
तेहरान: संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में राजनीतिक सत्ता संतुलन बदलने और कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी की वापसी के बाद ईरान के सत्ता प्रतिष्ठान ने बेहद सख्त और स्पष्ट संदेश दिया है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अत्यंत प्रभावशाली पुत्र और देश की राजनीतिक-धार्मिक व्यवस्था में निर्णायक रसूख रखने वाले मौलवी मोजतबा खामेनेई (Mojtaba Khamenei) ने अमेरिकी चुनावी घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।
मोजतबा खामेनेई ने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि अमेरिका में चाहे व्हाइट हाउस में कोई बैठे या संसद में किसी भी पार्टी का बहुमत हो, इससे तेहरान और इस्लामी दुनिया के प्रति वाशिंगटन की बुनियादी नीतियों में कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “अमेरिका में सिर्फ चेहरे और सत्ताधारी दल बदले हैं, लेकिन उनकी नीयत, वर्चस्ववादी नीतियां और ईरान के प्रति दुर्भावना पहले जैसी ही है।”
1. ‘सत्ता बदली है, नीयत नहीं’: बयान का मूल संदेश
तेहरान में एक उच्चस्तरीय धार्मिक व रणनीतिक सभा को संबोधित करते हुए मोजतबा खामेनेई ने अमेरिका की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों—रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स—को एक ही सिक्के के दो पहलू बताया।
मोजतबा खामेनेई ने कहा:
“अमेरिका के भीतर कौन सी पार्टी चुनाव जीतती है या कौन हारती है, यह उनका आंतरिक मामला है। लेकिन इस्लामी गणराज्य ईरान के खिलाफ उनकी समग्र नीति कभी नहीं बदली। रिपब्लिकन खुलेआम धमकियां देते हैं और प्रतिबंध लगाते हैं, जबकि डेमोक्रेट्स मानवाधिकारों और कूटनीति के मुखौटे के पीछे से वही आर्थिक युद्ध जारी रखते हैं। वाशिंगटन में सत्ता का रंग बदल सकता है, लेकिन दुनिया पर अपना आधिपत्य जमाने की उनकी नीयत कभी नहीं बदलती।”
उन्होंने कहा कि ईरान को अमेरिका में किसी भी पार्टी की चुनावी जीत या हार से कोई उम्मीद नहीं लगानी चाहिए, बल्कि देश को अपनी आत्मनिर्भरता, घरेलू अर्थव्यवस्था और रक्षा क्षमताओं को और अधिक मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
2. कौन हैं मोजतबा खामेनेई और उनके बयान के क्या हैं राजनीतिक मायने?
57 वर्षीय मोजतबा खामेनेई ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के दूसरे सबसे बड़े बेटे हैं।
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पर्दे के पीछे का प्रभाव: मोजतबा सार्वजनिक मंचों और मीडिया से काफी हद तक दूरी बनाए रखते हैं, लेकिन देश की खुफिया एजेंसियों, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और बासिज मिलिशिया पर उनका गहरा रणनीतिक प्रभाव माना जाता है।
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संभावित उत्तराधिकारी की चर्चा: ईरानी हलकों में उन्हें अक्सर देश के अगले सर्वोच्च नेता के संभावित दावेदारों में गिना जाता है।
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बयान का महत्व: एक ऐसे नेता का, जो बहुत कम सार्वजनिक राजनीतिक बयान देता है, अमेरिकी चुनावों पर सीधे टिप्पणी करना यह दर्शाता है कि तेहरान अब वाशिंगटन के किसी भी राजनीतिक बदलाव को लेकर कूटनीतिक मुगालते में नहीं रहना चाहता।
3. ‘प्रतिबंध और आर्थिक युद्ध’: वाशिंगटन की नीति पर ईरान का सवाल
ईरानी विश्लेषकों का मानना है कि मोजतबा खामेनेई का यह रुख पिछले डेढ़ दशक के अनुभवों पर आधारित है।
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2015 के ऐतिहासिक परमाणु समझौते (JCPOA) पर तत्कालीन डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में हस्ताक्षर हुए थे, लेकिन उसके तुरंत बाद 2018 में रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एकतरफा फैसला लेते हुए अमेरिका को समझौते से बाहर कर दिया और ‘अधिकतम दबाव’ (Maximum Pressure) की नीति लागू कर दी।
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इसके बाद जो बाइडेन के कार्यकाल में भी कड़े प्रतिबंध पूरी तरह नहीं हटाए गए।
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मोजतबा खामेनेई ने जोर देकर कहा कि अमेरिकी कांग्रेस पर नियंत्रण बदलने के बाद भी ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में ढील मिलने की कोई गुंजाइश नहीं है, क्योंकि दोनों ही दल इजरायल के हितों और मध्य-पूर्व में पश्चिमी प्रभाव को बनाए रखने के लिए पूरी तरह एकमत रहते हैं।
4. मध्य-पूर्व संकट और ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ पर अडिग रुख
मोजतबा खामेनेई ने अपने भाषण में मध्य-पूर्व (पश्चिम एशिया) के मौजूदा तनाव और गाजा-लेबनान संकट का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका में कोई भी सत्ता में रहे, वह हमेशा इजरायल की आक्रामकता को वित्तीय और सैन्य रूप से समर्थन देता रहा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान अपने सहयोगी गुटों यानी ‘प्रतिरोध के मोर्चे’ (Axis of Resistance) का समर्थन किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद जारी रखेगा। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों की धमकियां न तो हिजबुल्लाह और हमास जैसे आंदोलनों को कमजोर कर पाई हैं और न ही ईरान के संप्रभु अधिकारों को दबा सकी हैं।
5. तेहरान की दो-टूक: ‘दबाव के आगे नहीं झुकेगा इस्लामिक गणराज्य’
मोजतबा खामेनेई के इस बयान को तेहरान की विदेश नीति की औपचारिक दिशा के रूप में देखा जा रहा है। ईरानी नेतृत्व ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि:
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ईरान अपनी रक्षात्मक मिसाइल प्रणाली और शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम पर किसी भी विदेशी शक्ति के साथ सौदेबाजी नहीं करेगा।
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देश की आर्थिक दिशा अब पश्चिमी देशों के साथ समझौतों के बजाय एशिया-केंद्रित व्यापार (रूस, चीन और ब्रिक्स देशों के साथ सहयोग) पर निर्भर रहेगी।
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अमेरिका की विभाजित संसद और ट्रंप प्रशासन के संभावित नीतिगत गतिरोध का फायदा उठाकर ईरान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्थिति को और मजबूत करेगा।
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