अमेरिका और सऊदी अरब के बीच ऐतिहासिक नागरिक परमाणु समझौते (123 Agreement) पर हस्ताक्षर होने के ठीक अगले ही दिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा राजनीतिक दांव चल दिया है। ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि यह न्यूक्लियर डील तभी पूरी तरह लागू होगी, जब सऊदी अरब ‘अब्राहम समझौते’ (Abraham Accords) का हिस्सा बनेगा और अमेरिका के मित्र देश इजरायल को औपचारिक मान्यता देगा।
सऊदी अरब और इजरायल के बीच फिलहाल कोई औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं, ऐसे में ट्रंप की इस शर्त ने मध्य पूर्व (Western Asia) की राजनीति में नया मोड़ ला दिया है।
ट्रंप का रुख: केवल असैन्य उपयोग, संवर्धन पर कड़ी शर्त
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करते हुए समझौते की मुख्य रूप से दो शर्तें रेखांकित कीं:
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अब्राहम समझौते में शामिल होना अनिवार्य: ट्रंप ने लिखा कि इस डील की अंतिम मंजूरी पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगी कि सऊदी अरब अब्राहम संधि में शामिल होकर इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करे।
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असैन्य इस्तेमाल: अमेरिका केवल गैर-संवर्धित (Non-Enriched) असैन्य परमाणु ऊर्जा सुविधाओं में सहयोग देने का पक्षधर है।
सऊदी अरब की प्रतिक्रिया: ‘पहले बने स्वतंत्र फिलिस्तीन राष्ट्र’
ट्रंप की इस शर्त के जवाब में सऊदी अरब ने भी अपना पुराना और स्पष्ट रुख दोहराया है:
सऊदी अरब का पक्ष: इजरायल के साथ संबंधों को तब तक सामान्य नहीं किया जा सकता, जब तक कि एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र (Independent Palestinian State) के गठन का स्पष्ट रास्ता न बने।
दूसरी ओर, इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पहले ही फिलिस्तीनी राष्ट्र के विचार को सार्वजनिक रूप से खारिज कर चुके हैं, जिससे इस त्रिकोणीय वार्ता में पेच फंस गया है।
30 साल का ‘123 समझौता’: अमेरिका और सऊदी के बीच क्या हुआ करार?
अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट और उनके सऊदी समकक्ष द्वारा हस्ताक्षरित इस ‘123 समझौते’ के प्रमुख पहलू इस प्रकार हैं:
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30 साल की अवधि: यह समझौता 30 वर्षों के लिए प्रभावी रहेगा, जिसके तहत अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब को परमाणु ऊर्जा रिएक्टर बनाने के लिए तकनीक और विशेषज्ञता प्रदान करेंगी।
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व्यापारिक अवसर: अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुसार, इससे अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब के ऊर्जा बाजार में अरबों डॉलर के बड़े ठेके मिलेंगे।
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संसद की मंजूरी: इस समझौते को अंतिम समीक्षा और मंजूरी के लिए अमेरिकी कांग्रेस (संसद) के समक्ष पेश किया जाएगा।
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निरीक्षण को लेकर चिंताएं: विशेषज्ञों ने इस बात पर चिंता जताई है कि इस सौदे में अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) का ‘एडिशनल प्रोटोकॉल’ शामिल नहीं है, जिससे निरीक्षण और निगरानी के अधिकार सीमित हो सकते हैं।
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