
सनातन धर्म और वैदिक ज्योतिष में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला नाग पंचमी का पर्व अत्यंत फलदायी और आध्यात्मिक माना जाता है। इस दिन नाग देवता के बारह प्रमुख स्वरूपों की पूजा-अर्चना के साथ भगवान शिव का अभिषेक करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। हालांकि, इस बार नाग पंचमी का दिन खगोलीय और ज्योतिषीय गणनाओं के लिहाज से अत्यधिक संवेदनशील और विशेष बन गया है।
इस पावन तिथि पर आकाशमंडल में मन के कारक चंद्रमा और कर्मफलदाता शनि देव की युति से ‘विष योग’ (Vish Yog) का निर्माण हो रहा है। ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा और शनि का यह संयोग मानसिक तनाव, अज्ञात भय और कार्यों में अप्रत्याशित बाधाएं उत्पन्न करने वाला माना जाता है। इसके साथ ही, जिन जातकों की जन्म कुंडली में ‘कालसर्प दोष’ (Kalsarp Dosh) मौजूद है, उनके लिए यह दिन एक दुर्लभ अवसर की तरह आया है। जब नाग पंचमी, विष योग और भगवान शिव की कृपा एक साथ मिलती है, तो यह समय बड़े से बड़े ग्रह दोषों को शांत करने का सबसे सिद्ध काल बन जाता है।
चंद्रमा-शनि की युति से बना ‘विष योग’: जानिए जीवन पर क्या होता है इसका असर
वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को जल तत्व, मन, भावना और माता का प्रतीक माना गया है, जबकि शनि देव को वायु तत्व, वैराग्य, विलंब, अनुशासन और अंधकार का प्रतिनिधि माना जाता है। जब इन दोनों परस्पर विरोधी स्वभाव वाले ग्रहों की युति एक ही भाव या नक्षत्र में होती है, तो उसे ‘विष योग’ कहा जाता है:
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मानसिक तनाव और अशांति: चंद्रमा मन का कारक होने के कारण शनि के संपर्क में आते ही पीड़ित हो जाता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति को अकारण चिंता, घबराहट, अवसाद (Depression) और अनिद्रा की समस्या हो सकती है।
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निर्णय लेने में असमंजस: जातक की निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है। बने-बनाए काम अंतिम समय में रुक जाते हैं और आत्मविश्वास में कमी महसूस होती है।
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पारिवारिक और कार्यक्षेत्र में तनाव: विष योग के प्रभाव से माता के स्वास्थ्य में गिरावट, पारिवारिक कलह और कार्यक्षेत्र में बिना किसी गलती के सहकर्मियों या उच्चाधिकारियों से मतभेद की स्थिति बनती है।
कालसर्प दोष का रहस्य: जीवन में कब और कैसे खड़ी करता है रुकावटें?
कुंडली में जब सभी सातों मुख्य ग्रह (सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि) पापी ग्रह राहु और केतु के मध्य आ जाते हैं, तो ‘कालसर्प दोष’ का निर्माण होता है। ज्योतिष शास्त्र में कुल 12 प्रकार के कालसर्प दोषों (जैसे अनंत, कुलिक, वासुकि, शंखपाल, पद्म, महापद्म, तक्षक, कर्कोटक, शंखचूड़, घातक, विषधर और शेषनाग कालसर्प दोष) का वर्णन मिलता है:
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करियर और व्यापार में ठहराव: जातक कठिन परिश्रम करता है, लेकिन उसका उचित प्रतिफल या श्रेय किसी और को मिल जाता है।
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संतान और दांपत्य जीवन में विलंब: कालसर्प दोष के कारण विवाह में अड़चनें, वैवाहिक जीवन में निरंतर क्लेश या संतान प्राप्ति में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
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सपनों में सांपों का दिखना: इस दोष से पीड़ित व्यक्ति को अक्सर रात में डरावने सपने, पानी में डूबने के दृश्य या बार-बार सांप दिखाई देते हैं।
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स्वास्थ्य और आर्थिक नुकसान: अचानक बड़ी बीमारी, असाध्य रोग या बिना किसी ठोस कारण के धन की भारी हानि होना भी कालसर्प दोष का प्रमुख लक्षण है।
नाग पंचमी पर क्यों मिलता है कालसर्प दोष और विष योग से तुरंत छुटकारा?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नाग देव भगवान शिव के कंठ का हार हैं और भगवान विष्णु की शैय्या (शेषनाग) हैं। नाग पंचमी का दिन पूरी तरह से सर्प शक्तियों, नाग कुल और महादेव की आराधना को समर्पित होता है।
राहु का मुख सर्प के समान है और केतु सर्प की पूंछ माना गया है। इसलिए, जब नाग पंचमी के पावन दिन नाग देवताओं और भगवान आशुतोष का पूजन किया जाता है, तो राहु-केतु का क्रूर प्रभाव तुरंत शांत हो जाता है। साथ ही, चूंकि भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले हलाहल (विष) को अपने कंठ में धारण किया था, इसलिए शनि और चंद्रमा के ‘विष योग’ के दुष्प्रभावों को नष्ट करने के लिए भी भगवान शिव की शरण में जाना ही एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ समाधान है।
