SC ने राहुल गांधी को लगाई कड़ी फटकार: CJI बोले- ‘कोई हमें डरा-धमका नहीं सकता’; न्यायपालिका पर टिप्पणी को लेकर जारी किया नोटिस

देश की शीर्ष अदालत ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा अदालतों और न्यायिक प्रणाली पर की गई हालिया टिप्पणियों पर बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ ने एक जनहित व अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि कोई भी राजनीतिक पद या कद संविधान और अदालत की गरिमा से बड़ा नहीं हो सकता। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली पीठ ने राहुल गांधी के बयानों को न्यायिक स्वतंत्रता और जनता के भरोसे पर सीधा हमला करार दिया। अदालत ने इस मामले में कड़ा संज्ञान लेते हुए राहुल गांधी को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और उनसे तय समयसीमा के भीतर यह स्पष्ट करने को कहा है कि उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए।

‘कोई हमें धमका नहीं सकता, हम संविधान के प्रति जवाबदेह हैं’: CJI का कड़ा संदेश

सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में माहौल उस वक्त बेहद गंभीर हो गया जब चीफ जस्टिस ने राहुल गांधी के सार्वजनिक मंचों से दिए गए बयानों पर गहरी नाराजगी जाहिर की। मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, “चाहे कोई कितना भी बड़ा नेता हो, कोई भी हमें डरा या धमका नहीं सकता। न्यायपालिका न तो किसी राजनीतिक दल के दबाव में काम करती है और न ही किसी के राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बन सकती है। हम केवल भारत के संविधान और कानून के शासन के प्रति जवाबदेह हैं।” पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए अदालतों की निष्पक्षता पर लांछन लगाना और जजों की मंशा पर सवाल उठाना एक खतरनाक चलन बन चुका है, जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

सार्वजनिक रैलियों में दिए गए बयानों को लेकर दाखिल हुई थी याचिका

यह पूरा मामला राहुल गांधी द्वारा हाल ही में चुनावी और सार्वजनिक रैलियों के दौरान दिए गए उन भाषणों से जुड़ा है, जिनमें उन्होंने आरोप लगाया था कि देश की संवैधानिक संस्थाएं और न्यायपालिका सरकार के दबाव में काम कर रही हैं। याचिककर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकीलों ने अदालत के समक्ष भाषणों के वीडियो फुटेज और लिखित दस्तावेज पेश करते हुए तर्क दिया कि इस प्रकार के गैर-जिम्मेदाराना बयानों से न्यायपालिका के प्रति आम नागरिकों के विश्वास को अपूरणीय क्षति पहुंचती है। याचिका में मांग की गई थी कि संविधान के अनुच्छेद 129 और अदालत की अवमानना अधिनियम के तहत विपक्षी नेता के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में कोई भी राजनीतिक दल न्यायिक गरिमा को राजनीति का अखाड़ा न बनाए।

राहुल गांधी के वकीलों की दलील और राजनीतिक हलचल

राहुल गांधी की ओर से अदालत में मौजूद विधिक प्रतिनिधियों ने स्थिति को संभालते हुए दलील दी कि उनके बयानों का मकसद अदालत का अनादर करना या न्यायिक स्वतंत्रता पर सवाल उठाना कतई नहीं था। बचाव पक्ष के वकीलों ने कहा कि भाषणों के कुछ चुनिंदा हिस्सों को संदर्भ से अलग करके पेश किया गया है और कांग्रेस पार्टी हमेशा से न्यायपालिका की सर्वोच्चता और स्वायत्तता का सम्मान करती आई है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन मौखिक दलीलों पर असंतोष जताते हुए औपचारिक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई के लिए कुछ हफ्तों बाद की तारीख मुकर्रर की। शीर्ष अदालत के इस सख्त रुख के बाद राष्ट्रीय स्तर पर कानूनी और सियासी बयानबाजी एक बार फिर चरम पर पहुंच गई है।

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