
चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला शोध सामने आया है, जो 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों और हृदय रोगियों के लिए नई उम्मीद लेकर आया है। दुनिया भर में तंत्रिका तंत्र से जुड़े दर्दनाक चर्म रोग ‘शिंगल्स’ (हर्पीस जोस्टर) से बचाव के लिए लगाई जाने वाली वैक्सीन अब केवल त्वचा और नसों के संक्रमण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह दिल के दौरे (हार्ट अटैक) और ब्रेन स्ट्रोक जैसी घातक कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों के खतरे को भी उल्लेखनीय रूप से घटा सकती है।
वैश्विक स्तर पर लाखों वयस्कों पर किए गए दीर्घकालिक अध्ययनों के विश्लेषण के बाद अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जनरल्स में प्रकाशित इस शोध ने प्रिवेंटिव हेल्थकेयर (निवारक स्वास्थ्य देखभाल) की दिशा बदल दी है। शोधकर्ताओं का दावा है कि शिंगल्स का टीका शरीर में सूजन (सिस्टमिक इन्फ्लेमेशन) को नियंत्रित कर रक्त वाहिकाओं (ब्लड वेसल्स) को सुरक्षित रखता है, जिससे धमनियों में ब्लॉकेज और ब्लड क्लॉट (खून के थक्के) बनने की आशंका काफी कम हो जाती है।
अध्ययन का बड़ा खुलासा: शिंगल्स वैक्सीन कैसे घटाती है दिल के दौरे और स्ट्रोक का जोखिम?
हृदय रोग विशेषज्ञों और संक्रामक रोग वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस व्यापक शोध में पाया गया कि जिन वयस्कों ने शिंगल्स का टीका (विशेष रूप से आधुनिक रीकॉम्बिनेंट जोस्टर वैक्सीन) लगवाया था, उनमें टीका न लगवाने वाले लोगों की तुलना में स्ट्रोक का जोखिम 15 से 20 प्रतिशत तक कम दर्ज किया गया। इसके साथ ही एक्यूट मायोकार्डियल इन्फ्रार्कशन (हार्ट अटैक) और कोरोनरी आर्टरी डिजीज के मामलों में भी स्पष्ट गिरावट देखी गई।
वैज्ञानिकों के अनुसार जब किसी व्यक्ति को शिंगल्स का संक्रमण होता है, तो उसका असर केवल त्वचा पर लाल चकत्तों या फफोले के रूप में ही नहीं रहता, बल्कि यह वायरस रक्त धमनियों की आंतरिक परत (एंडोथीलियम) में गंभीर सूजन पैदा कर देता है। वैक्सीन लगवाने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता सक्रिय रहती है और वायरस को रक्त वाहिकाओं पर हमला करने का अवसर नहीं मिलता, जिससे संवहनी दुर्घटनाओं (Vascular Events) से स्वतः ही बचाव हो जाता है।
शिंगल्स (हर्पीस जोस्टर) और कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों का खतरनाक जैविक कनेक्शन
शिंगल्स वास्तव में ‘वेरिसेला-जोस्टर वायरस’ (Varicella-Zoster Virus) के कारण होता है। यह वही वायरस है जो बचपन में चिकनपॉक्स (छोटी माता) का कारण बनता है। चिकनपॉक्स ठीक होने के बाद भी यह वायरस शरीर के नर्वस सिस्टम (मेरुदंड की तंत्रिका कोशिकाओं) में निष्क्रिय होकर दशकों तक सुप्त अवस्था में पड़ा रहता है।
बढ़ती उम्र, कमजोर इम्यूनिटी, गंभीर तनाव या अन्य पुरानी बीमारियों के कारण जब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटती है, तो यह वायरस दोबारा सक्रिय हो जाता है और नसों के रास्ते त्वचा तक पहुंचकर असहनीय दर्द और फफोले पैदा करता है।
सक्रिय होने के दौरान यह वायरस रक्त वाहिकाओं की दीवारों में सूजन और प्लेटलेट्स का जमाव बढ़ा देता है। इसके प्रभाव से धमनियों में रक्त का थक्का जमने (थ्रॉम्बोसिस) की संभावना बढ़ जाती है। यदि यह थक्का मस्तिष्क की ओर जाने वाली रक्त नली में फंसता है तो ब्रेन स्ट्रोक का कारण बनता है और यदि हृदय की कोरोनरी धमनी में अवरोध उत्पन्न करता है तो अचानक दिल का दौरा पड़ जाता है। वैक्सीन इस पूरे जैविक चक्र को शुरुआत में ही रोक देती है।
किन्हें लगवानी चाहिए शिंगल्स वैक्सीन? उम्र, डोज और चिकित्सकीय गाइडलाइंस
