
भारतीय सिनेमा जगत में अदाकारी के साथ-साथ सितारों की राजनीतिक और सामाजिक विचारधारा को लेकर बहस छिड़ना कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब इंडस्ट्री के दो बेहद दिग्गज और अनुभवी चेहरे वैचारिक रूप से आमने-सामने आ जाएं, तो यह टकराव बेहद गंभीर रूप ले लेता है। इन दिनों बॉलीवुड गलियारों से लेकर सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म्स पर ऐसा ही एक तीखा विवाद गरमाया हुआ है। बीआर चोपड़ा के ऐतिहासिक धारावाहिक ‘महाभारत’ में दुर्योधन का अमर किरदार निभाकर घर-घर में अपनी पहचान बनाने वाले वरिष्ठ अभिनेता पुनीत इस्सर ने जाने-माने अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के हालिया बयानों पर जोरदार हमला बोला है। नसीरुद्दीन शाह द्वारा हाल ही में खुद को गर्व से ‘दिमागी नक्सल’ बताने और केंद्र सरकार की नीतियों पर निशाना साधने के बाद पुनीत इस्सर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। इस्सर ने नसीरुद्दीन शाह की कथित ‘सिलेक्टिव चुप्पी’ (चुनिंदा मुद्दों पर बोलना) पर तीखे सवाल दागते हुए दो टूक कहा कि अगर किसी को देश की चुनी हुई सरकार की नीतियां पसंद नहीं हैं, तो वह टीवी या इंटरनेट पर बैठकर माहौल खराब करने के बजाय लोकतांत्रिक मैदान में उतरे, चुनाव लड़े और सरकार को हराकर दिखाए।
‘दिमागी नक्सल’ बयान से उठा सियासी तूफान: जानिए आखिर नसीरुद्दीन शाह ने क्या कहा था?
इस पूरे विवाद की जड़ नसीरुद्दीन शाह का वह वीडियो बयान है, जिसे उन्होंने हाल ही में अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर साझा किया था। दरअसल, दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में छात्रों द्वारा छात्र संघ की बहाली को लेकर किए जा रहे विरोध-प्रदर्शन के समर्थन में नसीरुद्दीन शाह खुलकर सामने आए थे। कैमरे के सामने अपनी बात रखते हुए दिग्गज अभिनेता ने छात्रों के इस आंदोलन की तुलना जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के पुराने आंदोलनों से की और आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करने और सवाल पूछने वाले युवाओं का मनोबल तोड़ने का काम कर रही है। इसी वीडियो में नसीरुद्दीन शाह ने एक बेहद विवादित टिप्पणी करते हुए खुद को ‘दिमागी नक्सल’ करार दिया और दावा किया कि जो लोग सत्ताधारी दल की सोच और नीतियों से असहमति जताते हैं, उन्हें जानबूझकर ‘राष्ट्रविरोधी’ या ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का ठप्पा लगाकर निशाना बनाया जाता है। नसीरुद्दीन का यह बयान सामने आते ही राजनीतिक और फिल्मी हलकों में भूचाल आ गया और इसी बयान ने पुनीत इस्सर के सब्र का बांध तोड़ दिया।
‘वे मेरे सीनियर और शिक्षक रहे हैं, लेकिन…’: पुनीत इस्सर ने कैसे साधा सिलेक्टिव चुप्पी पर निशाना?
