तमिलनाडु का सियासी चक्रव्यूह: क्या जल्दबाजी में फंस गई कांग्रेस? विजय के साथ जाने पर स्टालिन का ‘काउंटर-प्लान’ तैयार

चेन्नई: तमिलनाडु की राजनीति में इस वक्त हर पल समीकरण बदल रहे हैं। अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) को समर्थन देकर कांग्रेस खुद को एक नई दुविधा में फंसी महसूस कर रही है। महज 5 सीटें जीतने वाली कांग्रेस ने नतीजों के अगले ही दिन विजय को समर्थन देकर ‘सत्ता सुख’ और कैबिनेट में हिस्सेदारी की उम्मीद तो पाल ली, लेकिन बुधवार शाम राजभवन से आई खबर ने उसके उत्साह पर पानी फेर दिया।

राजभवन में अटका विजय का दावा: बहुमत से अब भी दूर

राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने विजय से सीधा सवाल किया कि उनके पास सरकार बनाने के लिए जरूरी 118 विधायकों का जादुई आंकड़ा कहां है? गणित कुछ इस प्रकार उलझा है:

  • विजय (TVK): 108 सीटें

  • कांग्रेस समर्थन: 5 सीटें

  • कुल योग: 113 सीटें (बहुमत से 5 कम)

समस्या यह है कि अन्य संभावित सहयोगी जैसे VCK, मुस्लिम लीग (IUML), CPI और CPM ने विजय को समर्थन देने से साफ इनकार कर दिया है। AIADMK ने भी विजय के साथ जाने की खबरों को खारिज कर दिया है, जिससे थालापति विजय की ‘ताजपोशी’ पर फिलहाल ब्रेक लग गया है।

स्टालिन का ‘महा-गठबंधन’ दांव: क्या कट्टर दुश्मन बनेंगे दोस्त?

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा झटका एम.के. स्टालिन की रणनीति हो सकती है। सियासी गलियारों में चर्चा तेज है कि क्या DMK (59 सीटें) और AIADMK (47 सीटें) एक साथ आ सकते हैं? अगर ऐसा होता है, तो यह भारतीय राजनीति की वैसी ही ‘उलटबांसी’ होगी जैसे यूपी में सपा-बसपा या महाराष्ट्र में शिवसेना-कांग्रेस-NCP का साथ आना था।

बुधवार को कई छोटे दलों के नेताओं ने स्टालिन से मुलाकात की है, जो इस ओर इशारा करता है कि DMK किसी भी कीमत पर विजय को सत्ता से दूर रखने के लिए ‘महा-गठबंधन’ का रास्ता चुन सकती है।

कांग्रेस का बचाव: “गठबंधन टूटना कोई नई बात नहीं”

कांग्रेस की ओर से लगातार हो रही आलोचनाओं का जवाब देते हुए सांसद जोथीमणि सेन्निमलाई ने तीखा पलटवार किया है। उन्होंने DMK को याद दिलाया कि:

  • 2014 का कड़वा अनुभव: 2014 के संसदीय चुनाव से महज एक सप्ताह पहले DMK ने कांग्रेस को गठबंधन से बाहर कर दिया था और कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ना पड़ा था।

  • विचारधारा का तर्क: कांग्रेस ने विजय का साथ देने को सही ठहराते हुए कहा कि विजय की विचारधारा भी ‘सेकुलर’ है, इसलिए यह कोई अवसरवाद नहीं बल्कि राजनीतिक फैसला है।

आगे क्या? कांग्रेस के पास विकल्प सीमित

अगर विजय सरकार बनाने में विफल रहते हैं और DMK-AIADMK के बीच कोई अनौपचारिक समझौता होता है, तो कांग्रेस तमिलनाडु में पूरी तरह अलग-थलग पड़ सकती है। फिलहाल, कांग्रेस की स्थिति ‘न इधर के, न उधर के’ वाली हो गई है। सबकी नजरें अब राज्यपाल के अगले कदम और उन 5 ‘जादुई’ विधायकों पर टिकी हैं, जो तमिलनाडु का अगला मुख्यमंत्री तय करेंगे।

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