व केंद्रीय मंत्रिपरिषद का बहुप्रतीक्षित फेरबदल और विस्तार हो सकता है। इस नए विस्तार में तीन मुख्य पैमानों पर काम होने की पूरी संभावना है:
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चुनावी राज्यों को प्रतिनिधित्व: आगामी महीनों और वर्षों में होने वाले अहम विधानसभा चुनावों (जैसे उत्तर प्रदेश के उप-चुनाव, बिहार और दक्षिण के राज्य) के जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने वाले युवा और आक्रामक सांसदों को मौका दिया जा सकता है।
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गठबंधन सहयोगियों का संतुलन: एनडीए सरकार में जेडीयू, टीडीपी, चिराग पासवान की एलजेपी (आर) और शिवसेना (शिंदे गुट) जैसे सहयोगियों की आकांक्षाओं और पोर्टफोलियो संतुलन पर भी ध्यान दिया जाएगा।
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परफॉर्मेंस आधारित पदोन्नति: कुछ मौजूदा राज्य मंत्रियों (MoS) को उनके मंत्रालयों के बेहतरीन परफॉर्मेंस और योजनाओं को तेजी से लागू करने के आधार पर कैबिनेट रैंक में प्रमोट किया जा सकता है।
‘मिशन 2029’ और राज्यों की जंग: सत्ता से संगठन की ओर भाजपा का यू-टर्न
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा शीर्ष नेतृत्व 2029 के लोकसभा चुनाव और राज्यों की विधानसभाओं को हल्के में नहीं ले रहा है। 2024 के लोकसभा चुनावों में मिले नतीजों के बाद पार्टी इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि मंत्रालयों में बैठे नेताओं का जमीनी संपर्क कमजोर होने से पार्टी को चुनावी नुकसान उठाना पड़ता है। यही वजह है कि केंद्र की सत्ता में बैठे कद्दावर नेताओं को धीरे-धीरे राज्यों के मैदान में उतारा जा रहा है ताकि वे जिलों, तहसीलों और बूथों पर जाकर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाएं। सरकार में काम करने वाले दक्ष नौकरशाहों और अनुभवी नेताओं के साथ-साथ संगठन को धार देने वाले जननेताओं की यह जुगलबंदी ही आने वाले दिनों में मोदी सरकार के नए कैबिनेट स्वरूप और भाजपा के राजनीतिक एजेंडे को तय करेगी।
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