ज्ञानेश कुमार से पहले वाले ने भी ऐसा किया, बाद में मिला बड़ा पद: प्रशांत किशोर ने पूर्व CEC राजीव कुमार का नाम लेकर खोला मोर्चा

देश की राजधानी नई दिल्ली से लेकर बिहार के राजनीतिक गलियारों तक चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर घमासान मचा हुआ है। विपक्षी दलों के ‘इंडिया’ गठबंधन द्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर लगातार किए जा रहे प्रदर्शनों के बीच अब जन सुराज पार्टी के संस्थापक और बांकीपुर से विधायक प्रशांत किशोर ने इस बहस को एक नया और बेहद आक्रामक मोड़ दे दिया है। प्रशांत किशोर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि निर्वाचन आयोग की साख और विश्वसनीयता किसी एक व्यक्ति या किसी एक घटना के चलते संकट में नहीं आई है, बल्कि यह गिरावट पिछले सात से आठ वर्षों से लगातार व्यवस्थागत तरीके से चल रही है। पीके ने दो-टूक कहा कि सिर्फ ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटा देने भर से लोकतंत्र की यह सबसे मजबूत संवैधानिक संस्था पारदर्शी नहीं हो जाएगी, क्योंकि आयोग के भीतर संस्थागत स्तर पर सुधार किए बिना निष्पक्ष चुनाव की कल्पना करना बेमानी है।

राजीव कुमार का नाम लेकर प्रशांत किशोर ने लगाए गंभीर आरोप, रिटायरमेंट के बाद बड़े पद का उठाया मुद्दा

प्रशांत किशोर ने वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधते हुए उनके पूर्ववर्ती मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार का सीधा नाम लिया। पत्रकारों से बातचीत करते हुए पीके ने आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार से पहले जो राजीव कुमार आयोग के शीर्ष पद पर थे, उन्होंने भी चुनाव आयोग की पूरी कार्यप्रणाली को उसी ढर्रे पर चलाया था। पीके ने दावा किया कि राजीव कुमार के कार्यकाल में भी सत्तापक्ष को फायदा पहुंचाने वाले फैसले लिए गए और जैसे ही वह सेवानिवृत्त हुए, उन्हें देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंक, एचडीएफसी का चेयरमैन बना दिया गया। प्रशांत किशोर ने सवाल उठाया कि बिना किसी बैंकिंग विशेषज्ञता और पृष्ठभूमि के किसी पूर्व नौकरशाह को सेवामुक्ति के तुरंत बाद इतना बड़ा कॉरपोरेट पद मिलना सीधे तौर पर ‘क्विड प्रो क्वो’ यानी एक हाथ से उपकार करने और दूसरे हाथ से इनाम पाने का स्पष्ट संकेत देता है। पीके का कहना था कि जब शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों के लिए रिटायरमेंट के बाद ऐसे आकर्षक पदों का रास्ता खुला रहेगा, तब तक स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय लेने की संवैधानिक मर्यादा लगातार कमजोर होती रहेगी।

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और मतदाता सूची में गड़बड़ियों को लेकर विपक्ष का राष्ट्रव्यापी आक्रोश

यह पूरा राजनीतिक विवाद उस समय और अधिक गरमा गया है जब देश भर में निर्वाचन आयोग द्वारा चलाए जा रहे विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) कार्यक्रम को लेकर विपक्ष लगातार सड़कों पर उतर रहा है। दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर राज्यों के जिला मुख्यालयों तक विपक्षी दल आयोग पर यह आरोप लगा रहे हैं कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के नाम पर चुनिंदा वर्गों और विपक्षी समर्थकों के नाम काटे जा रहे हैं। प्रशांत किशोर ने भी इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि मतदाता सूची तैयार करने से लेकर चुनाव की तिथियों के निर्धारण, आदर्श आचार संहिता के क्रियान्वयन और मतगणना की प्रक्रियाओं तक, हर स्तर पर चुनाव आयोग स्पष्ट रूप से केंद्र सरकार और सत्ताधारी दल के पक्ष में झुका हुआ नजर आ रहा है। उन्होंने बिहार के हालिया चुनावी उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि मतदाताओं को लुभाने के लिए नकदी बांटने की घटनाएं हों या प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग, चुनाव आयोग इन सभी गंभीर शिकायतों पर आंखें मूंदे बैठा रहा है। जनता के मन में यह धारणा घर कर चुकी है कि चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष नहीं हो रहे हैं और इसी अविश्वास के चलते आज सड़कों पर व्यापक जनआंदोलन खड़ा हो रहा है।

