UAPA में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, धारा 43D(7) की रोक के लिए ‘अवैध प्रवेश’ साबित करना जरूरी

देश की शीर्ष अदालत ने आतंकवाद विरोधी कठोर कानून गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए (UAPA) के तहत विदेशी नागरिकों की जमानत को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर पेश करने वाला कानूनी फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि किसी आरोपी का महज विदेशी नागरिक होना या उसके वीजा की मियाद खत्म हो जाना (ओवरस्टे) उसे यूएपीए के तहत जमानत के वैधानिक अधिकार से वंचित करने का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने साफ किया कि यूएपीए की धारा 43D(7) के तहत जमानत पर पूर्ण रोक तभी प्रभावी होगी, जब अभियोजन पक्ष यह ठोस रूप से साबित करे कि उस विदेशी नागरिक ने भारत की सीमा में प्रवेश ही बिना वैध दस्तावेजों या अवैध तरीके से किया था। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की दो सदस्यीय खंडपीठ ने केंद्र सरकार की याचिका को खारिज करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इस फैसले ने देश के आपराधिक न्यायशास्त्र, मानवाधिकारों और आतंकवाद से जुड़े मामलों में निष्पक्ष सुनवाई के संवैधानिक संतुलन पर एक नई और मजबूत मुहर लगा दी है।

विदेशी नागरिकता अकेले जमानत खारिज करने का हथियार नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में यूएपीए की धारा 43D(7) की कानूनी व्याख्या करते हुए कहा कि कानून की इस धारा का मकसद केवल किसी विदेशी नागरिक को स्वतः राहत से वंचित करना नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब तक यह साबित न हो जाए कि आरोपी ने भारत में अनधिकृत या गैरकानूनी रूप से प्रवेश किया था, तब तक उसके विदेशी होने भर से अदालत के जमानत देने के अधिकार क्षेत्र पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। यदि कोई व्यक्ति वैध पासपोर्ट, वैध वीजा या प्राधिकृत मार्ग से भारत आया था और बाद में उसके ठहरने की अवधि समाप्त हो गई, तो इसे ‘अवैध प्रवेश’ की श्रेणी में नहीं माना जा सकता। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता सर्वोपरि हैं, लेकिन कानून के कठोर प्रावधानों की मनमानी व्याख्या करके किसी भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता।

मोहम्मद रिफास मामले में केंद्र सरकार की अपील खारिज

यह ऐतिहासिक फैसला ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम मोहम्मद रिफास उर्फ मोहम्मद रिगबास’ के बहुचर्चित मामले में आया है। इस मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने आरोपी को दी गई डिफॉल्ट जमानत को रद्द करने के निचली अदालत के आदेश को पलटते हुए उसकी जमानत बहाल कर दी थी। केंद्र सरकार और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने मद्रास हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि आरोपी श्रीलंका का नागरिक है और उस पर देशविरोधी गतिविधियों के तहत यूएपीए के गंभीर आरोप दर्ज हैं, ऐसे में धारा 43D(7) के तहत उसे किसी भी सूरत में जमानत पर रिहा नहीं किया जाना चाहिए। वहीं आरोपी के वकील ए. वेलन ने दलील दी कि आरोपी को समय पर चार्जशीट दाखिल न होने के कारण वैधानिक (डिफॉल्ट) जमानत मिली थी और जांच एजेंसी यह साबित करने में विफल रही कि उसका भारत में शुरुआती प्रवेश अवैध था। सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया और केंद्र सरकार की विशेष अनुमति याचिका (SLP) को योग्यताहीन मानते हुए खारिज कर दिया।

क्या है धारा 43D(7) और क्यों तय की गई ‘अवैध प्रवेश’ की यह एक शर्त?

यूएपीए की धारा 43D(7) में यह प्रावधान किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है और उस पर इस कानून के तहत अपराध का आरोप है, तो उसे तब तक जमानत नहीं दी जाएगी जब तक कि अदालत को यह न लगे कि उसके खिलाफ आरोप झूठे हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा के विधायी उद्देश्य (लेजिस्लेटिव इंटेंट) का विश्लेषण करते हुए साफ किया कि संसद ने यह सख्त बाधा केवल उन विदेशी तत्वों के लिए बनाई थी जो अवैध रूप से भारत में घुसपैठ करते हैं और देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सीधा खतरा पैदा करते हैं। अदालत ने यह बेहद बारीक अंतर रेखांकित किया कि ‘अवैध प्रवेश’ (Illegal Entry) और ‘वीजा अवधि समाप्त होने के बाद रुकना’ (Overstaying) दो पूरी तरह से अलग कानूनी स्थितियां हैं। यदि किसी विदेशी ने वैध आव्रजन जांच चौकियों से कानूनी रूप से देश में कदम रखा था, तो उस पर धारा 43D(7) की पूर्ण रोक लागू नहीं होगी। इसके साथ ही, अदालत ने यह भी व्यवस्था दी कि धारा 43D(7) की रोक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167(2) के तहत मिलने वाली सांविधिक यानी ‘डिफॉल्ट जमानत’ के अधिकार को भी नहीं छीन सकती।

डिफॉल्ट जमानत के अधिकार और लंबी देरी पर सख्त टिप्पणी

पीठ ने अपने आदेश में इस बात को भी गंभीरता से दर्ज किया कि जब जांच एजेंसी तय कानूनी समय-सीमा (चार्जशीट दाखिल करने की मियाद) के भीतर आरोप-पत्र दाखिल करने में विफल रहती है, तो आरोपी को डिफॉल्ट जमानत पाने का निर्विवाद अधिकार मिल जाता है। अदालत ने कहा कि इस मामले में चार्जशीट दाखिल होने के करीब एक साल बाद तक जांच एजेंसी ने जमानत रद्द करने की कोई ठोस अर्जी नहीं लगाई और बाद में अचानक विदेशी नागरिकता का आधार बनाकर पुरानी प्रक्रिया को उलटने का प्रयास किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि प्रक्रियागत चूक के कारण मिले जमानत के अधिकार को जांच एजेंसियों की सुस्ती या बिना पुख्ता तथ्यों के मात्र आरोपों के आधार पर छिना नहीं जा सकता। जब तक ट्रायल कोर्ट में अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक कानून के समक्ष हर आरोपी को निर्दोष माना जाता है।

आपराधिक न्याय प्रणाली और मानवाधिकारों के बीच बड़ा मील का पत्थर

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में आतंकवाद निरोधक मामलों में कानूनी प्रक्रिया की दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा। अक्सर कठोर कानूनों के मामलों में आरोपियों को महज उनकी नागरिकता या तकनीकी उल्लंघन के आधार पर वर्षों तक बिना सुनवाई जेलों में बंद रखा जाता है। इस निर्णय से देश की सभी अदालतों को यह स्पष्ट संदेश गया है कि सख्त से सख्त कानून के भीतर भी न्याय, समानता और निष्पक्षता की कसौटियों का पालन अनिवार्य है। विदेशी नागरिकों के मामले में भी यदि राज्य उनके जमानत के अधिकार को छीनना चाहता है, तो उसे टेबल पर यह ठोस दस्तावेजी साक्ष्य पेश करना होगा कि आरोपी देश की सीमा में अवैध रूप से दाखिल हुआ था। केवल विदेशी होने का तमगा लगाकर किसी को बुनियादी कानूनी राहत से वंचित नहीं किया जा सकता।

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