
कोरोना महामारी के गुजर जाने के वर्षों बाद भी इसका रहस्यमयी असर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। दुनिया भर में लाखों लोग आज भी ‘लॉन्ग कोविड’ यानी संक्रमण के बाद महीनों-सालों तक बने रहने वाले दुष्प्रभावों से जूझ रहे हैं। अब एक ताजा और बड़े वैज्ञानिक अध्ययन ने इस बात का चौंकाने वाला खुलासा किया है कि लॉन्ग कोविड के गंभीर मरीजों के मुंह और श्वसन तंत्र में मौजूद सूक्ष्म बैक्टीरिया यानी माइक्रोबायोम में असामान्य बदलाव आ रहे हैं। यूरोपियन रेस्पिरेटरी जर्नल में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, मरीज के मुंह और फेफड़ों में बैक्टीरिया की विविधता तेजी से घट रही है, जिसका सीधा असर मरीज के ठीक होने की प्रक्रिया पर पड़ रहा है। भारत के प्रमुख महानगरों जैसे दिल्ली, लखनऊ, मुंबई और बेंगलुरु में भी पोस्ट-कोविड ओपीडी में ऐसे कई मरीज पहुंच रहे हैं, जो संक्रमण से उबरने के लंबे समय बाद भी लगातार सांस फूलने, अत्यधिक थकान, पेट की गड़बड़ी और याददाश्त कमजोर होने जैसी शिकायतों से परेशान हैं। यह नई रिसर्च बताती है कि वायरस शरीर से चले जाने के बाद भी इंसान के आंतरिक माइक्रोबियल संतुलन को इस कदर बिगाड़ देता है कि शरीर में लगातार सूजन बनी रहती है।
क्या है फेफड़ों और मुंह के माइक्रोबायोम में हुआ यह बड़ा बदलाव?
हमारे मुंह और फेफड़ों में करोड़ों की संख्या में अच्छे और सुरक्षात्मक बैक्टीरिया मौजूद होते हैं, जो बाहरी पैथोजेन्स से रक्षा करने के साथ-साथ फेफड़ों के टिश्यूज को स्वस्थ रखते हैं। इसे एयरवे माइक्रोबायोम कहा जाता है। 770 से अधिक अस्पताल में भर्ती रहे कोविड मरीजों पर किए गए इस शोध में पाया गया कि जिन लोगों में लॉन्ग कोविड के लक्षण अत्यधिक गंभीर थे, उनके थूक (स्पूटम) और ओरल स्वैब में बैक्टीरिया का संतुलन पूरी तरह बिगड़ा हुआ था। स्वस्थ फेफड़ों के लिए जरूरी फ्रेंडली बैक्टीरिया की संख्या काफी कम हो चुकी थी और सूजन पैदा करने वाले बैक्टीरिया हावी हो गए थे। यह बदलाव फेफड़ों की कार्यक्षमता को सीधे प्रभावित कर रहा था, जिससे फेफड़े पूरी क्षमता से ऑक्सीजन ग्रहण नहीं कर पा रहे थे और मरीजों को सामान्य चलने-फिरने में भी भारी सांस फूलने का अहसास हो रहा था।
केवल फेफड़े ही नहीं, दिमाग और पेट पर भी पड़ रहा है बुरा असर
इस रिसर्च का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि श्वसन मार्ग में बैक्टीरिया का यह असंतुलन सिर्फ फेफड़ों की बीमारियों तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन मरीजों के ओरल और एयरवे माइक्रोबायोम में यह गिरावट देखी गई, वे गंभीर कॉग्निटिव समस्याओं जैसे ‘ब्रेन फॉग’, सिरदर्द, ध्यान केंद्रित न कर पाना और डिप्रेशन से जूझ रहे थे। इसके साथ ही, अधिकांश मरीजों में पेट में गैस, अपच और लगातार दस्त जैसी गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याएं भी दर्ज की गईं। विशेषज्ञ इसे ‘गट-लंग-ब्रेन एक्सिस’ के बिगड़ने से जोड़कर देख रहे हैं। जब मुंह और फेफड़ों के सुरक्षात्मक बैक्टीरिया खत्म होते हैं, तो साइटोकिन्स जैसे इंफ्लेमेटरी केमिकल्स पूरे शरीर में फैलते हैं, जो ब्लड-ब्रेन बैरियर को प्रभावित करते हैं और मानसिक थकान पैदा करते हैं।
भारतीय परिप्रेक्ष्य: प्रदूषण और मौसम के बदलाव से बढ़ रहा जोखिम
भारत में इस शोध के नतीजे और भी गंभीर चेतावनी के रूप में सामने आए हैं। दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश और गंगा के मैदानी इलाकों में बढ़ते वायु प्रदूषण, स्मॉग और मौसमी फ्लू के कारण लोगों का श्वसन तंत्र पहले से ही कमजोर है। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) लखनऊ और एम्स जैसे शीर्ष चिकित्सा संस्थानों के पल्मोनोलॉजिस्ट्स का मानना है कि जो लोग कोविड की चपेट में आए थे और आज भी हल्की सांस की तकलीफ या कमजोरी झेल रहे हैं, उन्हें सर्दियों और प्रदूषण के मौसम में अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। फेफड़ों में बैक्टीरिया का असंतुलन होने के कारण शरीर वायु प्रदूषण के टॉक्सिन्स को फिल्टर करने में कमजोर पड़ जाता है, जिससे सेकेंडरी बैक्टीरियल इंफेक्शन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
किन लक्षणों को न करें नजरअंदाज?
