
चिकित्सा विज्ञान और स्त्री रोग विशेषज्ञों के लिए बार-बार होने वाले गर्भपात हमेशा से एक जटिल और संवेदनशील विषय रहे हैं। हाल ही में सामने आए एक चौंकाने वाले मामले में, एक महिला द्वारा पिछले कुछ वर्षों में 13 बार अबॉर्शन कराए जाने के बाद 14वीं बार गर्भधारण करने की खबर ने डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के कान खड़े कर दिए हैं। इस स्थिति को सामान्य गर्भावस्था की श्रेणी में कतई नहीं रखा जा सकता, क्योंकि बार-बार सर्जिकल या मेडिकल अबॉर्शन से गुजरने के कारण महिला की प्रजनन प्रणाली और आंतरिक अंगों को भारी नुकसान पहुंच चुका होता है। डॉक्टरों ने इस मामले में बेहद गंभीर रुख अपनाते हुए चेतावनी दी है कि यह गर्भावस्था महिला की अपनी जान के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकती है।
स्त्री रोग विशेषज्ञों (Gynecologists) के अनुसार, बार-बार गर्भपात कराना किसी भी महिला के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के साथ एक जानलेवा खिलवाड़ जैसा है। सामान्य तौर पर जब कोई महिला दो या तीन बार से अधिक अबॉर्शन कराती है, तो गर्भाशय की संरचना कमजोर होने लगती है। ऐसे में 13 बार गर्भपात के बाद 14वीं बार कंसीव करने पर भ्रूण के सुरक्षित विकास और प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
गर्भाशय की दीवारें पतली और कमजोर: ‘यूटेराइन रप्चर’ का सबसे बड़ा खतरा
लगातार सर्जिकल डीएंडसी (D&C – डाइलेशन और क्यूरेटेज) या गर्भपात की दवाओं के बार-बार इस्तेमाल से गर्भाशय की अंदरूनी परत यानी एंडोमेट्रियम बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाती है। बार-बार खुरचने की प्रक्रिया से गर्भाशय की दीवारें कागज़ की तरह बेहद पतली और कमजोर हो जाती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि जब भ्रूण बढ़ता है और गर्भाशय में खिंचाव आता है, तो कमजोर हो चुकी दीवारों के फटने यानी ‘यूटेराइन रप्चर’ (Uterine Rupture) की आशंका सबसे ज्यादा होती है। यह एक ऐसी मेडिकल इमरजेंसी है जिसमें कुछ ही मिनटों के भीतर अंदरूनी रक्तस्राव से मां की मौत तक हो सकती है।
एशरमैन सिंड्रोम और प्लेसेंटा की खतरनाक जटिलताएं
बार-बार गर्भपात से गर्भाशय के भीतर घाव के निशान यानी स्कार टिश्यूज बन जाते हैं, जिसे मेडिकल भाषा में ‘एशरमैन सिंड्रोम’ (Asherman’s Syndrome) कहा जाता है। इन जालेनुमा निशानों के कारण गर्भाशय की सामान्य कार्यप्रणाली नष्ट हो जाती है। इसके अलावा, ऐसी स्थिति में जब गर्भ ठहरता है, तो प्लेसेंटा (आंव) गर्भाशय की कमजोर सतह से असामान्य रूप से चिपक जाता है। इसे ‘प्लेसेंटा एक्रीटा’ (Placenta Accreta) या ‘प्लेसेंटा प्रीविया’ कहा जाता है। इसमें प्रसव के दौरान प्लेसेंटा अलग नहीं हो पाता, जिससे बेतहाशा ब्लीडिंग होती है और जान बचाने के लिए आपातकाल में पूरा गर्भाशय ही काटकर निकालना पड़ता है।
सर्वाइकल इनकम्पीटेंस और समय से पहले डिलीवरी का जोखिम
हर बार सर्जिकल अबॉर्शन के दौरान गर्भाशय ग्रीवा यानी सर्विक्स (Cervix) को जबरन फैलाया जाता है। बार-बार ऐसा होने से सर्विक्स की पकड़ ढीली पड़ जाती है, जिसे सर्वाइकल इनसफिशिएंसी या इनकम्पीटेंस कहते हैं। इसके चलते गर्भाशय बढ़ते हुए भ्रूण का वजन नहीं संभाल पाता और गर्भधारण के चौथे या पांचवें महीने में ही थैली फट जाती है या समय से बहुत पहले (प्री-मैच्योर) प्रसव हो जाता है। ऐसे बच्चों के बचने की संभावना बेहद कम होती है या वे जीवनभर गंभीर शारीरिक व न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जूझते हैं।
गर्भपात को गर्भनिरोधक विकल्प न समझें: विशेषज्ञों की सख्त सलाह
वरिष्ठ चिकित्सकों का कहना है कि समाज में जागरूकता की कमी के कारण कई जोड़े अनचाहे गर्भ से बचने के लिए नियमित गर्भनिरोधक उपायों (जैसे कंडोम, कॉपर-टी, ओरल पिल्स) का इस्तेमाल करने के बजाय अबॉर्शन को ही एक आसान साधन मान लेते हैं। यह सोच किसी भी महिला के जीवन के लिए बेहद घातक है। अनियोजित और बार-बार के गर्भपात से न केवल पेल्विक इन्फेक्शन (PID), सेप्सिस और बांझपन का खतरा बढ़ता है, बल्कि यह हार्मोनल असंतुलन और गंभीर डिप्रेशन का कारण भी बनता है। डॉक्टरों ने साफ किया है कि इस तरह के बेहद उच्च-जोखिम (High-Risk) वाले मामलों में लगातार आईसीयू स्तर की निगरानी, सख्त बेड रेस्ट और उन्नत चिकित्सकीय देखरेख की आवश्यकता होती है, फिर भी परिणाम की कोई गारंटी नहीं दी जा सकती।
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