
उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को स्पष्ट निर्देश दिया है कि प्रदेश में ग्राम पंचायतों के चुनाव आदेश की तारीख से अगले तीन महीने के भीतर हर हाल में संपन्न कराए जाएं। न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने दशरथ यादव समेत अन्य याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के सर्वेक्षण या आयोग की जांच के नाम पर लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया को अनिश्चितकाल के लिए टालना संविधान की मूल भावना के खिलाफ और पूरी तरह असंवैधानिक है।
संविधान के अनुच्छेद 243-E का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243-E के कड़े प्रावधानों को रेखांकित किया। अदालत ने कहा कि स्थानीय स्वशासन और पंचायती राज व्यवस्था में 5 वर्ष का कार्यकाल समाप्त होने से पहले या समाप्त होते ही तय समय पर चुनाव कराना अनिवार्य संवैधानिक दायित्व है। उत्तर प्रदेश में पूर्व निर्वाचित पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है। ऐसे में समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा ‘ट्रिपल टेस्ट’ के लिए एम्पिरिकल डेटा (आंकड़े) जुटाने की लंबी प्रक्रिया का हवाला देकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को रोके नहीं रखा जा सकता। अदालत ने साफ किया कि प्रशासनिक जांच या सर्वे की जटिलताओं की आड़ में जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने के संवैधानिक अधिकार से लंबे समय तक वंचित नहीं किया जा सकता।
मौजूदा 27% OBC आरक्षण पर ही होंगे चुनाव
आरक्षण के मुद्दे पर असमंजस को दूर करते हुए हाईकोर्ट ने सबसे बड़ा स्पष्टीकरण दिया है। अदालत ने साफ किया कि जब तक समर्पित आयोग की अंतिम रिपोर्ट और उसके आधार पर वैधानिक संशोधन नहीं हो जाते, तब तक ओबीसी आरक्षित सीटों को न तो सामान्य माना जाएगा और न ही चुनाव रोके जाएंगे। यह चुनाव मौजूदा व्यवस्था के तहत 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के साथ ही कराए जाएंगे। इसके साथ ही अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और महिलाओं के लिए लागू रोटेशन व आरक्षण नियमों का भी पूर्ण रूप से पालन सुनिश्चित किया जाएगा। कोर्ट के इस रुख से उन आशंकाओं पर पूरी तरह विराम लग गया है, जिनमें ओबीसी आरक्षण समाप्त होने या बिना आरक्षण चुनाव होने की बातें कही जा रही थीं।
समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल
हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति राम अवतार सिंह की अध्यक्षता वाले समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के डेटा संग्रहण के तरीकों पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने आगरा जिले का उदाहरण देते हुए कहा कि 25 लाख से अधिक की ग्रामीण आबादी और 3 लाख से ज्यादा ओबीसी जनसंख्या वाले जिले में सार्वजनिक नोटिस के बाद महज 175 लोग पहुंचे और केवल 29 लोगों से फॉर्म भरवाए गए। कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि सामान्य रायशुमारी या कुछ गिने-चुने फॉर्म भरवाना राजनीतिक पिछड़ेपन का वैज्ञानिक और विश्वसनीय पैमाना नहीं हो सकता। अदालत ने आयोग को निर्देश दिया कि वह वैज्ञानिक मानकों के आधार पर अपनी जांच और अध्ययन जारी रखे, जिसकी रिपोर्ट भविष्य के चुनावों और विधायी संशोधनों के लिए काम आएगी, लेकिन इसके चलते मौजूदा चुनाव बाधित नहीं होंगे।
निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक बनाने की व्यवस्था पर रुख
अदालत ने राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द करने से इनकार कर दिया, जिसके तहत कार्यकाल समाप्त होने के बाद निवर्तमान ग्राम प्रधानों को अंतरिम प्रशासक नियुक्त किया गया था। कोर्ट ने माना कि यह पंचायतों में दैनिक विकास कार्यों और ग्रामीणों की प्रशासनिक जरूरतों को सुचारू रखने के लिए एक अस्थायी व्यवस्था है और स्थानीय स्तर पर यह अनुचित नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने आगाह किया कि इस अंतरिम व्यवस्था को स्थायी नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह राज्य निर्वाचन आयोग को चुनाव संपन्न कराने के लिए आवश्यक बजट, पर्याप्त कर्मचारी और पुख्ता सुरक्षा बल तत्काल प्रभाव से मुहैया कराए ताकि 3 महीने के भीतर गांव की सरकार चुनी जा सके।
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