
सनातन धर्म परंपरा में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि का दिन सबसे मंगलकारी और विघ्नविनाशक माना जाता है। आज 14 सितंबर 2026, सोमवार के पावन अवसर पर देशभर के घर-आंगन, देवालयों और भव्य पंडालों में रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान श्री गणेश के स्वागत की अनुपम छटा बिखरी हुई है। इस वर्ष का गणेशोत्सव एक अत्यंत दुर्लभ और पावन संयोग लेकर आया है, क्योंकि आज ही के दिन सुहागिनों के अखंड सौभाग्य का महापर्व हरतालिका तीज और देवाधिदेव महादेव के लाडले गजानन का जन्मोत्सव एक साथ मनाया जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार, जब सोमवार के दिन शिव-पार्वती की आराधना के साथ गणपति बप्पा का आगमन होता है, तो वह काल भक्तों के सभी अमंगल और संताप हरने वाला सिद्ध होता है।
गणपति स्थापना का सबसे श्रेष्ठ मध्याह्न काल मुहूर्त
वैदिक ज्योतिष और धर्मशास्त्रों की मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश का प्राकट्य भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को दोपहर के समय यानी मध्याह्न काल में हुआ था। यही कारण है कि गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर गणपति बप्पा की प्रतिमा की स्थापना और उनका षोडशोपचार पूजन सदैव मध्याह्न व्यापिनी तिथि में करना ही सर्वोत्तम माना गया है।
पंचांगीय गणना के अनुसार आज 14 सितंबर को गणेश स्थापना और मध्याह्न पूजन का सबसे प्रशस्त और फलदायी समय सुबह 11 बजकर 02 मिनट से दोपहर 01 बजकर 31 मिनट तक प्रभावी रहेगा। लगभग 2 घंटे 29 मिनट की यह पावन समयावधि बप्पा के स्वागत, प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा, संकल्प, वैदिक मंत्रोच्चार, प्रिय नैवेद्य अर्पण और महाआरती के लिए सर्वसिद्धिदायक है। इस निश्चित समयावधि में की गई आराधना साधक की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करती है।
सुबह के अन्य मुहूर्त और चौघड़िया का विचार
धार्मिक दृष्टि से यद्यपि पंचांग में प्रातः काल से ही शुभ, लाभ और अमृत जैसी शुभ चौघड़िया बेलाएं विद्यमान रहती हैं, परंतु शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है कि गणेश चतुर्थी की मुख्य स्थापना केवल सामान्य चौघड़िया देखकर नहीं की जानी चाहिए। सामान्य चौघड़िया मुहूर्त दैनिक मांगलिक कार्यों के लिए उत्तम हो सकते हैं, लेकिन गणेश जन्मोत्सव का वास्तविक फल मध्याह्न काल के विशेष मुहूर्त में ही प्राप्त होता है।
यदि किसी कारणवश आपको पूजन की पूर्व तैयारियां, मंडप की सज्जा, सामग्री संकलन या कलश का प्रारंभिक प्रबंध करना हो, तो प्रातःकालीन शुभ चौघड़िया का उपयोग किया जा सकता है। परंतु प्रतिमा की वास्तविक प्रतिष्ठा और महापूजन मध्याह्न काल के 2 घंटे 29 मिनट के भीतर ही संपन्न करना शास्त्रसम्मत माना गया है।
राहुकाल में भूलकर भी न करें प्रतिमा स्थापना
ज्योतिष शास्त्र में किसी भी देव आराधना या मांगलिक अनुष्ठान की सफलता के लिए अशुभ वेलाओं का त्याग अनिवार्य बताया गया है। आज सोमवार का दिन होने के कारण राहुकाल प्रातः काल ही प्रभावी रहेगा। नई दिल्ली और आसपास के भौगोलिक क्षेत्रों की मानक पंचांग गणना के अनुसार आज राहुकाल का समय सुबह 07 बजकर 38 मिनट से 09 बजकर 11 मिनट तक रहेगा।
राहुकाल को तमोगुणी और विघ्नकारक काल माना जाता है। इस अवधि में किसी भी प्रकार की नई प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा, घट स्थापना या नए कार्य का संकल्प लेने से बचना चाहिए। अतः श्रद्धालुओं को विशेष रूप से सचेत रहना चाहिए कि वे प्रातः 07:38 बजे से 09:11 बजे के बीच प्रतिमा स्थापना या विशेष अनुष्ठान का प्रारंभ न करें।
