दीदी के हाथ से छूटेगी ‘TMC’? चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी और बागी रितब्रत से असली तृणमूल कांग्रेस पर मांगा जवाब

पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन के बाद अब ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया है। सूबे की सत्ता गंवाने के बाद अब दीदी के हाथ से उनकी खुद की बनाई पार्टी ‘तृणमूल कांग्रेस (TMC)’ भी छिनती नजर आ रही है। चुनाव आयोग (Election Commission) ने गुरुवार को एक बड़ा कदम उठाते हुए ममता बनर्जी और बागी गुट के नेता रितब्रत बनर्जी, दोनों को आधिकारिक पत्र जारी किया है। आयोग ने दोनों पक्षों से पार्टी पर अपने-अपने दावों को लेकर विस्तार से जवाब मांगा है। इसके लिए उन्हें 6 जुलाई की शाम 5:30 बजे तक का समय दिया गया है।

4 मई के चुनावी नतीजों के बाद शुरू हुआ टीएमसी का बिखराव

गौरतलब है कि 4 मई को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने से पहले तक पूरी तृणमूल कांग्रेस चट्टान की तरह ममता बनर्जी के पीछे खड़ी थी। लेकिन चुनाव में मिली करारी हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष का ज्वालामुखी फूट पड़ा। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली पर निशाना साधा। इसी बगावत के बीच पहली बार विधायक बने रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व में विधायकों का एक बड़ा धड़ा अलग हो गया। देखते ही देखते कई सांसदों ने भी ममता का साथ छोड़ दिया और अब स्थिति यह है कि ममता बनर्जी अपनी ही पार्टी में अलग-थलग पड़ गई हैं।

बागियों का बड़ा दावा: 80 में से 65 विधायकों का मिला समर्थन

रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने पार्टी पर अपना दावा बेहद मजबूत कर लिया है। उनका दावा है कि टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 65 विधायक उनके साथ हैं। वर्तमान में रितब्रत बनर्जी ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) की कुर्सी संभाल रहे हैं। ऐसे में बहुमत के आंकड़ों के लिहाज से उनका पलड़ा भारी नजर आ रहा है।

बागी गुट जहां खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताते हुए पार्टी के नाम, चुनाव चिन्ह (सिंबल) और बैंक खातों पर अधिकार मांग रहा है, वहीं ममता बनर्जी के वफादारों का तर्क है कि पार्टी का जमीनी और सांगठनिक ढांचा आज भी पूरी तरह दीदी के साथ है।

क्या महाराष्ट्र की तरह शरद पवार और उद्धव ठाकरे जैसा होगा ममता का हाल?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी भले ही कानूनी लड़ाई लड़ रही हों, लेकिन विधायकों के भारी बहुमत के कारण बाजी उनके हाथ से निकलती दिख रही है। यह पूरा घटनाक्रम देश कुछ समय पहले महाराष्ट्र की राजनीति में देख चुका है:

  • शरद पवार का उदाहरण: शरद पवार ने कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) बनाई थी, लेकिन जब उनके भतीजे अजित पवार ने बगावत की, तो विधायकों के बहुमत के आधार पर चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और सिंबल अजित गुट को सौंप दिया था।

  • उद्धव ठाकरे का उदाहरण: बालासाहेब ठाकरे द्वारा स्थापित शिवसेना पर उनके बेटे उद्धव ठाकरे का नियंत्रण था, लेकिन एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद असली शिवसेना और ‘तीर-कमान’ का सिंबल शिंदे गुट के पास चला गया।

ममता बनर्जी ने भी साल 1998 में कांग्रेस से अलग होकर पाई-पाई जोड़कर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। लेकिन अब लोकतांत्रिक नियमों के तहत यदि रितब्रत गुट अपने 65 विधायकों का बहुमत साबित कर देता है, तो ममता बनर्जी भी शरद पवार और उद्धव ठाकरे की तरह अपनी ही बनाई पार्टी में महज एक गुट की नेता बनकर रह जाएंगी।

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