विदेशी सहायता पर नेपाल सरकार का बड़ा यूटर्न: भीषण जल प्रलय के बीच भारत और चीन दोनों की मदद स्वीकारी; काठमांडू ने बदला रुख, नई दिल्ली और बीजिंग से पहुंची राहत टीमें

काठमांडू : पड़ोसी देश नेपाल में हाल ही में आई भीषण मानसूनी आपदा, बादल फटने और ग्लेशियर टूटने से मची ऐतिहासिक तबाही के बाद काठमांडू सरकार ने अपनी राहत नीतियों में बड़ा बदलाव किया है। आपदा के शुरुआती दौर में विदेशी सहायता से दूरी बनाए रखने और केवल घरेलू संसाधनों से स्थिति संभालने का दावा करने वाली नेपाल सरकार ने जमीनी हकीकत और बर्बादी के विकराल पैमाने को देखते हुए बड़ा यूटर्न लिया है। प्रधानमंत्री कार्यालय और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने स्पष्ट किया है कि संकट की इस घड़ी में नेपाल अपने दोनों निकटतम पड़ोसी देशों भारत और चीन से आने वाली सभी प्रकार की मानवीय, तकनीकी, चिकित्सीय और ढांचागत सहायता को पूरी तरह स्वीकार कर रहा है। दोनों महाशक्तियों की ओर से भेजी जा रही राहत सामग्री और विशेषज्ञ दल अब ग्राउंड जीरो पर बचाव कार्यों में जुट गए हैं।

आत्मनिर्भरता के दावे से यूटर्न तक: आपदा की विभीषिका ने बदला काठमांडू का रुख

आपदा के पहले दो दिनों में नेपाल के प्रशासनिक महकमे का मानना था कि सेना, सशस्त्र पुलिस बल (APF) और स्थानीय प्रशासन मिलकर बचाव और राहत कार्य पूरा कर लेंगे। हालांकि, जैसे-जैसे रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, चितवन, गोरखा और सिंधुपालचोक जैसे सुदूर पहाड़ी जिलों से विनाश की तस्वीरें और मृतकों के खौफनाक आंकड़े सामने आने लगे, काठमांडू को अपनी सीमाओं का अहसास हुआ।

सैकड़ों किलोमीटर लंबे राजमार्ग बह जाने, 80 से अधिक प्रमुख पुलों के नष्ट होने और 13 बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं के मलबे में दब जाने के कारण देश की आंतरिक कनेक्टिविटी और संचार व्यवस्था चरमरा गई। भारी बारिश और बैरियर झीलों के मंडराते खतरे के बीच प्रभावित इलाकों तक समय पर राशन, पीने का साफ पानी, दवाएं और मलबे को हटाने के लिए भारी तकनीकी उपकरण पहुंचाना नेपाल की घरेलू एजेंसियों के लिए अकेले संभव नहीं था। मानवीय संकट को गहराते देख प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) की आपात बैठक में तत्काल विदेशी सहायता को बिना शर्त स्वीकार करने की हरी झंडी दी गई।

भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति: मेडिकल टीमें, दवाएं और टनल रेस्क्यू एक्सपर्ट्स

भारत सरकार ने संकट की पहली सूचना मिलते ही अपनी ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (पड़ोसी प्रथम) नीति के तहत नेपाल के लिए मदद का हाथ बढ़ाया। नेपाल सरकार की औपचारिक सहमति मिलते ही नई दिल्ली से भारतीय वायुसेना के विशेष विमानों और सीमावर्ती सड़क मार्गों के जरिए दर्जनों टन आपातकालीन राहत सामग्री नेपाल पहुंचाई गई।

भारत की ओर से भेजी गई इस खेप में टेंट, वाटर प्यूरिफिकेशन यूनिट्स, जनरेटर, कंबल, आवश्यक खाद्य पैकेट्स और बड़े पैमाने पर जीवनरक्षक एंटी-बायोटिक्स व एंटी-वेनम दवाएं शामिल हैं। इसके साथ ही, त्रिशूली और भोटेकोशी बेसिन में स्थित जलविद्युत परियोजनाओं की धंसी हुई सुरंगों से कामगारों को निकालने के लिए भारत ने राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) के अनुभवी टनल रेस्क्यू विशेषज्ञों और डॉक्टरों की एक विशेष 11 सदस्यीय मेडिकल टीम को भी ग्राउंड जीरो पर भेजा है। भारत के विदेश मंत्रालय ने नई दिल्ली और काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास में 24 घंटे सक्रिय कंट्रोल रूम स्थापित किए हैं, जिससे सीमा पार राहत कार्यों में किसी प्रकार की प्रशासनिक रुकावट न आए।