मध्याह्न मुहूर्त में अभिजीत मुहूर्त का दुर्लभ वरदान
आज के दिन की एक और सबसे बड़ी ज्योतिषीय विशेषता यह है कि मध्याह्न पूजा मुहूर्त के ठीक मध्य में अभिजीत मुहूर्त का संयोग बन रहा है। पंचांग के अनुसार अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11 बजकर 51 मिनट से 12 बजकर 41 मिनट तक रहेगा।
अभिजीत मुहूर्त भगवान श्रीहरि विष्णु के चक्र के समान सभी प्रकार के दोषों का नाश करने वाला माना जाता है। इस 50 मिनट की अवधि में यदि कोई जातक भगवान गणेश की स्थापना करता है या महासंकल्प लेता है, तो उसके कार्यों में कभी कोई बाधा नहीं आती। जो भक्त मध्याह्न के आरंभिक पलों में पूजा प्रारंभ नहीं कर पा रहे हैं, वे इस अभिजीत काल में प्रतिमा विराजमान कर अपना पूजन पूर्ण कर सकते हैं।
गणपति स्थापना की सरल और प्रामाणिक विधि
भगवान गणेश की स्थापना से पूर्व पूजा स्थल और संपूर्ण गृह परिसर की गंगाजल छिड़ककर भलीभांति शुद्धि करें। इसके बाद पूजा के लिए लकड़ी की एक सुंदर चौकी स्थापित करें और उस पर नया लाल या पीला सूती/रेशमी वस्त्र बिछाएं। चौकी के ईशान कोण में अक्षत की ढेरी बनाकर तांबे या पीतल का कलश स्थापित करें, जिसमें शुद्ध जल, गंगाजल, सुपारी, सिक्का और आम के पांच पत्ते लगाकर ऊपर नारियल रखें।
इसके पश्चात चौकी के मध्य में अक्षत से अष्टदल कमल बनाकर भगवान गणेश की सुंदर प्रतिमा को पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख करके विराजमान करें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत एवं पूजन का संकल्प लें। प्रतिमा को पंचामृत और शुद्ध जल से प्रतीकात्मक स्नान कराएं (मिट्टी की प्रतिमा हो तो केवल दूर्वा से जल के छींटे दें)। इसके बाद बप्पा को कलावा रूपी वस्त्र, जनेऊ, रोली, चंदन, हल्दी, अबीर, गुलाल और सिंदूर अर्पित करें। भगवान को उनकी प्रिय 21 दूर्वा दल और लाल गुड़हल के पुष्प श्रद्धापूर्वक चढ़ाएं। अंत में मोदक या लड्डुओं का नैवेद्य अर्पित कर कर्पूर जलाकर सपरिवार आरती उतारें।
गणेश पूजन की संपूर्ण सामग्री सूची
पूजा आरंभ करने से पूर्व सभी आवश्यक सामग्रियों को एक स्थान पर व्यवस्थित कर लेना चाहिए, ताकि अनुष्ठान के समय कोई व्यवधान न पड़े:
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भगवान गणेश की मिट्टी की सौम्य प्रतिमा
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पूजा की लकड़ी की चौकी और लाल या पीला नया वस्त्र
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तांबे/पीतल का कलश, आम या अशोक के 5 पत्ते, जटा वाला पानीदार नारियल
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रोली, कुमकुम, अक्षत (अटूट चावल), पीला चंदन और सिंदूर
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21 दूर्वा दल की गांठें और ताजे लाल पुष्प/गुड़हल की माला
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धूपबत्ती, शुद्ध देसी घी का दीपक और आरती के लिए भीमसेनी कपूर
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मोदक, बेसन या बूंदी के लड्डू और 5 प्रकार के मौसमी फल
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पान के पत्ते, सुपारी, लौंग, छोटी इलायची और कलावा (मौली)
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यज्ञोपवीत (जनेऊ) और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल)
बप्पा को क्यों अतिप्रिय हैं दूर्वा और मोदक?
