
अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को संसद के दोनों सदनों में मिले करारे झटके के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख में साफ बदलाव देखने को मिल रहा है। महीनों से मध्य पूर्व में ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और भारी बमबारी के दम पर दबाव बनाने का दावा करने वाले ट्रंप ने चुनावी नतीजों के तुरंत बाद अपने बयानों की दिशा बदल ली है। पहले जहां वॉशिंगटन से लगातार पूर्ण सैन्य टकराव और ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों को नेस्तनाबूद करने की चेतावनियां आ रही थीं, वहीं अब चुनावी शिकस्त के बाद ट्रंप यह कहते नजर आ रहे हैं कि शायद आगे बड़े युद्ध की कोई आवश्यकता ही न पड़े। अमेरिकी मीडिया और वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में इस बयान को ट्रंप के आक्रामक रुख में आए यू-टर्न के तौर पर देखा जा रहा है, जिसे घरेलू राजनीतिक दबाव और मतदाता आक्रोश का सीधा नतीजा माना जा रहा है।
हार की सबसे बड़ी वजह बनी महंगाई और ईरान युद्ध, ट्रंप ने भी किया स्वीकार
चुनावी नतीजों के विश्लेषण के दौरान खुद ट्रंप और उनके करीबी सहयोगियों ने यह माना कि ईरान के साथ सैन्य तनाव के कारण वैश्विक तेल बाजारों में अस्थिरता आई और अमेरिका में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छूने लगीं। इस ईंधन संकट और बढ़ती महंगाई ने अमेरिकी मतदाताओं को रिपब्लिकन पार्टी से दूर कर दिया। ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में स्वीकार किया कि युद्ध के चलते गैस और पेट्रोल के दामों में आई तेजी ने चुनाव परिणाम को बुरी तरह प्रभावित किया। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी सोशल मीडिया पर अपनी विस्तृत समीक्षा में साफ लिखा कि मतदाताओं की नाराजगी की सबसे प्रमुख वजह ईरान युद्ध, जीवनयापन की बढ़ती लागत और ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति से भटकना रही। इस घरेलू राजनीतिक धक्के ने व्हाइट हाउस को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि विदेशी मोर्चों पर लंबा खिंचने वाला युद्ध अमेरिकी जनता को बिल्कुल रास नहीं आ रहा है।
‘हम पूरी तरह तैयार हैं लेकिन शायद जरूरत न पड़े’ — बैकफुट पर क्यों आई रणनीति
ईरान के खिलाफ आगे के कदमों को लेकर पूछे गए सवालों पर ट्रंप ने विरोधाभासी और रक्षात्मक बयान देते हुए कहा कि अमेरिका सैन्य रूप से पूरी तरह तैयार और सक्षम है, लेकिन युद्ध को और अधिक भड़काने की आवश्यकता शायद नहीं पड़ेगी। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका को जो रणनीतिक दबाव बनाना था, वह बन चुका है और अब स्थिति को नए सिरे से देखा जा रहा है। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि दोनों सदनों (प्रतिनिधि सभा और सीनेट) में बहुमत गंवाने के बाद ट्रंप प्रशासन के लिए नए युद्ध बजट और सैन्य अभियानों के लिए संसद से वित्तीय मंजूरी हासिल करना बेहद पेचीदा हो जाएगा। ऐसे में कूटनीति और वार्ता के दरवाजे खोलना ट्रंप के लिए राजनीतिक मजबूरी बन गया है।
तेहरान से तीखी प्रतिक्रिया, ईरान ने ट्रंप की हार को बताया ‘जुआरी की जिद’
दूसरी ओर, चुनावी नतीजों और ट्रंप के बदले सुरों पर ईरान की राजधानी तेहरान से बेहद तीखी और चुटीली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। ईरानी अधिकारियों और संसद के नेताओं ने कहा कि अमेरिकी चुनाव परिणाम साबित करते हैं कि आम जनता युद्धोन्माद और आक्रामकता को नकार चुकी है। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए इसे एक ‘हारे हुए जुआरी की छटपटाहट’ करार दिया जो मेज से उठना नहीं चाहता। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने दोहराया कि उनका देश पहले से ही संकट को संवाद और कूटनीति के जरिए सुलझाने की वकालत कर रहा था, और अब गेंद पूरी तरह वॉशिंगटन के पाले में है कि वह युद्ध का रास्ता छोड़कर यथार्थवादी रुख अपनाए।
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