
भगवान शिव की नगरी काशी केवल मोक्ष की भूमि ही नहीं, बल्कि गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों और अनादि पौराणिक मान्यताओं का भी सबसे बड़ा केंद्र है। तीन लोकों से न्यारी मानी जाने वाली अवधूत नगरी वाराणसी में जहाँ एक ओर आकाश छूते देवालय हैं, वहीं दूसरी ओर धरती के भीतर पाताल लोक और नागलोक से जुड़े कई अनसुलझे रहस्य समाए हुए हैं। काशी के जैतपुरा क्षेत्र में स्थित ‘नागकूप’ (नाग कुआँ) एक ऐसा ही दिव्य और रहस्यमयी स्थान है, जिसके बारे में पौराणिक शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि यह कुआँ सीधा नागलोक और पाताल लोक के लिए मार्ग प्रदान करता है। सनातन परंपरा के अनुसार पृथ्वी पर स्थित तीन ऐसे स्थान हैं जो नागलोक से सीधे जुड़े हुए हैं— उज्जैन का नागचंद्रेश्वर, प्रयागराज का तक्षक तीर्थ और काशी का यह पातालगामी नागकूप। सावन मास और विशेषकर नागपंचमी के अवसर पर यहाँ देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु नागराज और महादेव की उपासना करने पहुँचते हैं।
नागकूप का ऐतिहासिक महत्व और महर्षि पतंजलि का अद्भुत व्याख्यान
जैतपुरा स्थित इस प्राचीन नागकूप की बनावट अपने आप में स्थापत्य कला और जल प्रबंधन का एक ऐसा अजूबा है जिसे देखकर आधुनिक इंजीनियर भी आश्चर्यचकित रह जाते हैं। यह कुआँ साधारण कूप की भाँति गोल न होकर चौकोर रूप में धरातल से कई फीट गहराई तक बना हुआ है, जहाँ तक पहुँचने के लिए पत्थरों की सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार महर्षि पतंजलि, जो स्वयं नागराज शेषनाग के अवतार माने जाते हैं, उन्होंने इसी नागकूप के भीतर बैठकर पाणिनी के व्याकरण पर अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘महाभाष्य’ की रचना की थी। ऐसा कहा जाता है कि गुरु पतंजलि ने अपने शिष्यों को यह निर्देश दिया था कि व्याख्यान के दौरान कोई भी पर्दा हटाकर भीतर न देखे। नागकूप की अगाध गहराई और इसके भीतर बहने वाली शीतल जलधारा को पाताल लोक का सीधा संबंध माना जाता है। इस कूप के भीतर आज भी ऐसी कई अनदेखी सुरंगें और गुप्त मार्ग बताए जाते हैं जो पाताल की ओर जाते हैं।
वासुकीश्वर महादेव: नागराज वासुकी की कठोर तपस्या और महादेव की अनुकंपा
नागकूप के ठीक समीप स्थित ‘वासुकीश्वर महादेव’ मंदिर काशी का वह पहला प्रमुख मंदिर है जिसका सीधा संबंध नाग साम्राज्य से है। पौराणिक काल में जब समुद्र मंथन हुआ था, तब नागराज वासुकी को मंदराचल पर्वत की नेती (रस्सी) बनाया गया था। मंथन के दौरान निकले हलाहल विष की ज्वाला और खिंचाव से नागराज वासुकी का शरीर अत्यंत संतप्त और क्षत-विक्षत हो गया था। अपने शारीरिक और मानसिक संताप के शमन हेतु नागराज वासुकी ने काशी में आकर इसी स्थान पर कठोर तपस्या की थी। नागराज की निष्ठा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं यहाँ प्रकट हुए थे और उन्होंने वासुकी के संताप को दूर कर शिवलिंग के रूप में विराजमान होने का वरदान दिया। इस प्रकार यहाँ ‘वासुकीश्वर महादेव’ की स्थापना हुई। माना जाता है कि जो भी भक्त वासुकीश्वर महादेव का जलाभिषेक करता है, उसे जीवन में कभी भी सर्प भय, विष भय और मानसिक संताप का सामना नहीं करना पड़ता।
कर्कोटक नागेश्वर मंदिर: नागराज कर्कोटक का दिव्य धाम और सर्पदोष से मुक्ति
