काठमांडू: नेपाल की राजनीति में एक समय ‘उम्मीद की किरण’ बनकर उभरे बालेन शाह अब सवालों के घेरे में हैं। जिस जेनरेशन जेड (Gen-Z) ने उन्हें पारंपरिक राजनेताओं के विकल्प के रूप में सिर आंखों पर बिठाया था, वही युवा अब सोशल मीडिया पर अपनी निराशा जाहिर कर रहा है। सत्ता संभाले हुए महज दो महीने ही बीते हैं और बालेन सरकार विवादों के ऐसे चक्रव्यूह में फंस गई है जिससे निकलना उनके लिए बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।
विधायी गतिरोध और अध्यादेशों की ‘शॉर्टकट’ राजनीति
बालेन शाह की पार्टी, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के पास निचले सदन में तो प्रचंड बहुमत है, लेकिन नेशनल असेंबली (ऊपरी सदन) में एक भी सदस्य न होना उनके लिए गले की फांस बन गया है। इस विधायी बाधा को पार करने के लिए सरकार ने एक ऐसा रास्ता चुना जिसे ‘लोकतंत्र का अपमान’ कहा जा रहा है। 30 अप्रैल को होने वाले संसद सत्र को टालकर महज 12 दिनों के भीतर सरकार ने ताबड़तोड़ आठ अध्यादेश पारित कर दिए। आलोचकों का मानना है कि जो बालेन शाह व्यवस्था सुधारने आए थे, वे खुद शॉर्टकट राजनीति के शिकार हो गए हैं।
न्यायपालिका से टकराव: प्रधानमंत्री को ‘वीटो पावर’ पर बढ़ा विवाद
सबसे ज्यादा बवाल संवैधानिक परिषद से जुड़े अध्यादेश पर मचा है। नए नियमों के अनुसार, अब न्यायाधीशों की नियुक्ति में प्रधानमंत्री के पास ‘वीटो पावर’ होगी। यानी अगर परिषद में राय बराबर हुई, तो पीएम का फैसला ही अंतिम होगा। राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने भी इस पर आपत्ति जताई थी, लेकिन सरकार के अड़ियल रुख के आगे उन्हें झुकना पड़ा। इस फैसले के तुरंत बाद डॉ. मनोज शर्मा को मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की गई, जिससे तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की वरिष्ठता को दरकिनार कर दिया गया। नेपाल की पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने इसे देश की महिलाओं का अपमान करार दिया है।
सुप्रीम कोर्ट से लगा करारा झटका
बालेन सरकार ने प्रशासन की सफाई के नाम पर एक झटके में 1,600 नियुक्तियां रद्द कर दी थीं। इतना ही नहीं, विश्वविद्यालयों में छात्र और कर्मचारी यूनियनों पर भी प्रतिबंध लगाने की कोशिश की गई। लेकिन न्यायपालिका ने सरकार के इन फैसलों पर रोक लगा दी है। इससे पहले सुकुम्बासी (भूमिहीन निवासियों) को बिना किसी पुनर्वास योजना के हटाने के बालेन के फैसले पर भी कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया था, जिसे उनकी सरकार के लिए एक बड़े ‘लीगल सेटबैक’ के तौर पर देखा जा रहा है।
संसदीय मर्यादा और ‘कैनवास शूज’ का विवाद
बालेन शाह के व्यवहार ने भी विपक्ष को हमलावर होने का मौका दे दिया है। संसद के पहले ही दिन वह सफेद कैनवास जूते पहनकर पहुंचे, जिसे सदन की गरिमा के खिलाफ माना गया। इसके अलावा, राष्ट्रपति के भाषण के दौरान उनका अचानक सदन से बाहर चले जाना और बिना सूचना के गायब रहना उनकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। संसद में उनके इस रवैये के कारण सदन की कार्यवाही तक स्थगित करनी पड़ी है।
विदेशी निवेश और डगमगाते कूटनीतिक संबंध
सिर्फ घरेलू मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि विदेशी संबंधों में भी बालेन शाह अनुभवहीन नजर आ रहे हैं। एक तरफ उन्होंने शीर्ष उद्योगपतियों को हिरासत में लेकर निवेशकों को डरा दिया है, जिसके लिए वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले को अब ‘डैमेज कंट्रोल’ करना पड़ रहा है। दूसरी ओर, भारत और चीन ने लिपुलेख के रास्ते कैलाश मानसरोवर सड़क खोलने का फैसला लेकर काठमांडू को चौंका दिया। बालेन शाह की ‘विदेशी दौरा न करने’ की जिद और सख्त कूटनीतिक रुख के कारण भारत के विदेश सचिव का नेपाल दौरा भी स्थगित हो चुका है।
क्या बालेन शाह अपने गिरते ग्राफ को संभाल पाएंगे या Gen Z का यह सपना समय से पहले ही टूट जाएगा? यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
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