
संयुक्त राष्ट्र (UN) की विभिन्न समितियों और मानवाधिकार परिषद से जुड़े तथाकथित अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को उस वक्त भारी कूटनीतिक फजीहत का सामना करना पड़ा, जब आतंकवाद विरोधी अभियानों पर सवाल उठाने पहुंचे प्रतिनिधियों को सुरक्षा बलों और संबंधित राष्ट्र के अधिकारियों ने सीधा और तीखा आईना दिखा दिया। आतंकियों, कट्टरपंथियों और समाज को लहूलुहान करने वाले चरमपंथियों की तुलना प्रतीकात्मक रूप से ‘कीड़े-मकौड़ों और कॉकरोचों’ से करते हुए सुरक्षा अधिकारियों ने कहा कि जो तत्व मासूम नागरिकों का कत्लेआम करते हैं, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होने पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएं अचानक उनके ‘अधिकारों’ की चिंता में आंसू बहाने लगती हैं।
अधिकारियों ने यूएन के प्रतिनिधियों को मंच पर ही दो-टूक शब्दों में नसीहत दी कि एयर-कंडीशन कमरों में बैठकर संप्रभु देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा पर निराधार रिपोर्ट बनाने के बजाय वे पहले जमीनी हकीकत समझें और अपने आरोपों के पुख्ता सबूत मेज पर रखें।
मानवाधिकारों की आड़ में चरमपंथियों की ढाल बनने का आरोप: ‘पहले सबूत पेश करो’
विवाद उस वक्त भड़का जब यूएन के कुछ विशेष प्रतिवेदकों (Special Rapporteurs) ने आतंकवाद विरोधी ऑपरेशनों, एनकाउंटर्स और सख्त कानूनों के क्रियान्वयन पर सवाल उठाते हुए सुरक्षा बलों पर मानवाधिकारों के हनन के एकतरफा आरोप लगाए। इसके जवाब में देश के कानूनी और सुरक्षा प्रतिनिधियों ने तीखा पलटवार करते हुए पूछा कि जब यही आतंकी निर्दोष बच्चों, महिलाओं और जवानों की जान लेते हैं, तब ये तथाकथित विशेषज्ञ किस बिल में छिप जाते हैं?
प्रतिनिधियों ने स्पष्ट लहजे में कहा कि केवल किसी प्रोपेगैंडा टूलकिट या अज्ञात स्रोतों के आधार पर संप्रभु राष्ट्रों की न्याय प्रणाली और सेना को बदनाम करने का दौर अब खत्म हो चुका है। यूएन के अधिकारियों को सीधी चुनौती दी गई कि वे सुरक्षा बलों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष पुष्टि के लिए ठोस साक्ष्य और फॉरेंसिक दस्तावेज सामने लाएं, न कि आतंकियों के हमदर्दों द्वारा गढ़ी गई झूठी कहानियों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर परोसें।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के दोहरे चरित्र पर फिर उठे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर वैश्विक स्तर पर पश्चिमी देशों और मानवाधिकार संगठनों के पाखंड को उजागर कर दिया है। सुरक्षा रणनीतिकारों का मानना है कि कई अंतरराष्ट्रीय मंचों का इस्तेमाल चुनिंदा राष्ट्रों पर भू-राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जाता है:
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पीड़ितों के अधिकारों की अनदेखी: आतंकवादी हमलों में मारे गए निर्दोष नागरिकों और शहादत देने वाले सैनिकों के मानवीय अधिकारों पर यह संस्थाएं अक्सर रहस्यमयी चुप्पी साध लेती हैं।
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अपराधियों के लिए कानूनी कवच: जब कानून के दायरे में रहकर चरमपंथ के बुनियादी ढांचे और उनके वित्तपोषण को ध्वस्त किया जाता है, तो इन कार्रवाइयों को ‘मानवाधिकार उल्लंघन’ का चोला पहनाकर भ्रम फैलाने की कोशिश की जाती है।
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हकीकत से कटे नियम: युद्धक्षेत्र और आतंकवाद विरोधी ऑपरेशनों की जमीनी वास्तविकताओं को समझे बिना सुदूर देशों में बैठकर नैतिक उपदेश देना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की सबसे बड़ी विडंबना बन चुका है।
संप्रभुता से कोई समझौता नहीं: राष्ट्रीय सुरक्षा ही सर्वोच्च प्राथमिकता
प्रशासनिक और रक्षा तंत्र ने साफ कर दिया है कि किसी भी बाहरी संस्था या विदेशी एजेंडे के दबाव में आकर आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर ढिलाई नहीं बरती जाएगी। कानून का शासन लागू करना और नागरिकों की जान-माल की हिफाजत करना किसी भी चुनी हुई सरकार का पहला और अंतिम संवैधानिक दायित्व है।
अधिकारियों ने कड़े शब्दों में संदेश दिया कि जो लोग आतंक का रास्ता चुनते हैं, उन्हें न्याय के कठघरे में उसी भाषा में जवाब दिया जाएगा जो वे समझते हैं। यूएन के प्रतिनिधियों को मिले इस अप्रत्याशित और सख्त जवाब ने साफ कर दिया है कि नए दौर में राष्ट्र अब अपने आंतरिक मामलों में किसी भी प्रकार के चुनिंदा ‘सहानुभूति कार्ड’ और झूठे मानवाधिकारवादी आख्यानों को कतई बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं।
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