कैंसर मरीजों को सरकार की बड़ी राहत: 137 जीवनरक्षक दवाओं के दाम 70% तक घटे, जानिए अब आपकी जेब पर कितना कम होगा इलाज का भारी खर्च

अस्पताल के गलियारे में डॉक्टर की लिखी पर्ची हाथ में थामे जब कोई तीमारदार मेडिकल स्टोर की खिड़की पर खड़ा होता है, तो उसकी धड़कनें बीमारी के खौफ से ज्यादा बिल के डर से बढ़ रही होती हैं। भारत में कैंसर केवल एक जानलेवा बीमारी नहीं रहा, बल्कि यह लाखों मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों को आर्थिक तबाही के मुहाने पर धकेलने वाली त्रासदी बन चुका था। लेकिन अब देशभर के कैंसर मरीजों और उनके परिजनों के लिए राहत भरी एक ऐतिहासिक सुबह आई है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) और स्वास्थ्य मंत्रालय के कड़े कदमों के बाद बाजार में बिकने वाली 137 प्रमुख कैंसर दवाओं की कीमतों में 70 प्रतिशत तक की जबर्दस्त गिरावट दर्ज की गई है। इस फैसले के अमल में आने के बाद निजी और सरकारी दोनों तरह के अस्पतालों में कीमोथेरेपी, टारगेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी कराने वाले मरीजों के मासिक मेडिकल बिल में भारी कमी आ रही है। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, पटना, जयपुर और बेंगलुरु जैसे बड़े मेडिकल हब से लेकर छोटे जिलों के जिला अस्पतालों तक, यह राहत सीधे आम नागरिक की जेब तक पहुंचने लगी है।

महंगे इंजेक्शन और टैबलेट्स के चक्रव्यूह से कैसे टूटी दवाओं की मनमानी कीमतें

अक्सर देखा जाता था कि कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाले कुछ खास इंजेक्शन और गोलियों की एमआरपी (MRP) इतनी ज्यादा रखी जाती थी कि आम आदमी की पूरी जिंदगी की जमापूंजी महज तीन-चार साइकिल के कीमो सेशन में खत्म हो जाती थी। दवा कंपनियां ट्रेड मार्जिन के नाम पर मनमाना मुनाफा वसूल रही थीं, जिससे थोक भाव और रिटेल काउंटर की कीमतों में जमीन-आसमान का फर्क आ जाता था। सरकार ने इस बार सीधे ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन और प्राइस सीलिंग की कैंची चलाकर दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य को नियंत्रित कर दिया है। लंग कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर, ब्लड कैंसर, कोलोन और प्रोस्टेट कैंसर में दी जाने वाली सबसे असरदार दवाओं को इस नई प्राइस लिस्ट में शामिल किया गया है। जिन वायल की कीमत पहले पचास से साठ हजार रुपये हुआ करती थी, अब उनका दाम गिरकर पंद्रह से बीस हजार रुपये के दायरे में आ चुका है। वहीं दैनिक इस्तेमाल की ओरल कीमोथेरेपी गोलियों के पत्ते भी आधे से कम दाम पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जिससे लंबी अवधि तक चलने वाले ट्रीटमेंट का खर्च बेहद सहज हो गया है।

जानिए आम मरीज की जेब पर कितना कम होगा इलाज का भारी भरकम खर्च

यदि एक सामान्य कैंसर मरीज के इलाज के बजट का हिसाब लगाया जाए, तो औसतन हर महीने सिर्फ दवाओं और इंजेक्शन पर साठ हजार से सवा लाख रुपये तक खर्च हो जाते थे। रेडिएशन और डॉक्टर की फीस तो अलग थी, लेकिन सबसे बड़ा हिस्सा दवाइयों का ही होता था। अब 137 दवाओं पर 70 प्रतिशत तक की छूट लागू होने के बाद वही मासिक खर्च घटकर करीब पच्चीस से चालीस हजार रुपये के बीच सिमट रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि पूरे छह महीने के एक ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल में एक परिवार को कम से कम दो से चार लाख रुपये तक की सीधी बचत होगी। ग्रामीण इलाकों और कस्बों से बड़े कैंसर संस्थानों में रेफर होकर आने वाले मरीजों के लिए यह बचत किसी वरदान से कम नहीं है। अब तक कई परिवार केवल इस मजबूरी में इलाज बीच में छोड़ देते थे क्योंकि उनके पास अगली दवा खरीदने के लिए खेत बेचने या कर्ज लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता था, लेकिन कीमतों के इस नए ढांचे ने उन्हें इलाज पूरा करने की हिम्मत दी है।

दिल्ली से लेकर लखनऊ तक: देश के हर कोने में कैसे लागू हो रही है नई व्यवस्था

इस मूल्य कटौती का असर केवल मेट्रो शहरों के बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी दवा दुकानों पर नई एमआरपी के स्टॉक पहुंचने शुरू हो गए हैं। एम्स दिल्ली, टाटा मेमोरियल मुंबई, पीजीआई चंडीगढ़, केजीएमयू लखनऊ और महावीर कैंसर संस्थान पटना जैसे बड़े केंद्रों के आसपास चलने वाले अधिकृत फार्मेसी स्टोर्स पर ड्रग इंस्पेक्टर्स की विशेष टीमें तैनात की गई हैं। यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि कोई भी केमिस्ट पुरानी ऊंची एमआरपी पर दवाएं न बेचे। अगर किसी केमिस्ट के पास पुराना बैच रखा भी है, तो उसे संशोधित मूल्य सूची के अनुसार ही बिलिंग करने के सख्त निर्देश जारी किए गए हैं। इसके अलावा जन औषधि केंद्रों और अमृत (AMRIT) फार्मेसी काउंटरों पर इन दवाओं की उपलब्धता को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे दूर-दराज के मरीजों को बिना किसी बिचौलिए के सही दाम पर असली दवाएं मिल सकें।

एआई और डिजिटल मॉनिटरिंग से कालाबाजारी और नकली दवाओं पर कसेगा शिकंजा

सर्च इंजन और आधुनिक एआई टूल्स के दौर में अब मरीज और उनके परिजन भी बेहद जागरूक हो चुके हैं। सरकार ने ‘फार्मा सही दाम’ (Pharma Sahi Daam) ऐप और ऑनलाइन पोर्टल के डेटा को पूरी तरह अपडेट कर दिया है, जिससे मरीज दवा की स्ट्रिप खरीदते समय बारकोड या नाम डालकर उसका वास्तविक तय सरकारी मूल्य मोबाइल स्क्रीन पर तुरंत देख सकते हैं। यदि कोई मेडिकल स्टोर संचालक तय दर से एक रुपया भी ज्यादा मांगता है, तो उसी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शिकायत दर्ज करने की पारदर्शी व्यवस्था की गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से न केवल दवाओं की कालाबाजारी रुकेगी, बल्कि नकली दवाओं के समानांतर बाजार पर भी करारी चोट पहुंचेगी। जनहित में उठाया गया यह कदम भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने और सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुरक्षा के लक्ष्य को जमीन पर उतारने की दिशा में सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित हो रहा है।

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