स्वास्थ्य विशेषज्ञों और वैश्विक स्वास्थ्य संगठनों की सिफारिशों के अनुसार शिंगल्स वैक्सीन को प्रौढ़ और वरिष्ठ नागरिकों के टीकाकरण कार्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा माना जा रहा है:
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50 वर्ष और उससे अधिक आयु के वयस्क: 50 की उम्र पार करने के बाद शरीर की टी-सेल इम्यूनिटी स्वाभाविक रूप से कमजोर होने लगती है, जिससे वायरस के दोबारा सक्रिय होने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए 50+ आयु वर्ग के सभी लोगों को यह टीका लगवाने की सलाह दी जाती है।
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कमजोर इम्यूनिटी वाले लोग: 19 वर्ष या उससे अधिक उम्र के वे वयस्क जिनका इम्यून सिस्टम कीमोथेरेपी, अंग प्रत्यारोपण, ऑटोइम्यून बीमारियों या स्टेरॉयड दवाओं के कारण कमजोर हो चुका है, वे भी डॉक्टर के परामर्श से इसे लगवा सकते हैं।
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दो खुराकों का शेड्यूल: वर्तमान में उपलब्ध रीकॉम्बिनेंट शिंगल्स वैक्सीन की दो खुराकें 2 से 6 महीने के अंतराल पर मांसपेशियों में (इंट्रामस्कुलर) दी जाती हैं। यह टीका 90 प्रतिशत से अधिक प्रभावशीलता के साथ लंबे समय तक सुरक्षा प्रदान करता है।
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पहले शिंगल्स हो चुका हो तो भी जरूरी: यदि किसी व्यक्ति को अतीत में चिकनपॉक्स या शिंगल्स हो चुका है, तब भी यह वैक्सीन लगवाना आवश्यक है क्योंकि यह संक्रमण दोबारा होने की आशंका को समाप्त करता है।
केवल चकत्ते ही नहीं, शिंगल्स के इन शुरुआती लक्षणों को कभी न करें नजरअंदाज
शिंगल्स का संक्रमण अचानक गंभीर रूप ले सकता है, इसलिए इसके शुरुआती संकेतों को पहचानना अत्यंत जरूरी है:
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शरीर के एक तरफ जलन व सुई चुभने जैसा दर्द: त्वचा पर चकत्ते दिखने से 2 से 4 दिन पहले शरीर के किसी एक हिस्से (पीठ, छाती, पेट या चेहरे) पर तेज जलन, संवेदनशीलता या तेज दर्द महसूस होना।
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लाल दाने और पानी भरे फफोले: दर्द वाले क्षेत्र में लाल रंग के छोटे-छोटे दाने उभरना जो बाद में पानी से भरे फफोलों में बदल जाते हैं।
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हल्का बुखार और सिरदर्द: संक्रमण के साथ शरीर में कमजोरी, थकान, हल्का बुखार और मांसपेशियों में खिंचाव महसूस होना।
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पोस्टहरपेटिक न्यूराल्जिया (PHN): चकत्ते सूखने के कई महीनों या सालों बाद भी उस हिस्से की नसों में असहनीय और झुलसाने वाला दर्द बना रहना, जो शिंगल्स का सबसे आम और गंभीर दुष्प्रभाव है।
हृदय रोग विशेषज्ञों की राय: प्रिवेंटिव हेल्थकेयर का नया और शक्तिशाली हथियार
कार्डियोलॉजिस्ट्स और संक्रामक रोग विशेषज्ञों का मानना है कि जीवनशैली में बदलाव, संतुलित आहार और व्यायाम के साथ-साथ सही समय पर टीकाकरण भी हृदय स्वास्थ्य की सुरक्षा में गेम-चेंजर साबित हो सकता है। जिस प्रकार इन्फ्लूएंजा (फ्लू) और न्यूमोकोकल टीकों को बुजुर्गों में फेफड़ों और दिल की सुरक्षा के लिए अनुशंसित किया जाता है, उसी प्रकार शिंगल्स वैक्सीन को भी हृदय और मस्तिष्क के संवहनी स्वास्थ्य के लिए एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच के रूप में देखा जाना चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना है कि जो मरीज पहले से ही उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन), डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल या पूर्व हृदय रोग से जूझ रहे हैं, उन्हें अपने चिकित्सक से परामर्श लेकर शिंगल्स टीकाकरण को अपनी स्वास्थ्य प्राथमिकताओं में अवश्य शामिल करना चाहिए।
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