नाग पंचमी पर दोष मुक्ति के 5 अचूक और सिद्ध शास्त्रीय उपाय
यदि आपकी कुंडली में कालसर्प दोष या चंद्रमा-शनि का विष योग है, तो नाग पंचमी के दिन श्रद्धापूर्वक नीचे दिए गए उपाय अवश्य करें:
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महामृत्युंजय मंत्र से रुद्राभिषेक: नाग पंचमी के शुभ मुहूर्त में किसी प्राचीन शिवालय में जाकर शिवलिंग पर दूध, गंगाजल, काले तिल और शहद से रुद्राभिषेक करें। अभिषेक करते समय ‘ॐ नमः शिवाय’ अथवा ‘ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥’ का कम से कम 108 बार जाप करें।
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चांदी के नाग-नागिन के जोड़े का विसर्जन: चांदी या तांबे से बने नाग-नागिन के जोड़े की विधि-विधान से पूजा करें, उन पर चंदन व अक्षत लगाएं और फिर उन्हें बहते हुए पवित्र जल या नदी में प्रवाहित कर दें। यह उपाय कालसर्प दोष के भारी बंधनों को काटता है।
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शनि और चंद्रमा का संतुलन (छाया दान व कच्चा दूध): विष योग की शांति के लिए कांसे की कटोरी में सरसों का तेल भरकर उसमें अपना चेहरा देखें और उसे तेल का दान लेने वाले को दे दें (छाया दान)। साथ ही, शिवलिंग पर गाय का कच्चा दूध और अक्षत अर्पित करें ताकि चंद्रमा को बल मिले।
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पीपल के वृक्ष की परिक्रमा और दीपदान: नाग पंचमी की शाम को पीपल के वृक्ष की जड़ में मीठा जल और दूध अर्पित करें, सरसों के तेल का चौमुखा दीपक जलाएं और सात बार परिक्रमा करें। पीपल में त्रिदेवों और नागों का वास माना जाता है।
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सर्प गायत्री एवं नवनाग स्तोत्र का पाठ: इस दिन ‘ॐ नवकुलाय विद्यमहे विषदंताय धीमहि तन्नो सर्पः प्रचोदयात्’ अथवा नवनाग स्तोत्र (अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्…) का पाठ करने से घर में सर्प भय समाप्त होता है और आर्थिक उन्नति के द्वार खुलते हैं।
प्रमुख तीर्थों पर विशेष पूजन: उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर और काशी का महत्व
भारत के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों और धार्मिक केंद्रों में नाग पंचमी के दिन किए जाने वाले अनुष्ठानों का विशेष फल मिलता है:
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उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर (मध्य प्रदेश): श्री महाकालेश्वर मंदिर परिसर में स्थित भगवान नागचंद्रेश्वर का मंदिर पूरे वर्ष में केवल एक बार नाग पंचमी के दिन ही 24 घंटे के लिए भक्तों के दर्शन हेतु खुलता है। मान्यता है कि यहां केवल दर्शन मात्र से जन्म-जन्मांतर के सर्प दोष और विष योग समाप्त हो जाते हैं।
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त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग (नासिक, महाराष्ट्र): गोदावरी नदी के तट पर स्थित त्र्यंबकेश्वर धाम कालसर्प दोष शांति और नारायण नागबलि पूजा के लिए विश्व प्रसिद्ध है। नाग पंचमी के दिन यहां वैदिक ब्राह्मणों द्वारा कराई गई पूजा से जीवन के सभी अवरोध तुरंत समाप्त होते हैं।
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काशी और प्रयागराज (उत्तर प्रदेश): काशी के नागकुआं तीर्थ पर स्नान व पूजन और प्रयागराज में संगम तट पर तर्पण व सर्प शांति अनुष्ठान करने से पितृ दोष और राहु-केतु जनित कष्टों से पूर्ण मुक्ति मिलती है।
नाग पंचमी के दिन क्या करें और किन गलतियों से बचें?
शास्त्रों में नाग पंचमी के दिन कुछ कार्यों को पूर्णतः वर्जित बताया गया है ताकि किसी भी अनिष्ट से बचा जा सके:
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जमीन की खुदाई न करें: इस दिन खेत जोतना, नींव खोदना या मिट्टी की खुदाई करना सख्त मना है, क्योंकि इससे जमीन के अंदर रहने वाले जीवों और सर्पों को क्षति पहुंच सकती है।
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लोहे के तवे और नुकीली चीजों का उपयोग: कई प्राचीन मान्यताओं के अनुसार इस दिन लोहे के तवे पर रोटी नहीं बनाई जाती और सुई-धागे या कैंची जैसी नुकीली वस्तुओं का प्रयोग वर्जित रहता है।
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जीवित सांपों को दूध न पिलाएं: जीवित सांपों को जबरन दूध पिलाने से उनके फेफड़ों को नुकसान पहुंचता है। इसके बजाय सर्प प्रतिमा या शिवलिंग पर दूध अर्पित करना चाहिए और पशु-पक्षियों की सेवा करनी चाहिए।
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