अक्सर मन में यह सवाल उठता है कि दुनिया में कोई बहुत सुखी है तो कोई दुखी, क्या ईश्वर किसी से ज्यादा प्रेम करते हैं और किसी से कम? अगर आप भी जीवन की इस उलझन में फंसे हैं, तो श्रीमद्भागवत गीता का एक श्लोक आपके सारे भ्रम दूर कर सकता है। जीवन के कठिन दौर में अक्सर लोग भगवान की निष्पक्षता पर सवाल उठाने लगते हैं, लेकिन गीता का ज्ञान हमें वास्तविकता से रूबरू कराता है। गीता के नौवें अध्याय का 29वां श्लोक स्पष्ट करता है कि ईश्वर की दृष्टि में न कोई प्रिय है और न ही कोई द्वेष का पात्र।
‘समोऽहं सर्वभूतेषु’ का गहरा अर्थ और ईश्वर की समानता
भगवान कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं, ‘समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।’ इसका अर्थ है कि मैं सभी प्राणियों में समान रूप से व्यापक हूं। मेरे लिए कोई प्रिय नहीं है और न ही कोई द्वेष का पात्र है। बहुत से लोग यह गलतफहमी पाल लेते हैं कि जो उनकी पूजा-अर्चना करता है, भगवान उसे ज्यादा प्यार करते हैं और जो नहीं करता, उसे कम। हकीकत यह है कि ईश्वर के लिए न चींटी छोटी है और न हाथी बड़ा। वे जन्म, कर्म, परिस्थिति या किसी भी संयोग-वियोग से परे होकर हर जीव में एक समान रीति से स्थित हैं।
कर्म ही तय करते हैं आपकी सुख-दुख की यात्रा
ईश्वर का साफ संदेश है कि अच्छा या बुरा होने के पीछे व्यक्ति के अपने कर्म जिम्मेदार हैं, ईश्वर नहीं। यदि आप अच्छे कर्म करते हैं, तो आपको उसका शुभ फल मिलेगा, और यदि आप अन्याय या अत्याचार जैसे अशुभ कार्य करते हैं, तो आपको नीची योनियों या कष्टों का सामना करना पड़ेगा। इसमें भगवान का कोई राग या द्वेष नहीं है। वे न तो किसी को बेवजह दंड देते हैं और न ही बिना कारण किसी पर कृपा बरसाते हैं। आपके द्वारा किया गया प्रत्येक कर्म एक बीज की तरह है, जिसका फल आपको भोगना ही होगा। भगवान का कार्य केवल साक्षी भाव से स्थित रहना है, जबकि फल देने की व्यवस्था प्रकृति के नियमों पर आधारित है।
पूजा-पाठ व्यर्थ है अगर आचरण में सुधार नहीं
अक्सर लोग मंदिर जाकर लंबी प्रार्थनाएं करते हैं, लेकिन दैनिक जीवन में उनके कर्म दूषित होते हैं। गीता का सार यह है कि यदि आपके कर्म खराब हैं, तो आपकी दिखावटी पूजा-पाठ पूरी तरह व्यर्थ है। भगवान तो सदा समान ही रहते हैं, बंधन और मुक्ति तो जीव के अपने हाथों में है। संसार के राग-द्वेष में लिप्त मनुष्य ही बंधनों में फंसता है और जो व्यक्ति निस्वार्थ भाव से कर्म करता है, वही इन बंधनों से मुक्त हो पाता है। तात्पर्य यह है कि सांसारिक मोह को त्यागकर जब आप ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा रखते हैं, तभी आपका कल्याण संभव है। इसलिए, ईश्वर को दोष देने के बजाय अपने कर्मों की शुद्धि पर ध्यान देना ही जीवन को सही दिशा देने का एकमात्र मार्ग है।
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