
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछने से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर सियासी घमासान तेज हो गया है। योगी आदित्यनाथ सरकार में मत्स्य पालन कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद ने देश की राजधानी दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित ‘संवैधानिक सुरक्षा अधिकार महासम्मेलन’ के मंच से भारतीय जनता पार्टी (BJP) को कड़ा संदेश दिया है। हजारों कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में शक्ति प्रदर्शन करते हुए संजय निषाद ने साफ शब्दों में कहा कि अब निषाद समाज केवल चुनावी रैलियों में भीड़ जुटाने का माध्यम नहीं रहेगा। उन्होंने गठबंधन के भविष्य को सीधे तौर पर आरक्षण से जोड़ते हुए कहा कि भाजपा के साथ समर्थन और चुनावी तालमेल तभी बरकरार रहेगा, जब मछुआरा समाज के आरक्षण पर मेज पर ठोस फैसला होगा।
‘आरक्षण मिले तो शांति, नहीं तो क्रांति’: राशन नहीं, शासन में पूरी हिस्सेदारी चाहिए
महासम्मेलन को संबोधित करते हुए कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय निषाद के तेवर बेहद आक्रामक नजर आए। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में निषाद और मछुआरा समुदाय की आबादी लगभग 18 प्रतिशत है और राज्य की राजनीति में यह वर्ग निर्णायक भूमिका निभाता है। अपने भाषण में उन्होंने स्पष्ट नारा दिया कि ‘आरक्षण मिले तो शांति, नहीं तो होगी क्रांति’। डॉ. निषाद ने कहा कि उनका समाज राष्ट्रहित और राष्ट्रवाद के लिए 24 कैरेट खरा है, लेकिन अब वह अपने संवैधानिक अधिकारों से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने कहा कि समाज को अब सरकारी राशन की मुफ्त योजनाओं से बहलाया नहीं जा सकता, बल्कि शासन-प्रशासन और विधानसभा में अपनी जनसंख्या के अनुपात में पूरी हिस्सेदारी चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि आज गांव-गांव में निषादराज का झंडा बुलंद हो चुका है और समाज अब अपने राजनीतिक वजूद को पहचान चुका है।
‘जिसने धोखा दिया, उसका नुकसान हुआ’: 2027 चुनाव से पहले दूसरा दरवाजा देखने की बात
संजय निषाद ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को आगाह करते हुए कहा कि गठबंधन का मतलब केवल विधायक, सांसद या मंत्री पद पाना नहीं होता, बल्कि जिन बुनियादी मुद्दों पर पार्टियां साथ आई थीं, उनका समय पर समाधान कराना मुख्य उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकारें चल रही हैं, ऐसे में आरक्षण के फैसले को और अधिक लटकाना नाइंसाफी है। अपने संबोधन में चेतावनी भरे लहजे में उन्होंने कहा कि जो दल निषाद समाज से वादा करके मुकरा है, इतिहास गवाह है कि उसे सत्ता गंवानी पड़ी है। उन्होंने कहा कि अगर भाजपा सरकार ने जल्द से जल्द आरक्षण लागू करने की दिशा में अधिसूचना जारी नहीं की, तो निषाद पार्टी अपने राजनीतिक अस्तित्व और समाज के भविष्य के लिए अन्य विकल्पों पर विचार करने और दूसरे राजनीतिक दरवाजे खटखटाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होगी।
मझवार और तुरैहा को अनुसूचित जाति (SC) सूची में शामिल करने की मुख्य मांग
इस महासम्मेलन में मुख्य मांग मझवार, तुरैहा, बिंद, केवट, मल्लाह और कश्यप जातियों को अनुसूचित जाति (SC) आरक्षण का वैधानिक लाभ देने की रही। डॉ. संजय निषाद ने संवैधानिक दस्तावेजों और ऐतिहासिक गजट का हवाला देते हुए तर्क रखा कि उत्तर प्रदेश के संविधान आदेश 1950 में मझवार जाति पहले से ही एससी सूची के क्रमांक 53 पर दर्ज है। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक उदासीनता और गलत व्याख्या के कारण मछुआरा उपजातियों को इसका वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है और उन्हें जबरन ओबीसी श्रेणी में उलझाकर रखा गया है। उन्होंने मांग की कि मध्य प्रदेश, दिल्ली और उत्तराखंड की तर्ज पर उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में मझवार के पर्यायवाची के रूप में निषाद समुदाय की सभी उपजातियों को निर्विवाद रूप से एससी प्रमाण पत्र जारी किए जाएं, ताकि समुदाय के शिक्षित युवाओं को सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में उनका वाजिब हक मिल सके।
अखिलेश यादव को गोरखपुर से चुनाव लड़ने की खुली चुनौती, विपक्ष पर भी निशाना
अपने तीखे भाषण में डॉ. संजय निषाद ने केवल सत्ताधारी भाजपा पर ही दबाव नहीं बनाया, बल्कि मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पर भी जमकर प्रहार किए। उन्होंने अखिलेश यादव से सवाल किया कि सपा पहले मछुआरा समाज के आरक्षण पर अपना आधिकारिक स्टैंड साफ करे और बताए कि क्या वह अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से 9 प्रतिशत कोटा अलग कर निषाद समाज को एससी में शामिल करने का समर्थन करती है? इसी दौरान उन्होंने अखिलेश यादव को गोरखपुर सदर विधानसभा क्षेत्र से सीधी चुनावी भिड़ंत की खुली चुनौती दे डाली। डॉ. निषाद ने दावा किया कि यदि वे बिना किसी दल के गठबंधन के भी अकेले दम पर मैदान में उतरेंगे, तब भी निषाद समाज के आशीर्वाद से समाजवादी पार्टी से अधिक मत हासिल करके जीत दर्ज करने का माद्दा रखते हैं।
यूपी की सियासी जमीन पर निषाद वोट बैंक का गणित और गठबंधन का भविष्य
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की सियासत में पूर्वी यूपी, बुंदेलखंड और तराई के लगभग 25 से अधिक जिलों—जिनमें गोरखपुर, संतकबीरनगर, प्रयागराज, जौनपुर, गाजीपुर, मऊ, बलिया, वाराणसी, मिर्जापुर और भदोही शामिल हैं—में निषाद मतदाताओं की संख्या 10 से 18 प्रतिशत के बीच है। हालिया लोकसभा चुनावों में खलीलाबाद सीट पर संजय निषाद के पुत्र प्रवीण निषाद की हार के बाद से ही पार्टी के भीतर आंतरिक असंतोष सुलग रहा है, जिसका ठीकरा निषाद पार्टी स्थानीय स्तर पर भाजपा के भितरघात पर फोड़ती रही है। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आरक्षण के मुद्दे को धार देकर संजय निषाद ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं—एक तरफ उन्होंने अपने परंपरागत वोट बैंक को एकजुट करने का संदेश दिया है, तो दूसरी तरफ भाजपा हाईकमान पर अपनी राजनीतिक सौदेबाजी (Bargaining Power) मजबूत करने का सीधा दबाव बना दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा शीर्ष नेतृत्व अपने इस अहम सहयोगी की इस सख्त चेतावनी पर क्या कूटनीतिक रुख अपनाता है।
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