
‘असहमति लोकतंत्र की धड़कन है, इसे दबाया नहीं जा सकता’—स्टालिन
मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने अपने बयान में कहा कि किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में जनता, युवाओं और राजनीतिक संगठनों को नीतियों या संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठाने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। स्टालिन ने कहा, “लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और असहमति नागरिकों का बुनियादी हक है, कोई अपराध नहीं। युवाओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को अपनी बात रखने के लिए राजधानी आने से रोकना और पूरे शहर को छावनी में तब्दील कर देना सत्ता के अहंकार को दर्शाता है। अगर संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर संदेह जताया जा रहा है, तो समाधान संवाद और पारदर्शिता है, न कि लाठी और धारा 163 का सहारा लेकर आवाजों को खामोश करना।”
दीपके के पारिवारिक शोक और हिरासत पर जताई संवेदनशीलता
स्टालिन ने सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके की हिरासत और उसी दौरान उनके परिवार में दादी के निधन की घटना पर भी गहरी संवेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन शासन-प्रशासन में बुनियादी मानवीय संवेदनाओं का जीवित रहना अनिवार्य है। स्टालिन ने केंद्र और दिल्ली पुलिस से अपील की कि किसी भी कार्यकर्ता को ऐसी स्थिति में न उलझाया जाए जिससे वह अपने पारिवारिक दायित्वों और शोक की घड़ी में शामिल न हो सके।
विपक्षी गठबंधन के नेताओं ने भी सुर में मिलाया सुर
स्टालिन के इस रुख के बाद विपक्षी खेमे में भी हलचल तेज हो गई है:
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संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर सवाल: विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग और अन्य स्वतंत्र संस्थाओं की विश्वसनीयता पर उठ रहे सवालों का जवाब देने के बजाय केंद्र सरकार बल प्रयोग से असहमतियों को दबाने की कोशिश कर रही है।
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संविधान के अनुच्छेद 19 का हवाला: नेताओं ने रेखांकित किया कि शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने और विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार है, जिसे प्रशासनिक आदेशों से मनमाने ढंग से छीना नहीं जा सकता।
केंद्र बनाम विपक्ष: जंतर-मंतर से आगे बढ़ा सियासी टकराव
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दक्षिण भारत के प्रमुख नेता के रूप में स्टालिन का यह समर्थन CJP के आंदोलन को एक क्षेत्रीय या छात्र केंद्रित दायरे से बाहर निकालकर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ले आया है। जहां एक ओर सत्तारूढ़ भाजपा और केंद्र सरकार इसे कानून-व्यवस्था का उल्लंघन और राजधानी की शांति भंग करने की सुनियोजित साजिश बता रही है, वहीं दूसरी ओर गैर-भाजपा शासित राज्यों के नेताओं द्वारा इसे ‘लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा’ से जोड़कर पेश करने से आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और चुनावी मंचों पर और गरमाने के संकेत दे रहा है।
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