सिर्फ इस्तीफे से नहीं चलेगा काम: चुनाव प्रणाली में आमूलचूल सुधार के लिए प्रशांत किशोर ने रखे 5 बड़े सुझाव

विपक्ष जहां केवल ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतपत्र (बैलेट पेपर) की वापसी तक अपनी मांगें सीमित रख रहा है, वहीं प्रशांत किशोर ने पूरी चुनाव प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाने के लिए ठोस और संरचनात्मक सुधारों का खाका प्रस्तुत किया है:

  1. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया की स्वतंत्रता: पीके ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति केवल सरकार के विवेक पर नहीं छोड़ी जानी चाहिए, बल्कि इसके लिए मुख्य न्यायाधीश, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री की भागीदारी वाली पारदर्शी चयन समिति की व्यवस्था को पूरी स्वायत्तता के साथ लागू किया जाना चाहिए।

  2. मतदाता सूची निर्माण में पूर्ण पारदर्शिता: वोटर लिस्ट बनाने और नाम जोड़ने या हटाने की पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक निगरानी के अधीन लाया जाए, ताकि किसी भी नागरिक का मताधिकार बिना वैध कारण और पूर्व सूचना के न छीना जा सके।

  3. मतगणना से पहले फॉर्म 17 का सार्वजनिक प्रकाशन: ईवीएम में दर्ज मतों का सटीक ब्योरा रखने वाले ‘फॉर्म 17C’ को मतगणना शुरू होने से पहले अनिवार्य रूप से पब्लिक डोमेन में जारी किया जाए, जिससे किसी भी तरह की हेराफेरी या मतों के अंतर की आशंका खत्म हो सके।

  4. काउंटिंग प्रक्रिया का संपूर्ण डिजिटलीकरण और निगरानी: मतगणना केंद्रों पर राउंड-वार आंकड़ों को तत्काल ऑनलाइन लाइव अपडेट किया जाए, जिससे उम्मीदवारों और आम जनता दोनों को हर राउंड की वास्तविक स्थिति पर पूरा भरोसा रहे।

  5. रिटायरमेंट के बाद पदभार पर सख्त रोक: चुनाव आयोग के शीर्ष अधिकारियों के सेवानिवृत्त होने के बाद किसी भी सरकारी अथवा निजी संस्थान में बड़े कॉर्पोरेट या नियामक पदों पर आसीन होने के लिए अनिवार्य कूलिंग-ऑफ पीरियड या स्थायी प्रतिबंध की व्यवस्था तय हो, ताकि किसी भी अधिकारी के निर्णय हितों के टकराव से प्रभावित न हों।

बिहार विधान परिषद चुनावों की जमीन पर जन सुराज का सियासी दांव और राष्ट्रीय राजनीति पर इसका असर

प्रशांत किशोर का यह कड़ा बयान ऐसे समय में सामने आया है जब बिहार में विधान परिषद की आठ सीटों के लिए चुनावी मुकाबला तेज हो चुका है। जन सुराज पार्टी ने पटना स्नातक और पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों सहित सभी आठ सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारकर मुख्यधारा के दलों के लिए चुनौती खड़ी कर दी है। पीके ने चुनावी जनसभाओं में मतदाताओं को आगाह करते हुए कहा कि विधान परिषद चुनावों में राज्य का सबसे प्रबुद्ध और शिक्षित मतदाता वर्ग वोट करता है, इसलिए उन्हें किसी भी प्रलोभन या नकदी के दबाव में आए बिना लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए मतदान करना चाहिए। उन्होंने दोहराया कि बिहार की राजनीति में बदलाव का आगाज बांकीपुर से शुरू हो चुका है और इस बदलाव को पूरे राज्य में ले जाने की जिम्मेदारी जनता की है। राष्ट्रीय स्तर पर एक तरफ जहां राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और इंडिया गठबंधन के नेता दिल्ली में आयोग के खिलाफ लामबंद हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशांत किशोर द्वारा उठाए गए संस्थागत सवालों ने सत्ता पक्ष और चुनाव आयोग दोनों को रक्षात्मक मुद्रा में लाकर खड़ा कर दिया है।

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