अभिषेक बनर्जी को देखते ही जब गूंजने लगा ‘चोर-चोर’ का शोर… तभी तय हो गई थी दीदी की विदाई

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में 4 मई का दिन एक ऐसे भूचाल का गवाह बना, जिसने 15 साल पुराने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अभेद्य दुर्ग को ताश के पत्तों की तरह ढहा दिया। मतगणना के दिन भवानीपुर के सखावत मेमोरियल गर्ल्स स्कूल के बाहर जो नज़ारा दिखा, वह ममता बनर्जी की सत्ता के अंत का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया। जब ममता के उत्तराधिकारी और टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी वहां पहुंचे, तो भीड़ ने उन्हें देखते ही ‘चोर-चोर’ के नारों से घेर लिया। यह केवल नारेबाजी नहीं थी, बल्कि सत्ता विरोधी उस आक्रोश का विस्फोट था जो बंगाल की गलियों में लंबे समय से सुलग रहा था।

ममता का अपना ‘भवानीपुर’ भी नहीं रहा साथ, 15 हजार वोटों से मिली हार

बंगाल की राजनीति में यह पहली बार हुआ है कि कोई मुख्यमंत्री अपने ही सबसे सुरक्षित माने जाने वाले निर्वाचन क्षेत्र में हार गया। ममता बनर्जी को भवानीपुर सीट पर भाजपा उम्मीदवार ने 15,105 वोटों के अंतर से करारी शिकस्त दी। दोपहर होते-होते साफ हो गया कि बंगाल ‘भगवा’ रंग में रंग चुका है। जिस तरह 2011 में ममता बनर्जी ने वामपंथ के 34 साल के शासन को उखाड़ा था, ठीक वैसा ही राजनीतिक उलटफेर 2026 में भाजपा ने कर दिखाया है।

7% वोट बैंक खिसका, टीएमसी के हाथ से निकली बाजी

आंकड़ों पर नजर डालें तो टीएमसी के लिए यह हार किसी गहरे जख्म से कम नहीं है।

  • वोट शेयर में गिरावट: 2021 में टीएमसी का वोट शेयर 48% था, जो अब गिरकर 40.8% रह गया है।

  • भाजपा की बड़ी सेंधमारी: दूसरे चरण की 142 सीटों पर, जहां 2021 में भाजपा केवल 18 सीटों पर थी, वहां इस बार पार्टी ने 66 सीटों पर कब्जा जमाया।

  • ऐतिहासिक जीत: आजादी के बाद यह पहला मौका है जब बंगाल में भाजपा की सरकार बनने जा रही है।

भ्रष्टाचार और ‘आरजी कर कांड’ ने बिगाड़ा दीदी का खेल

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस हार की पटकथा काफी पहले लिखी जा चुकी थी। आरजी कर अस्पताल में डॉक्टर के साथ हुई दरिंदगी ने मध्यम वर्ग और महिलाओं को ममता सरकार से पूरी तरह विमुख कर दिया। पूर्व अर्थशास्त्री अभिरूप सरकार के अनुसार, राज्य में बढ़ता भ्रष्टाचार, जबरन वसूली (सिंडिकेट राज) और कानून-व्यवस्था की बदहाली ने उद्योगों को चौपट कर दिया, जिससे युवाओं में भारी नाराजगी थी।

मुस्लिम वोटों में फूट और हिंदू ध्रुवीकरण का ‘डबल धमाका’

टीएमसी की हार का एक बड़ा कारण मुस्लिम वोट बैंक का बिखरना भी रहा। आईएसएफ (ISF) और एजेयूपी (AJUP) जैसे दलों ने अल्पसंख्यक वोटों में सेंध लगाई, जिससे टीएमसी का ‘एकतरफा’ गणित बिगड़ गया। दूसरी ओर, सरकार की कथित तुष्टीकरण की राजनीति ने हिंदू वोटों का जोरदार ध्रुवीकरण किया, जिसे भाजपा ने अपने पक्ष में मजबूती से मोड़ा।

नए युग की शुरुआत: कौन बनेगा बंगाल का नया चेहरा?

भाजपा के नारे ‘पलटानो दरकार, चाई भाजपा सरकार’ (बदलाव जरूरी है, भाजपा सरकार चाहिए) ने बंगाल की जनता के दिल में जगह बना ली। अब राज्य में एक नए युग की शुरुआत हो रही है। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शुभेंदु अधिकारी का नाम सबसे आगे चर्चा में है, जिन्होंने इस पूरी लड़ाई में भाजपा का नेतृत्व किया।

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