काशी में नागलोक के रहस्यों को समेटे दूसरा सबसे प्रमुख और प्राचीन मंदिर ‘कर्कोटक नागेश्वर’ (नागेश्वर महादेव) है। नागराज कर्कोटक अष्टनागों में से एक अत्यंत शक्तिशाली नाग माने गए हैं। महाभारत और नल-दमयंती की कथाओं में भी नागराज कर्कोटक का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार जब नागराज कर्कोटक को अपने उग्र स्वभाव और विष के कारण ग्लानि हुई, तो वे पाप मुक्ति और शांति की खोज में काशी पहुँचे। उन्होंने काशी के इस पावन क्षेत्र में शिवलिंग की स्थापना कर हजार वर्षों तक केवल वायु का आहार करके महादेव की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उन्हें वरदान दिया कि जो भी मनुष्य इस मंदिर में दर्शन-पूजन करेगा, उसके कुल में कभी किसी को सर्पदंश नहीं होगा और उसकी कुंडली में मौजूद बड़े से बड़ा ‘कालसर्प दोष’ या ‘राहु-केतु दोष’ पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। आज भी यहाँ विशेष रूप से कालसर्प दोष की शांति हेतु अनुष्ठान कराए जाते हैं।
नागपंचमी पर लगता है पाताल लोक का मेला, कूप जल से स्नान का बड़ा महत्व
वर्ष में केवल एक बार नागपंचमी के पावन पर्व पर नागकूप और वासुकीश्वर महादेव मंदिर परिसर में एक अत्यंत भव्य और अलौकिक मेले का आयोजन होता है। इस दिन तड़के नागकूप के गहरे जल को बाहर निकाला जाता है और विशेष पूजन-अर्चन के बाद कूप को श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोला जाता है। दूर-दराज़ से आने वाले श्रद्धालु और साधु-संत इस कुएँ के जल का आचमन करते हैं और इसे अपने सिर पर लगाते हैं। मान्यता है कि नागपंचमी के दिन नागकूप का दर्शन और वासुकीश्वर महादेव का दर्शन करने से नागलोक के सभी आठों नागों— अनंत, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंखपाल और कुलिक का एक साथ आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है। विद्वानों के अनुसार नागपंचमी पर यहाँ किया गया दूध और जल का दान सीधे नागलोक के अधिपति तक पहुँचता है, जिससे साधक के जन्मों-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं।
काशी का स्थापत्य और भौगोलिक महत्ता: क्यों खास हैं ये मंदिर?
भौगोलिक दृष्टि से उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में स्थित यह नागकूप क्षेत्र शहर के उत्तर-पूर्वी हिस्से में जैतपुरा थाने के पास स्थित है। वाराणसी सिटी रेलवे स्टेशन से यह स्थान महज़ एक से डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। काशी का यह पूरा क्षेत्र भू-गर्भ विज्ञान और पुरातत्व की दृष्टि से भी बेहद अनोखा है। वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का मानना है कि काशी के भूमिगत जल स्रोतों की संरचना और इन प्राचीन कूपों का निर्माण इस प्रकार किया गया था कि ये कभी सूखते नहीं हैं। धर्म और भूगोल का यह अद्भुत संगम काशी को पूरी दुनिया में अद्वितीय बनाता है। यदि आप भी महादेव के भक्त हैं और अपनी कुंडली के ग्रह दोषों से मुक्ति पाना चाहते हैं, तो काशी के इस नागकूप, वासुकीश्वर महादेव और कर्कोटक नागेश्वर मंदिर के दर्शन आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
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