कांगो में इबोला वायरस का अब तक का सबसे भयावह तांडव, 2000 से अधिक लोगों की मौत; दुर्लभ बुंदिबुग्यो स्ट्रेन के सामने टीके बेअसर होने से मची अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य इमरजेंसी

अफ्रीकी महाद्वीप के मध्य में स्थित डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) इस वक्त सदी के सबसे गंभीर और घातक स्वास्थ्य संकट से जूझ रहा है। कांगो के पूर्वी प्रांतों में तेजी से पैर पसार रहे जानलेवा इबोला वायरस ने एक बेहद दर्दनाक और डरावना आंकड़ा पार कर लिया है। सरकारी और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों के ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस नए आउटब्रेक में अब तक 4,381 से अधिक पुष्ट मामले सामने आ चुके हैं और 2,011 से अधिक मासूम जिंदगियां काल के गाल में समा चुकी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अफ्रीका सीडीसी के विशेषज्ञों ने पुष्टि की है कि यह इतिहास में दर्ज अब तक का सबसे तेजी से फैलने वाला इबोला प्रकोप बन चुका है। चिंता की बात यह है कि इस बार संक्रमण की गति इतनी तीव्र है कि स्वास्थ्य व्यवस्थाएं और राहत दल वायरस की रफ्तार के सामने पूरी तरह लाचार नजर आ रहे हैं।

बुंदिबुग्यो स्ट्रेन का खौफ: क्यों बेअसर हो रहे हैं मौजूदा टीके और दवाएं?

इस बार कांगो में तबाही मचा रहा इबोला वायरस आम प्रकोपों से काफी अलग और अधिक जटिल है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह आउटब्रेक इबोला के बेहद दुर्लभ ‘बुंदिबुग्यो’ (Bundibugyo Ebolavirus) स्ट्रेन के कारण फैल रहा है। साल 2014 से 2016 के दौरान पश्चिम अफ्रीका में मची तबाही के दौरान मुख्य रूप से ‘जायरे’ (Zaire) स्ट्रेन सक्रिय था, जिसके खिलाफ वैज्ञानिकों ने सफल टीके और एंटीबॉडी दवाएं विकसित कर ली थीं।

हालांकि, बुंदिबुग्यो स्ट्रेन के खिलाफ जायरे स्ट्रेन के लिए बनी मौजूदा स्वीकृत वैक्सीन और मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेपी कारगर साबित नहीं हो रही हैं। बुंदिबुग्यो वायरस के लिए वर्तमान में कोई भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त विशिष्ट टीका या सटीक एंटीवायरल उपचार मौजूद नहीं है। यही कारण है कि संक्रमित मरीजों में मृत्यु दर (Case Fatality Rate) लगभग 46 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। डॉक्टरों को केवल मरीजों को आइसोलेट करके सपोर्टिव केयर, डिहाइड्रेशन से बचाव और लक्षणों के आधार पर प्राथमिक इलाज पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है।

महज 3 हफ्तों में दोगुना हुई मौतों की संख्या: वायरस के तेजी से फैलने की वजह

इस नए आउटब्रेक का सबसे भयावह पहलू इसकी अप्रत्याशित रफ्तार है। स्वास्थ्य आंकड़ों के अनुसार, जब 15 मई को आधिकारिक रूप से इस प्रकोप की घोषणा की गई थी, तब से पहले 1,000 मौतों का आंकड़ा छूने में लगभग 9 हफ्ते का समय लगा था। लेकिन इसके बाद यह आंकड़ा महज तीन हफ्तों के भीतर दोगुना होकर 2,000 के पार पहुंच गया।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. मोहम्मद याकूब जनाबी ने स्थिति की गंभीरता को बयां करते हुए स्वीकार किया है कि प्रशासन और मेडिकल टीमें वायरस के पीछे भाग रही हैं, जबकि वायरस प्रयासों से काफी आगे निकल चुका है। जीनोमिक सीक्वेंसिंग से यह भी चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि यह वायरस वास्तव में फरवरी के महीने में ही फैलना शुरू हो चुका था, लेकिन शुरुआत में इसके लक्षणों को सामान्य मलेरिया और टाइफाइड समझ लिया गया। इस शुरुआती देरी के चलते वायरस को बिना किसी रुकावट के अनगिनत बस्तियों में फैलने का पूरा मौका मिल गया।

गृहयुद्ध, हिंसा और दूरदराज के इलाके: स्वास्थ्यकर्मियों के सामने पहाड़ जैसी चुनौतियां

कांगो के इटुरी, उत्तरी किवू और आसपास के पांच पूर्वी प्रांत इस भीषण महामारी के केंद्र बने हुए हैं। यह क्षेत्र दशकों से स्थानीय विद्रोही गुटों, गृहयुद्ध और हिंसक संघर्षों से त्रस्त रहा है। सशस्त्र विद्रोही समूहों की सक्रियता के कारण अंतरराष्ट्रीय सहायता संगठनों और मेडिकल टीमों के लिए सुदूर ग्रामीण इलाकों तक पहुंचना जान जोखिम में डालने जैसा साबित हो रहा है।