चीन से भारी मशीनरी और तिब्बत सीमा की बैरियर झीलों पर टेक्निकल सपोर्ट

दूसरी ओर, उत्तरी सीमा से सटे नेपाल के व्यापारिक केंद्र रसुवागढ़ी-केरुंग कॉरिडोर में मलबे को साफ करने और वहां फंसे सैकड़ों ट्रकों व श्रमिकों को राहत पहुंचाने के लिए चीन ने भी अपना रेस्क्यू अभियान तेज कर दिया है। चीन सरकार ने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से भारी अर्थ-मूविंग मशीनरी, बुलडोजर, क्रेन और हाइड्रोलिक कटर सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात किए हैं।

विशेष रूप से नेपाल-तिब्बत सीमा पर ल्हेंदे नदी और प्योरपू त्सांगपो संगम के पास भूस्खलन से बनी विशाल बैरियर झीलों (प्राकृतिक बांधों) की वास्तविक स्थिति पर चीनी जल वैज्ञानिक उपग्रह और रडार डेटा नेपाल के साथ साझा कर रहे हैं। चीनी इंजीनियरों की टीमें इन झीलों से पानी की सुरक्षित और नियंत्रित निकासी के लिए काम कर रही हैं, ताकि किसी भी अप्रत्याशित विस्फोट से नीचे बसे नेपाली गांवों और भारतीय सीमावर्ती मैदानी इलाकों में दूसरी फ्लैश फ्लड की तबाही को रोका जा सके।

संकट में कूटनीतिक संतुलन: नई दिल्ली और बीजिंग के बीच नेपाल का समन्वय

भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से नेपाल का यह कदम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय सहायता और परियोजनाओं के चयन को लेकर काठमांडू में कूटनीतिक खींचतान देखी जाती रही है, लेकिन इस अभूतपूर्व मानवीय त्रासदी के समय नेपाल ने रणनीतिक संकोच को दरकिनार करते हुए नई दिल्ली और बीजिंग दोनों के साथ संतुलित समन्वय स्थापित किया है।

नेपाली विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि यह समय भू-राजनीतिक समीकरणों को देखने का नहीं, बल्कि लाखों प्रभावित नागरिकों की जान बचाने और बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करने का है। भारत द्वारा दी जा रही मानवीय व लॉजिस्टिकल मदद और चीन द्वारा दी जा रही भारी तकनीकी व मशीनरी सहायता दोनों ही नेपाल के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों के लिए जीवन रेखा साबित हो रही हैं।

ग्राउंड जीरो पर भारी नुकसान: पुनर्वास और पुनर्निर्माण की कठिन चुनौती

विदेशी सहायता पहुंचने के बावजूद नेपाल के सामने खड़ी चुनौतियां बेहद गंभीर हैं। मलबे के नीचे से लगातार निकल रहे शवों और लापता लोगों की तलाश में समय बीतने के साथ उम्मीदें धूमिल होती जा रही हैं। नेपाल के विद्युत प्राधिकरण को अरबों रुपये का नुकसान हुआ है, क्योंकि कई प्रमुख पावर प्रोजेक्ट्स की टरबाइन और जनरेशन यूनिट्स गाद व पत्थरों से भर चुकी हैं।

सड़क नेटवर्क के ठप होने से काठमांडू की थोक मंडियों में आवश्यक सब्जियों, अनाज और पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति पर असर पड़ने लगा है। दूरदराज के पर्वतीय गांवों में संक्रामक रोगों, महामारी और भुखमरी को रोकने के लिए राहत सामग्री का समान वितरण सुनिश्चित करना सरकार की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय और बहुपक्षीय एजेंसियों से अतिरिक्त सहयोग की दरकार

भारत और चीन के त्वरित सहयोग के बाद अब संयुक्त राष्ट्र की राहत एजेंसियां, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और रेड क्रॉस भी नेपाल में स्वास्थ्य शिविरों और अस्थायी शरणस्थलों के निर्माण में सक्रिय हो गए हैं। एशियाई विकास बैंक (ADB) और विश्व बैंक से भी आपातकालीन पुनर्निर्माण पैकेज के लिए प्राथमिक बातचीत शुरू की गई है।

नेपाल सरकार का मानना है कि दोनों बड़े पड़ोसियों से मिला समयबद्ध समर्थन न केवल तात्कालिक जान-माल के नुकसान को थामने में मददगार रहेगा, बल्कि तबाह हो चुके संपर्क मार्गों और बिजली संयंत्रों को जल्द से जल्द दोबारा शुरू करने का हौसला भी देगा।

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