पौराणिक कथा के अनुसार, अनलासुर नामक एक दैत्य के संहार के लिए जब भगवान गणेश ने उसे निगल लिया था, तब उनके उदर में भयंकर ज्वाला और दाह उत्पन्न हो गई थी। उस तपन को शांत करने के लिए कश्यप ऋषि और अन्य संतों ने बप्पा को 21 दूर्वा दल की गांठे अर्पित की थीं। दूर्वा की शीतलता से भगवान का दाह शांत हुआ, तभी से गजानन को दूर्वा अत्यंत प्रिय हो गई। बिना दूर्वा के गणेश जी की पूजा अधूरी मानी जाती है।
वहीं मोदक को परमानंद और ज्ञान का प्रतीक माना गया है। मोदक का बाहरी आवरण सादा और भीतर का हिस्सा मधुरता से भरा होता है, जो यह संदेश देता है कि ज्ञान और साधना का पथ बाहर से कठिन किंतु भीतर से असीम आनंद देने वाला होता है। भगवान गणेश ज्ञान और बुद्धि के अधिष्ठाता हैं, इसलिए उन्हें मोदक का भोग सर्वाधिक प्रिय है।
मंत्र साधना और चंद्र दर्शन का कड़ा नियम
गणेश स्थापना और पूजन के दौरान साधक को निरंतर एकाग्रचित्त होकर भगवान के बीज मंत्र “ॐ गं गणपतये नमः” का मानसिक या वाचिक जाप करते रहना चाहिए। यह मंत्र जीवन के हर अवरोध को समाप्त करने में सक्षम है।
गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन को लेकर धर्मशास्त्रों में कड़ा निषेध बताया गया है। मान्यता है कि इसी तिथि को चंद्रमा ने भगवान गणेश के स्वरूप का उपहास उड़ाया था, जिस पर बप्पा ने चंद्रमा को शाप दिया था कि जो भी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को तुम्हारा मुख देखेगा, उस पर झूठा कलंक लगेगा। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण पर भी इसी तिथि को चंद्रमा देखने के कारण स्यमंतक मणि चोरी का मिथ्या आरोप लगा था। अतः आज रात्रि में चंद्र दर्शन से पूरी तरह बचना चाहिए।
सुबह हरतालिका तीज, फिर गणपति आराधना का संगम
आज 14 सितंबर का दिन धार्मिक दृष्टिकोण से अद्भुत तालमेल प्रस्तुत कर रहा है। पंचांगीय व्यवस्था के अनुसार हरतालिका तीज से जुड़ी तृतीया तिथि सुबह लगभग 07 बजकर 06 मिनट पर समाप्त हो रही है। इसके उपरांत चतुर्थी तिथि का आरंभ हो जाता है, जो मध्याह्न काल में गणेश जी की अगवानी का मार्ग प्रशस्त करती है।
इस व्यवस्था के तहत माताएं-बहनें प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में भगवान शिव और माता पार्वती की बालू निर्मित प्रतिमाओं का विधिवत पूजन, तीज व्रत का संकल्प और आरती संपन्न कर सकती हैं। इसके उपरांत दोपहर 11:02 बजे से गणेश चतुर्थी के विशेष मध्याह्न मुहूर्त में पूरे उत्साह के साथ गणपति बप्पा की स्थापना और उत्सव का आनंद लिया जा सकता है।
अनंत चतुर्दशी तक बप्पा के आतिथ्य का उत्सव
गणेश चतुर्थी की स्थापना के साथ ही दस दिवसीय भव्य गणेशोत्सव का श्रीगणेश हो जाता है। सनातन परंपरा के अनुसार श्रद्धालु अपनी कुल-परंपरा और श्रद्धा भाव के अनुसार गणपति बप्पा को डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन, सात दिन या पूरे दस दिनों तक अपने घर में विराजमान रखते हैं। इस पूरी अवधि में प्रतिदिन सुबह-शाम आरती और विशेष नैवेद्य अर्पित किया जाता है। अंततः अनंत चतुर्दशी के पावन दिन श्रद्धालु अश्रुपूर्ण नेत्रों और “अगले बरस तू जल्दी आ” के जयघोष के साथ बप्पा की प्रतिमा का जल में विसर्जन करते हैं, जिससे यह महापर्व पूर्णता को प्राप्त होता है।
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