सड़कों का अभाव, बुनियादी ढांचे का पूरी तरह ध्वस्त होना और संचार सेवाओं में लगातार रुकावट के चलते कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग (संक्रमितों के संपर्क में आए लोगों की पहचान) लगभग असंभव हो गई है। इसके अलावा, वेतन न मिलने और सुरक्षा की कमी के कारण स्थानीय स्वास्थ्यकर्मी कई जगहों पर हड़ताल पर चले गए हैं। डब्लूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार, 60 से 70 प्रतिशत नए मरीज उन सूचियों से बाहर मिल रहे हैं जिन पर निगरानी रखी जा रही थी, जो यह दर्शाता है कि संक्रमण का वास्तविक प्रसार आंकड़ों से कहीं अधिक गहरा हो सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का अलर्ट और सीमावर्ती देशों में सतर्कता

कांगो में बेकाबू होते हालात को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सीमावर्ती देशों विशेषकर युगांडा, रवांडा और दक्षिण सूडान में हाई अलर्ट जारी किया है। युगांडा की सीमा से सटे इलाकों में पहले ही कुछ संदिग्ध और पुष्ट मामले दर्ज किए जा चुके हैं। अफ्रीका महाद्वीप के भीतर शरणार्थियों और व्यापारिक गतिविधियों के कारण सीमाओं के आर-पार भारी आवाजाही होती है, जिससे इस वायरस के अन्य देशों में फैलने का खतरा लगातार बढ़ रहा है।

डब्लूएचओ और अफ्रीका सीडीसी ने प्रभावित क्षेत्रों में नए उपचार केंद्रों की स्थापना, सुरक्षित अंतिम संस्कार के लिए विशेष टीमों का गठन और स्थानीय स्तर पर पानी व स्वच्छता के साधन पहुंचाने का काम तेज कर दिया है। इसके साथ ही, बुंदिबुग्यो स्ट्रेन के खिलाफ प्रायोगिक टीकों और कैंडिडेट दवाओं के इमरजेंसी क्लीनिकल ट्रायल्स भी इटुरी प्रांत में शुरू किए गए हैं।

इबोला के लक्षण, संक्रमण का तरीका और बचाव के उपाय

इबोला वायरस एक घातक वायरल हेमोरेजिक फीवर (रक्तस्रावी बुखार) का कारण बनता है। यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के शारीरिक तरल पदार्थों—जैसे खून, पसीना, लार, उल्टी, मल या वीर्य—के सीधे संपर्क में आने से फैलता है। इसके अलावा संक्रमित मरीज के इस्तेमाल किए गए कपड़ों, बिस्तरों और मेडिकल उपकरणों के जरिए भी इसका संक्रमण तेजी से फैलता है।

  • प्रारंभिक लक्षण: संक्रमण के 2 से 21 दिनों के भीतर मरीज को अचानक तेज बुखार, अत्यधिक कमजोरी, मांसपेशियों और जोड़ों में तेज दर्द, सिरदर्द और गले में खराश की शिकायत होती है।

  • गंभीर लक्षण: बीमारी बढ़ने पर लगातार उल्टी, खूनी दस्त, त्वचा पर लाल चकत्ते, किडनी और लिवर का काम करना बंद कर देना शामिल है। अंतिम चरणों में आंतरिक और बाह्य अंगों (नाक, मसूड़ों और आंखों) से अनियंत्रित रक्तस्राव होने लगता है, जिससे मल्टी-ऑर्गन फेलियर के कारण मरीज की मौत हो जाती है।

  • बचाव: संक्रमित व्यक्ति से दूरी बनाना, बिना पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (PPE) किट के मरीज के संपर्क में न आना, बार-बार साबुन-पानी से हाथ धोना और इबोला से मृत व्यक्ति के शव को छूने से बचना ही बचाव का एकमात्र रास्ता है।

वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा पर मंडराता खतरा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की दरकार

कांगो में इबोला से 2000 से अधिक मौतों का यह आंकड़ा पूरी दुनिया के लिए एक बहुत बड़ा अलार्म है। कोविड-19 महामारी के बाद यह स्पष्ट हो चुका है कि दुनिया के किसी भी कोने में फैलने वाला कोई भी खतरनाक वायरस केवल एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। यदि कांगो के इस आउटब्रेक को तत्काल अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता, मेडिकल लॉजिस्टिक्स और मजबूत सर्विलांस के जरिए नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह पूरे अफ्रीकी क्षेत्र और वैश्विक स्तर पर गंभीर संकट खड़ा कर सकता है।

संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियों ने दुनिया भर के संपन्न देशों से अपील की है कि वे कांगो में फ्रंटलाइन वर्कर्स की सुरक्षा, प्रायोगिक दवाओं के त्वरित परीक्षण और सीमावर्ती इलाकों में स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के लिए तुरंत आगे आएं। जब तक जमीन पर हिंसा थमेगी नहीं और स्वास्थ्यकर्मियों को निर्बाध काम करने का सुरक्षित माहौल नहीं मिलेगा, तब तक इस खौफनाक वायरस की चेन को तोड़ना पूरी मानवता के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बना रहेगा।

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