नसीरुद्दीन शाह के इस रुख पर समाचार एजेंसी से बातचीत करते हुए पुनीत इस्सर ने बेहद नपे-तुले लेकिन कड़े शब्दों में अपनी बात रखी। पुनीत ने बातचीत की शुरुआत में नसीरुद्दीन शाह के कद और उनकी कला का सम्मान करते हुए कहा कि नसीर साहब उनके सीनियर हैं, वे एक्टिंग स्कूल के दिनों में उनके शिक्षक भी रहे हैं और इसमें कोई दोराय नहीं है कि वे एक असाधारण और उम्दा कलाकार हैं। लेकिन इसके फौरन बाद पुनीत ने उनकी कथनी और करनी के अंतर पर तीखा प्रहार किया। पुनीत ने कहा कि कला का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन जब बात देश की आती है तो चुप नहीं रहा जा सकता।
पुनीत इस्सर ने सवाल उठाया कि जब दुनिया भर में या भारत के भीतर गंभीर संकट आते हैं, जब आम नागरिकों या जवानों पर हमले होते हैं, तब नसीर साहब जैसे बुद्धिजीवी पूरी तरह गूंगे और मूकदर्शक क्यों बन जाते हैं? पुनीत ने आरोप लगाया कि कुछ तथाकथित लिबरल बुद्धिजीवियों की यह पुरानी फितरत बन चुकी है कि वे हर मुद्दे को केवल वामपंथी, नक्सल-समर्थक और एकतरफा चश्मे से ही देखते हैं। जब अपनी पसंद का नैरेटिव सेट करना होता है तब तो वे कैमरे के सामने आकर लंबे-चौड़े भाषण देते हैं, लेकिन जब देशहित या बहुसंख्यक समाज से जुड़े मुद्दों पर निष्पक्ष स्टैंड लेने की बात आती है, तो वे पूरी तरह चुप्पी साध लेते हैं। पुनीत ने कहा कि यह सिलेक्टिव रवैया न सिर्फ गलत है बल्कि इससे समाज में गलत संदेश जाता है।
‘सरकार मनमानी से नहीं आई, जनता ने चुना है’: मैदान में उतरकर चुनाव लड़ने की खुली चुनौती
पुनीत इस्सर ने लोकतंत्र की मूल भावना का हवाला देते हुए नसीरुद्दीन शाह और उनके विचारों से सहमति रखने वाले तबके को आईना दिखाया। पुनीत ने साफ शब्दों में कहा कि भारत एक जीवंत और मजबूत लोकतंत्र है, जहां हर नागरिक को अपनी बात कहने और सरकार की आलोचना करने का पूरा अधिकार संविधान ने दिया है। लेकिन आलोचना और नफरत के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है जिसे पार नहीं किया जाना चाहिए। पुनीत ने कहा कि आज जो सरकार देश की सत्ता में है, वह किसी मनमाने तरीके या पिछले दरवाजे से नहीं आई है। देश के करोड़ों मतदाताओं ने लंबी कतारों में खड़े होकर, अपने मताधिकार का इस्तेमाल करके पूर्ण बहुमत के साथ इस सरकार को चुना है। ऐसे में जनादेश का बार-बार अपमान करना कतई स्वीकार्य नहीं है।
पुनीत इस्सर ने नसीरुद्दीन शाह को सीधी चुनौती देते हुए कहा, “अगर आपको यह सरकार इतनी ही नापसंद है, अगर आपको लगता है कि देश की जनता गलत दिशा में जा रही है, तो आप सोशल मीडिया पर बैठकर नैरेटिव गढ़ना बंद कीजिए। आप सीधे चुनावी मैदान में उतरिए, अपनी विचारधारा को जनता की अदालत में रखिए, चुनाव लड़िए, जीतिए और इस सरकार को हरा दीजिए। आपको किसने रोका है? जनता के सामने जाइए और कहिए कि आपकी सोच सही है। लेकिन जब आप चुनाव लड़ने का साहस नहीं जुटा सकते, तो जनता द्वारा चुनी गई लोकतांत्रिक सरकार को हर वक्त कोसने का नैतिक अधिकार भी आपके पास नहीं रह जाता।”
टुकड़े-टुकड़े गैंग और जेएनयू का जिक्र: राष्ट्रवाद बनाम वामपंथी विमर्श पर तीखे सवाल
अपनी बातचीत के दौरान पुनीत इस्सर ने बेहद आक्रामक अंदाज में उस वैचारिक धारा को कठघरे में खड़ा किया, जिसे वे देश को कमजोर करने वाला मानते हैं। पुनीत ने जेएनयू और दिल्ली के कुछ परिसरों में लगने वाले नारों का जिक्र करते हुए कहा कि जब जेलों में बंद अपराधियों, दंगाइयों और आतंकवादियों की मानवाधिकारों के नाम पर रिहाई की वकालत की जाती है, तो वही लोग सबसे आगे नजर आते हैं। उन्होंने सवाल किया कि अगर कोई व्यक्ति ऐसे लोगों के साथ खड़ा होता है जो देश की संप्रभुता को चुनौती देते हैं या जो देश को बांटने की मंशा रखने वालों की ढाल बनते हैं, तो फिर उसकी राष्ट्रीय निष्ठा पर सवाल क्यों न खड़े हों?