लॉन्ग कोविड के मामलों में लोग अक्सर शुरुआती संकेतों को सामान्य थकावट या उम्र का असर मानकर टाल देते हैं। यदि आपको कोविड से ठीक हुए कई महीने बीत चुके हैं और अब भी सीढ़ियां चढ़ते ही सांस फूलना, थोड़ा काम करते ही अत्यधिक थकावट महसूस होना, मुंह का स्वाद लगातार बिगड़ा रहना, मसूड़ों में बार-बार सूजन या खून आना, सीने में भारीपन, बार-बार गला सूखना या खांसी आना, और सामान्य बातों को याद रखने में कठिनाई जैसी परेशानियां बनी हुई हैं, तो यह चेतावनी का संकेत हो सकता है। ऐसे लक्षणों को दबाने के लिए खुद से एंटीबायोटिक्स या दर्द निवारक दवाएं लेना घातक हो सकता है, क्योंकि गलत एंटीबायोटिक्स फेफड़ों और आंतों के बचे-खुचे अच्छे बैक्टीरिया को भी खत्म कर देती हैं।
बचाव और रिकवरी के लिए विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण सलाह
इस स्थिति से निपटने के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कुछ जरूरी सावधानियों और दैनिक जीवनशैली में बदलाव की सिफारिश की है। सबसे पहले, अपने ओरल हाइजीन यानी मुंह की स्वच्छता पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि मुंह ही बैक्टीरिया के फेफड़ों तक पहुंचने का मुख्य रास्ता है। नियमित ब्रशिंग, फ्लॉसिंग और एंटीसेप्टिक माउथवॉश का डॉक्टर की सलाह पर सीमित उपयोग जरूरी है। इसके साथ ही, अपने भोजन में प्रोबायोटिक्स और प्रीबायोटिक्स जैसे दही, छाछ, फर्मेंटेड फूड्स, हरी पत्तेदार सब्जियां और फाइबर को भरपूर मात्रा में शामिल करें ताकि शरीर का समग्र माइक्रोबायोम सुधर सके। रोजाना 15 से 20 मिनट के लिए अनुलोम-विलोम और प्रणायाम जैसी गहरी सांस लेने की कसरतें फेफड़ों की लोच और क्षमता को पुनर्जीवित करने में चमत्कारिक साबित होती हैं।
जांच और सही समय पर चिकित्सीय परामर्श
यदि लक्षण महीनों से लगातार बने हुए हैं, तो तुरंत किसी अनुभवी चेस्ट फिजिशियन या पल्मोनरी स्पेशलिस्ट से परामर्श लेना चाहिए। डॉक्टर पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट (PFT), हाई-रेजोल्यूशन सीटी स्कैन (HRCT), और जरूरी ब्लड प्रोफाइल कराकर फेफड़ों की स्थिति का सटीक आकलन कर सकते हैं। चिकित्सा जगत का मानना है कि यह नया अध्ययन लॉन्ग कोविड के इलाज में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। भविष्य में एंटीबायोटिक्स के बजाय माइक्रोबायोम रिस्टोरेशन थेरेपी और टारगेटेड प्रोबायोटिक्स के जरिए लॉन्ग कोविड के मरीजों को पूरी तरह सामान्य जीवन में लौटाने के रास्ते खुल रहे हैं।
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