
ईरान में मानवाधिकारों, व्यक्तिगत अभिव्यक्ति और महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर एक बार फिर वैश्विक स्तर पर गंभीर आक्रोश पैदा हो गया है। पूर्वोत्तर ईरान के शहर मशहद की रहने वाली 23 वर्षीय अकाउंटिंग छात्रा नजमेह अमीनी को एक सोशल मीडिया पोस्ट के चलते अदालत ने मौत की सजा (फांसी) सुनाई है। ईरानी न्यायपालिका ने उनकी ऑनलाइन पोस्ट को पैगंबर मोहम्मद का अपमान मानते हुए इसे इस्लामिक दंड संहिता के तहत ‘सब अल-नबी’ (ईशनिंदा) की श्रेणी में दर्ज किया है। केवल मृत्युदंड ही नहीं, बल्कि एक अलग क्रांतिकारी अदालत ने उन्हें ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ काम करने’ और ‘शासन विरोधी दुष्प्रचार फैलाने’ के आरोपों में 12 साल, 6 महीने और 1 दिन के कठोर कारावास की सजा भी सुनाई है। इस दोहरे फैसले के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन सन्न रह गए हैं।
कौन हैं 23 साल की नजमेह अमीनी?
नजमेह अमीनी ईरान के मशहद शहर की रहने वाली एक साधारण परिवार की छात्रा हैं, जो अकाउंटिंग (लेखांकन) की डिग्री पूरी कर रही थीं। देश में महिलाओं और युवाओं की आवाज को दबाने के कड़े कानूनों के बीच वे सोशल मीडिया पर अपने निजी विचार साझा करती थीं। जनवरी 2026 में ईरान भर में फैली जन-अशांति और असंतोष की लहर के दौरान सुरक्षा एजेंसियों ने उनके सोशल मीडिया अकाउंट्स को ट्रैक कर उन्हें हिरासत में ले लिया था। गिरफ्तारी के बाद से ही वे मशहद की कुख्यात वकीलाबाद जेल में बंद हैं, जिसे कड़े पहरे, यातनाओं और राजनीतिक कैदियों के लिए जाना जाता है।
कोर्ट में दी थी साइकेडेलिक मशरूम के नशे की दलील, जज ने किया खारिज
मामले की अदालती सुनवाई के दौरान नजमेह अमीनी और उनके बचाव पक्ष के वकीलों ने स्पष्ट रूप से अदालत को बताया था कि विवादित सोशल मीडिया पोस्ट लिखते समय वे अपने पूरे होशोहवास में नहीं थीं। उन्होंने स्वीकार किया था कि यह पोस्ट ‘साइकेडेलिक मशरूम’ के नशे के प्रभाव में उनसे अनजाने में लिखी गई थी और उनका इरादा किसी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने या ईशनिंदा करने का बिल्कुल नहीं था। ईरानी दंड संहिता के तहत यदि कोई व्यक्ति नशे या मानसिक असंतुलन की स्थिति में ऐसा कृत्य करता है, तो उसे क्षमा या सजा में छूट का कानूनी प्रावधान हासिल हो सकता है। हालांकि, मशहद की आपराधिक अदालत ने उनकी इस मानवीय दलील को सिरे से खारिज कर दिया और इसे जानबूझकर किया गया गंभीर अपराध करार देते हुए सीधे मृत्युदंड का फरमान सुना दिया।
‘मेरी आवाज बनिए…’: मशहद जेल से नजमेह की दर्दनाक गुहार
जेल की सलाखों के पीछे से बाहर आए नजमेह अमीनी के एक संदेश ने दुनिया भर के संवेदनशील लोगों को झकझोर कर रख दिया है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से अपनी जान बचाने की मार्मिक अपील करते हुए कहा:
“मैं आज खुद को कोई नायक या हीरो नहीं बनाना चाहती। मैं सिर्फ एक चीज चाहती हूं—कृपया मेरी आवाज बनिए। मैं कई सपनों और उम्मीदों वाली एक निर्दोष युवा लड़की हूं। घर पर मेरे बूढ़े माता-पिता मेरा इंतजार कर रहे हैं, जो हर रात मुझे खोने के डर से कांपते हुए अपनी रात से सुबह करते हैं।”
असहमति को कुचलने के लिए फांसी को हथियार बनाने का आरोप
एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्युमनिस्ट्स यूके समेत तमाम मानवाधिकार संगठनों ने इस फैसले की कड़े शब्दों में निंदा की है। अधिकार समूहों का कहना है कि तेहरान शासन देश के भीतर उठने वाली असहमति की हर आवाज को दबाने के लिए मौत की सजा को एक प्रशासनिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। अकेले इस साल अब तक ईरान में 600 से अधिक लोगों को फांसी के फंदे पर लटकाया जा चुका है। सोशल मीडिया गतिविधियों पर ईशनिंदा का यह नया मामला मई 2023 के उस मामले की याद दिलाता है जब यूसुफ मेहराद और सद्रोल्लाह फजेली-जारे को सोशल मीडिया पोस्ट के लिए फांसी दी गई थी।
क्या अब भी बची है जान बचने की कोई कानूनी उम्मीद?
कानूनी जानकारों के अनुसार, आपराधिक अदालत द्वारा मौत की सजा सुनाए जाने के बावजूद नजमेह अमीनी के पास इस फैसले को ईरान की सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च अदालत) में चुनौती देने का अधिकार अभी बाकी है। उनके वकील ऊपरी अदालत में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की तैयारी कर रहे हैं, जहां वे नशे की स्थिति, मानसिक दबाव और कम उम्र के आधार पर सजा को कम करने की गुहार लगाएंगे। वहीं दूसरी तरफ वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार परिषद पर यह दबाव बनाया जा रहा है कि वे तेहरान पर राजनयिक दबाव डालें ताकि एक सोशल मीडिया पोस्ट के बदले 23 साल की इस छात्रा की जिंदगी को छीने जाने से बचाया जा सके।
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