पुनीत ने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब सेना के जवान सीमा पर अपनी जान कुर्बान करते हैं, तब इन बुद्धिजीवियों के मुंह से संवेदना का एक शब्द नहीं निकलता, लेकिन जब किसी असामाजिक तत्व पर कानून का शिकंजा कसता है, तो तुरंत लोकतंत्र खतरे में आ जाता है। पुनीत इस्सर के इस बयान के बाद फिल्म बिरादरी के अन्य लोगों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। जहां फिल्म निर्माता अशोक पंडित ने नसीरुद्दीन शाह के बयान पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे भ्रामक करार दिया, वहीं परेश रावल ने एक संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि हर व्यक्ति को अपनी निजी राय रखने का लोकतांत्रिक अधिकार है, भले ही कोई उससे सहमत हो या न हो।
बॉलीवुड में वैचारिक ध्रुवीकरण: सोशल मीडिया पर जनता की बंटी राय और अभिव्यक्ति की बहस
पुनीत इस्सर के इस तीखे बयान ने हिंदी फिल्म उद्योग में लंबे समय से सुलग रही उस वैचारिक खाई को एक बार फिर सतह पर ला दिया है, जहां सितारे दो अलग-अलग छोर पर खड़े नजर आते हैं। एक तरफ वे कलाकार हैं जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, पारंपरिक मूल्यों और मौजूदा सरकार की नीतियों का खुलकर समर्थन करते हैं, वहीं दूसरी तरफ वे कलाकार हैं जो खुद को व्यवस्था विरोधी, लिबरल और आलोचक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। सोशल मीडिया पर पुनीत इस्सर के बयान का वीडियो वायरल होते ही इंटरनेट यूजर्स भी दो धड़ों में बंट गए हैं।
बड़ी संख्या में नेटिजन्स पुनीत इस्सर की बेबाकी की तारीफ कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि पुनीत ने बिल्कुल सही नस पकड़ी है, क्योंकि कला की आड़ में राष्ट्रविरोधी ताकतों को बौद्धिक संरक्षण देना पूरी तरह अनुचित है। यूजर्स का तर्क है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कोई एकतरफा रास्ता नहीं है और अगर कोई सरकार की आलोचना कर सकता है, तो जनता को भी उसकी सिलेक्टिव राजनीति पर सवाल उठाने का पूरा हक है। वहीं दूसरी तरफ, नसीरुद्दीन शाह के समर्थकों का दावा है कि एक सजग नागरिक और कलाकार के तौर पर समाज में हो रहे घटनाक्रमों पर सवाल पूछना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है और आलोचना को सीधे तौर पर देशद्रोह से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
पुनीत इस्सर के इस करारे पलटवार के बाद अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या नसीरुद्दीन शाह हमेशा की तरह अपनी बात पर अडिग रहते हुए इस खुली चुनौती का कोई जवाब देंगे, या फिर वे इस मामले पर खामोशी अख्तियार कर लेंगे। बहरहाल, महाभारत के दुर्योधन बनकर दशकों पहले संवादों की जो गूंज पुनीत इस्सर ने छोड़ी थी, आज उनके इस तीखे और बेबाक बयान ने भारतीय राजनीति और सिनेमा के गलियारों में एक नया वैचारिक महाभारत जरूर छेड़ दिया है।
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